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Monday, 7 November 2011

बचपन की कल्पनाओं का शहर



कल्पनाएँ हवाओं मे झूलती हैं, तैरती है, दुनिया के समंदर मे गोते लगाती है, सच और झूठ के बीच मे झूमती हैं।
कल्पनाएँ जो उम्र के बंधनों से होती हैं।

ये शहर किसने बनाया है से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इन मासूम कल्पनाओं में ये शहर कहां से आया है?

यशोदा

Wednesday, 24 August 2011

छुपने से खोने तक




सड़क के किनारे लगी वे दुकानें को किसी को भी अपनी ओर खींच सकती है, बुला सकती हैं, रिझा सकती है और लालसा से भर सकती है। 

हर रोज दोपहर १२ बजे से यहां एक हुजूम लगता है। जो भी आता है वो इसी कोने का हो जाता है। कभी घंटों के हिसाब से यहां पर आवाजें गूंजती है तो कभी खामोशी भी इसकी एक आवाज बन जाती है। मगर इसका सांस लेना बड़ता जाता है। ये जगह असल मे छुपने के लिये बनी है या यूं कहे की गुम हो जाने के लिये इस जगह को बनाया जाता है। 

कोई किसी से छुप रहा है तो कोई यहां पर आकर किसी लुफ्त मे खो जाना चाहता है। ये उस मुसाफिर पर निर्भर करता है कि वे छुपने आया है खोने

यशोदा

Thursday, 11 August 2011

जगह के किनारे से



सड़क के किनारे से दिखती जगह अपने भीतर कई विभिन्न असीमताएँ बसायें रखती हैं। अपनी ओर इशारा करके बुलाती हैं, रिझाती हैं, उकसाती हैं। वैसे ही ये सड़क का किनारा अपने अन्दर एक और जगह लिये जीता है।

राकेश