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Monday, 28 January 2019

भूत भी होते हैं

हम सब बहुत दिनों के बाद घर लौटे थे। यहाँ पर पूजा थी।

मैं आराम से सो रही थी। की अचानक से मेरी आँख खुली। आज रात में अजीब - अजीब आवाजें आने लगी। मेरी नींद खुली, मैं बाहर गई तो कोई नही था। मुझे डर लगने लगा। मैं अंदर चली गई लेकिन फिर से आवाजें आने लगी मैं खुद से बात करने लगी -‘छोड़ न।‘  ये कहते हुए मैं बिस्तर पर लेट गई। मगर मुझे नींद नहीं आ रही थी।

कुछ ही देर बाद एक काली परछाई बाहर को भागी। मैं उठी और उस परछाई के पीछे - पीछे भागी। मगर मुझे कोई नहीं दिखा। वहीं से जैसे ही रिंकी दीदी बाहर आई तो वो परछाई गायब हो गई।

रिंकी दीदी ने मुझसे कहा, “इशिका अंदर आ जा।

मैं अंदर चली गई। फिर मुझे नींद कब आई पता ही नही पर जब आंख खुली तो देखा सुबह हो गई थी। मैं उसी जगह पर थी जहां मुझे काली परछाई दिखाई दी थी। रिंकी दीदी आई दीदी ने कहा, “क्या हुआ इतनी परेशान क्यों हैं?”
मैने बोला, “दीदी आप कल रात को बाहर आए थे?”
दीदी ने कहा, “नही तो, मैं तो सो रही थी।
मैंने कहा, “नहीं तुम आए थे।
वो बोली, “हट पागल, मैं क्यों आउंगी?”

सुनकर मैं बहुत ज्यादा डर गई थी। मैं कुछ देर वहीं पर खड़ी रही और यहाँ से वहाँ देखने लगी। मेरा कुछ करने को मन नहीं कर रहा था। की कशिश दीदी ने मुझे देखा और कहा, “इशिका आजा हमारे साथ खेल ले।
मैने कहा, “नही - नही मैं नही खेलूंगी। मेरी तबियत खराब है।

मैं मम्मी के पास गई। कुछ देर वहीं उनके नजदीक चुपचाप बैठी रही। मुझे इतना खामोश देखकर मम्मी ने मुझसे कहा, “क्या हुआ? तू इतनी परेशान क्यों है??
मैं उनके गले लग कर बोली, “मुझको कल रात से एक काली परछाई तंग कर रही है। मैं क्या करुं?”
मम्मी ने कहा, “झूठ मत बोल?”

मैं वहां से उठकर बाहर आ गई। मैं सोच रही थी कि अब क्या होगा? मुझको तो भूत भी दिखाई दे रहा है। मैं पापा के पास भी गई। पापा के पास गोपू खड़ा था। गोपू थरथर कांप रहा था। जिसे देखकर तो मैं बिना कुछ बोले ही बाहर आ गई।

दोपहर के 3 बज रहे थे। रात को घर में पूजा थी। मुझे नींद आ रही थी। दीदी बाहर गई थी। कशिश दीदी और भईया आम खाने दादू के पास गए थे। मैं और मेरा छोटा भाई घर पर थे। पापा, मामा के साथ रात का सामान लेने गए थे। मम्मी, बुआ और आरती दीदी सब रोटी बना रहे थे। पिंकी दीदी दादी के घर गई थी।

शाम हो गई। पूजा का सारा सामान सज गया। पूजा शुरु होने वाली थी कि मैं उन अंकल के पास गई जो पूजा करने वाले थे। मैंने उनसे कहा कि अंकल - अंकल मुझको भूत दिखाई देते हैं। अंकल ने कहा, भूत प्रेत कुछ नही होता।
इतने में रिंकि दीदी फिर आई उन्होनें कहा, क्या कर रही है?”
मैने कहा, अंकल से ये पूछ रही हूं कि भूत होते भी है? पर उन्होने तो मना कर दिया।

दीदी ने कहा, “वो अंकल नही, पंडित है।“
मैं बोली, “जो भी हो।“
उन्होने कहा, “जो तुम ने देखा वो कुछ नही था। तुमने बस किसी की परछाई देख ली उसी को तुमने भूत समझ लिया।“
मैने कहा, “पंडित जी तो झूठ बोल रहे हैं।“
मैं मम्मी के पास गई और यही सवाल फिर से पूछा। मम्मी ने कहा, “कोई कपड़ा उड़ा होगा।“

मैने तब भी यकीन नही किया और पापा के पास जा पहुंची तो पापा ने भी पूछने पर यही कहा की घर में भूत नही होता है - जा दीदी के साथ बाजार चली जा। मैने मना कर दिया और मैं कमरे में भाग गई। शाम हो चुकी थी। मैं कमरे में सोई हुई थी। तभी मेरी नींद खुल गई और मैं बाहर दीदी के पास जा पहुंची।

मुझे देखकर दीदी बोली, “तू तो कहीं जाती भी नही है। सही बात है तू तो दिल्ली में ही घूमेगी यहाँ घर के आसपास मे तो बस टाईम पास करने आती है।“
मैने दीदी से पूछा, “दीदी अगर आपको भूत या कोई परछाई दिखे तो क्या आप उसे मजाक समझकर टाल दोगे?”
दीदी बोली, “किसकी परछाई दिखी?”
मैने कहा, “अगर मुझे पता ही होता तो आपसे थोड़ी पुछती?”
दीदी ने कहा, “आज रात को देखेंगे।“
मैने कहा, “नही - नही मैं तो मर ही जाउंगी।“
दीदी बोली, “खाना खाकर सोते जाते हैं। ठीक है।“

हां-हां कहकर मैं उनके पीछे - पीछे कमरे में चल दी।

रात हो चुकी थी। सब लोग सो गए थे। पर मैं नही सोई थी। मैं दीदी को उठा रही थी। दीदी - दीदी उठो पर दीदी उठ ही नही रही थी लेकिन मैं भी जिदद किए जा रही थी। तभी दीदी उठी और गुस्से में चिल्ला कर बोली, “क्या है? क्यो तंग कर रही है?”
मैने बोला, “चलो बाहर। भूल गए क्या मुझसे किया हुआ वादा। दीदी नही याद है?”

कहती हुई उठी और हम दोनों बिना आवाज़ किए चुपचाप बाहर चल दिए। बाहर ठंडी- ठंडी हवा चल रही थी।

दीदी बोली, “बता कहां है तेरा भूत?”
मैने बोला, “रुको दीदी।“

पर कोई फायदा नही हुआ। हमे एक घण्टा हो चुका था। इसी तरह हमे रात में बाहर आते - आते चार दिन हो गए थे पर बाहर परछाई अभी तक नही दिखाई दी थी और भाभी के घर की लाईट भी नही जल रही थी। कल तो भाभी भी अपने घर जाने वाली थी। सुबह हुई तो मैं और दीदी बाहर ही लेटे हुए थे। मैं उठी तो देखा दीदी अंदर चली गई थी।

मैने कहा, “क्या हुआ दीदी?”
दीदी बोली, “रात भर नही सोई मैं?”
मैने बोला, “बस सिर्फ आज रात और आखिरी देख लेते हैं। उसके बाद फिर तंग नही करुंगी ठीक है?” कहकर दीदी मुस्कुरा दी।

आज भी खड़े हुए हमें काफी देर हो गई थी। दीदी तो गुस्सा होकर अंदर चली गई पर मैं अभी भी बाहर खड़ी थी। आज तो भाभी के घर की लाईट जल रही थी। तभी एक परछाई बाथरुम की तरफ भागी और बाथरुम में अंदर चली गई जिसे देखते ही मैने दीदी को तेजी से आवाज़ लगाई “दीदी जल्दी आओ।“ वो आ गई, “कहां है?” कहती हुई दीदी बाहर आई और हम वहीं वहीं रुककर उसके बाहर निकलने का इंतजार करने लगे।

इशिका




Wednesday, 8 July 2015

कहानियों से भरी जगह

स्कूल की घंटी बजते ही क्लासों मे हो- हो कर शोर मच जाता और लड़कियां एक के ऊपर एक गिरते पड़ते दरवाजों से घक्के मारते हुए “बालकनी” से धब धब जूतों की आवाज करते हुए ज़ीने से उतर कर पीछे के गेट की तरफ भागती हैं। सब के बीच मे एक होड सी लगी रहती है की कौन सब से आगे जाकर उस मंजिल को छू लेगा।

मैं भी उनका पीछा करती हुई वहाँ पहुच गई। मैंने देखा कि पीछे के गेट के उस तरफ एक महिला जिनकी उम्र 40 से 45 साल की है। तन पर सीधे पल्ले की साडी, सिर ढका हुआ। वह बार - बार सिर के पल्लू को सभालते हुए। सभी की आवाज को सुन, वह चीज उठा कर उस लड़की के हाथ मे पकडा देती जिसने उन्हे पैसे दिये है। वह सभी कि आवाजों को सुन तो रही है पर जो हाथ उनके हाथ मे पैसे थमा देता वह उसी की आवाज को घ्यान से सुनती। यदि समझ नही आती तो वह तेजी से पूछती कि “ये पैसे किसके है? क्या चाहिये?” तभी भीड मे से एक कोई न कोई तेज आवाज आ ही जाती “मेरे है।“ फिर चाहे उन चीज वाली आंटी को किसी का चेहरा दिखे या न दिखे वे आवाज़ को सुनकर उसे चीज जरूर पकड़ा देती। और फिर वह औरो की डिमांड पुरी करने मे लग जाती।

आज भी सभी लडकियां एक दूसरे को घक्का देते अपनी पसन्द की चीज खरीद ने की जुगाड मे लगी हुई है। कुछ लडकियां उस भीड से कुछ दूर खडी अपनी बातों में लगी हुई हैं। तो कुछ को लगता है कि हमारा नम्बर तो आएगा ही नही, चल कहीं और चलते हैं। इस जगह से कुछ ही दूर एक सीढी नूमा चबूतरा बना हुआ हैं। कुछ लडकियां उस चबूतरें पर जाकर बैठ गई हैं और उन्होने अपनी बातों की पोठली खोल ली हैं। जिन्हे अपनी आधी छुट्टी का ये आज़ाद वक्त कैसे बिताना है, वे सभी भली भांति जाती हैं। स्कूल की कुछ ही ऐसी जगहे हैं जहां पर आधी छुट्टी का ये वक्त बिताया जाता हैं। क्लास की परेशान कर देने वाली गर्मी और हर वक्त काम मांगने वाली आवाज़ों से दूर जाकर। ये जगहे जो इस स्कूल की बड़ी क्लास की बड़ी सहेलियों ने चुनी होगी, लेकिन जैसे अब तो हर कोई इसे अपनी समझ कर यहाँ पर कुछ समय के लिए छुप जाता हैं।

आधे घंटे का ये समय अलग अलग क्लास में पढ़ने वाली सहेलियों को एक कर देता हैं। जहां गेट पर पेट भरने के लिए समोसे, चिप्स व मट्ठी खरीदी जा रही है और वहाँ पर अब बाते शुरू है।

Monday, 27 April 2015

इमली खेल

घंटी की आवाज़ और बच्चों के हो-हल्ले के साथ आधी छुट्टी होने का पैग़ाम मिल गया। अपने-अपने डेस्क छोड़ फर्राटे से भागते हुए रोज़ की तरह मैंने और मेरी सहेलियों की टोली ने इमली खेलने का ठिकाना घेर लिया। कुछ साथी खेल को देखने के लिए ख़ाली डेस्कों पर जा बैठे, तो कुछ ने खड़े होने के लिए अपने ठिकाने चुन लिए और खेल शुरू हो गया। मेरी टीम की दूसरी बारी थी पर मुझे अपनी बारी आने का बेहद इंतज़ार था। खेल के बीच कई आवाज़ें भी शामिल हुई। कोई आगाह करते हुए कहता, ”भई कपड़ा लगना आउट नहीं हैं तो कोई मेरी तरह ठीक हैकहकर खेल को आगे बढ़ाता। ये मज़ेदार सफ़र शुरू हो चुका था। कुछ पक्के खिलाडि़यों के पास जीतने का जो था तो कुछ की कमज़ोरी उनके चेहरे पर एक घबराहट बनकर छाई हुई थी। फिर भी वो इस खेल का मज़ा लेना चाहती थीं। उसकी टीम के सदस्यों ने उसे दिलासा देते हुए कहा, ”कोई बात नहीं, हम सब संभाल लेंगे।बारम्बार ये साथी तेजी से भागते हुए आते और हमारे हाथों को पार कर जाते। जब उस टीम की ख़ातिर खिलाड़ी शिल्पा ने रोज़ की तरह आज भी हमारे चार हाथों की ऊँचाई को आसानी से पार कर लिया, तो आसपास खड़े तमाबीनों ने ताली पीटते हुए कहा, ”वाह! शिल्पा तो पक्की खिलाड़ी है।इस वाहवाही भरे दौर के बाद, उस टीम के खिलाड़ी एक बार फिर से छलाँग लगाने को तैयार थे। इस बीच कुछ साथी खिलाडि़यों ने फिसलने या रपटने के डर से जूते उतारकर कोने में रख दिए। फिर दूसरा खिलाड़ी तेजी से भागता हुआ आया। सभी की नज़रें जैसे उसके क़दमों पर टिकी थीं। मुझे लगा कि अभी ये हमारे हाथों को पार कर शायद उस पार खड़ी मिलेगी, पर इमली के नज़दीक पहुँचते ही उसके क़दम थम गए। इस नज़ारे को देख सभी जोर-जोर से हँसने लगे। वह हाँफते हुए बोली, ”मुझे डर लग रहा है, इमली थोड़ी नीचे बनाओ।पर मैं नहीं मानी। मैंने कहा, “हमने इमली बिल्कुल ठीक बनाई है, अब हम इसे नीचा नहीं करेंगे।आखि़रकार मेरी जीत हुई। लेकिन मेरे सब्र का दायरा जैसे टूटता ही जा रहा था। दिल करता कि मैं भी इमली पर से छलाँग लगाऊँ, पर दूसरी टीम के खिलाड़ी आउट होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। खैर, मेरा ये इंतज़ार, कब इस मस्ती भरे माहौल का मज़ा लेने लगा, मुझे पता ही नहीं चला। कभी नाला, तो कभी मंदिर बनाने में भी शायद मैं इस खेल का हिस्सा बनती चली जा रही थी। तभी एक नयी खिलाड़ी, यानि रजनी तेजी से भागती हुई आई और हमारे हाथों के उस पार हो गई। उसके पैर का अंगूठा मेरे हाथ की कलाई को छू गया।

उसकी इस छलाँग के तुरन्त बाद मैंने ज़ोर से चिल्लाना शुरू किया, ”रजनी आउट हो गई, रजनी आउट हो गईऔर माहौल शोरगुल से भर गया।

हाँ भई, रजनी का अँगूठा छुआ है।लेकिन रजनी और उसकी टीम के खिलाड़ी ऐसा मानने को तैयार नहीं थे।

वे कहते, ”तुम्हारी टीम की बारी नहीं आई इसलिए तुम हमें चीटिंग से हराना चाहती हो।मुझे गुस्सा आ गया। मैंने कहा, ”ठीक है, मैं खेलूँगी ही नहीं। मेरी टीम भी मेरे साथ थी।पर शिल्पा की टीम को अपनी बारी लेनी थी इसलिए वे मान गए और इस रूठने-मनाने के बाद हम इमली बनाने बैठ गए। अब दूसरी टीम की आखि़री खिलाड़ी यानी शिल्पा ही बची थी। कुछ तमाबीन शिल्पा-शिल्पाचिल्लाकर उसका हौसला बढ़ा रहे थे। उसकी नज़रों में भी एक आत्मविश्वास भरा था। मैं उसको देख रही थी। वह तेजी से भागती हुई आई। जैसे ही उसने छलाँग लगाने के लिए अपना पैर उठाया वह मेरे माथे में आ लगा और मेरा सिर चकरा गया। सभी हँसने लगे। वहाँ खड़े तमाबीनों ने मुझे घेर लिया।

कोई कहता, ”कोई बात नहीं, खेल-खेल में लग जाती हैतो कोई मेरा माथा मसलता। शिल्पा सॉरी, सॉरीकहकर मुझे मना रही थी। दोस्तों की इन बातों से जब मेरा मन बहल गया और याद आया की शिल्पा आउट हो गई है तो मैं सब कुछ भूलकर खेल के मैदान में उतर गई। खेल के इस अंतिम दौर में भी मेरा जो बरक़रार था और मैं ऊँची-ऊँची छलाँग लगाते हुए जीत की तरफ़ बढ़ रही थी। खेल देख रहे लोग जब मुझे वाहवाही देते तो मेरी खुशी का कोई ठिकाना न रहता। तभी घंटी की आवाज़ सुनाई दी और आधी छुट्टी ख़त्म हो गई। मुझे पूरी तरह न खेलने का अफ़सोस तो हुआ पर कल इस खेल में पहली बारी मेरी होगी- ये सोच मुझे एक तसल्ली हो रही थी।



टीना

Friday, 24 April 2015

मैं बना चिब्बियों का खिलाड़ी

गर्मियों का समय था। एक दिन मैं सो रहा था, बिजली जा चुकी थी और पसीना रीर से छूट रहा था। उठकर मुँह हाथ धोया और बाहर पार्क में गया। देखा वहाँ कोई नहीं था। बाहर आया तो सारे साथी चिब्बियाँ ढूँढ़ रहे थे। मैंने पूछा, ”क्या कर रहे हो“? उन्होंने कहा, ”अब चिब्बियों के दिन आ गए है।“ चिब्बियों के दिन मतलब? तो उनमे से एक ने कहा, “गर्मियों में कोल्ड ड्रिंक ज्यादा पीते है लोग, तो उनकी चिब्बियाँ बेकार हो जाती हैं।“

“तो” मैंने पूछा।

वो बोला, “अरे उसी से तो हम खेलेगे।“

कुछ समय तो मेरे समझ में ही नहीं आया की भला चिब्बियों से कोई कैसे खेल सकता है। लेकिन हमारे यहाँ पर कोई भी चीज बेकार नहीं मानी जाती। हर किसी का कोई न कोई खेल हम बना लेते हैं। लेकिन उसके लिए हमारा बच्चा बनना जरूरी होता है। जैसे – सिगरेट की खाली डिब्बियों के ताश बना कर खेलना, इमली की गुठलियों से खेलना, साइकिल का पुराना पड़ा टायर। हर चीज का एक खेल बना कर समय के तेजी से बीतने को हम थोड़ा सा रोक लेते हैं।

तो बस, मैं भी अपने साथियों के साथ चिब्बियाँ ढूँढ़ते-ढूँढ़ते पहाड़ी पहुँच गया। वहाँ हमने चिब्बियाँ ढूँढ़ी, जेबों में भरी और चल दिए पार्क की तरफ़। पार्क में पहुँचते ही झट से चिब्बियाँ ठोंकी, पोल (गड्ढा ) खोदी और उसकी कुछ दूरी पर दो लाइनें खींच दी, चलने-तकने की और शुरू किया खेल। हम चार साथी थे - कुलदीप, सौरभ, रोहित। ये हमने तका ( अपने – अपने नंबर के लिए )  और मैं दूत ( दूसरा नंबर ) बन गया और कुल्दीप मोल ( पहला नंबर ) वैसे हम चार-चार खेल रहे थे। कुल्दीप की तीन आ गई और तीन का डंड होता है। हमने उससे एक भरवाई, अब 17 चिब्बियाँ हो गई। मैंने चली तो मेरी बारह पोल में आ गई चिब्बियाँ तभी वो भी मैंने मारकर जीत ली। पार्क में मैं सबसे अच्छा खेला और सबसे जीता। बाहर से पन्नी लाया और सारी चिब्बियाँ भरी और घर चला गया। वो सारी चिब्बियाँ मैं अपने घरवालों से छिपाकर रखता था। एक दिन मेरी बड़ी बहन ने चिब्बियाँ देख ली और घर के बाहर वाले गटर में फेंक दी। उस दिन मेरा चेहरा गुस्से और मायूसी से भरा हुआ था। इतनी मेहनत से मैंने ये चिब्बियाँ जीती और मेरी बहन ने फेंक दी। अब किसी को खेलता देखता हूँ तो वो दिन याद आ जाते है। आज जब भी वो खेल खेलना चाहता हूँ। लेकिन चिब्बियाँ ढूँढ़ने का मन भी नहीं करता । बच्चे दे देते है उन्हें लगता है कि ये अपना हानी (साथी) बना लेगा इसके पास अभी तक चिब्बियाँ है। इस खेल को छोड़ने का मन नहीं करता।



अनिकेत

Thursday, 23 April 2015

इलास्टिक के खेल

घर की चौखट पर बैठकर, गाल पर हाथ धर, मैं निहारती उन खेलते हुए बच्चों को जो गली में एक अनोखा ही खेल खेलते हुए नज़र आ रहे थे। उन्हें देखकर मेरी निग़ाहें उन्हीं पर टिक गई। दो बच्चे एक इलास्टिक को पैर में फँसाकर खड़े थे और दो जल्दी-जल्दी इलास्टिक को अपने पैरों तले दबाकर यहाँ से वहाँ कूद रहे थे। कभी इलास्टिक को पैर से उठाकर दूसरे छोर ले जाते तो कभी उस पर कूदते। उन्हें इस तरह खेलता देखकर मेरे मन में जिज्ञासा होती उस खेल से रूबरू होने की। थोड़ी देर बाद मैं उनके पास जा खड़ी हुई। जब भी मैं उनसे उस खेल के बारे में पूछने के लिए आगे बढ़ती कोई न कोई चीखता हुआ अपनी बारी लेने लगता और मैं हर बार वहीं खड़ी की खड़ी रह जाती। जब वो खेल को छोड़ सलाह करते तो मैं उनके बीच जाकर पूछती, ”ये कौन सा खेल है? आज तक ये खेल मैंने किसी को खेलते हुए नहीं देखा। क्या तुम मुझे यह खेल खेलना सिखाओगे?“ मेरी बातें सुनकर उनके बीच में से एक लड़की निकलकर आई और कहने लगी, ”हम तुम्हें अपने साथ खिला लेते पर इस वक़्त तो हम घर जा रहे हैं। कल जब हम खेलेंगे तो तुम्हें बुला लेंगे।“ “ठीक है

इतना कह मैं वहाँ से आ गई और अगले दिन का इंतज़ार करने लगी। उस रात मैं इस बात को ज़ेहन में दबाकर सो गई। अगले दिन सुबह उठी। स्कूल गई। वहाँ भी यही सोचती रही कि आज मैं एक नया खेल खेलूँगी। यही ज़द्दोजहद पूरे दिन मेरे ज़ेहन में चलती रही। शाम को जब उन्होंने मुझे खेलने के लिए बुलाया तो मैं चुपचाप उनके बीच जा खड़ी हो गई। सभी अपने हाथों को आगे कर हानी पुगते। हमारे दो समूह बने। हमने टॉस किया। मेरी टीम बाजी देने लगी। मेरे साथी इलास्टिक को पैर में फँसा खड़े हो गए और मुझसे कहा, ”तुम इस सामने वाली सीढ़ी पर बैठकर इस खेल को सीख लो।मैं वहाँ बैठकर उन्हें खेलता हुआ देखने लगी पर मुझे कुछ समझ में आ रहा था। जब मेरी बारी आई तो मेरे दोनों हानी इलास्टिक पर कूदते हुए आगे चले गए लेकिन मेरे पैर तो इलास्टिक पर कूदने के लिए उठ ही नहीं रहे थे। हिम्मत करके मैं अपने पैरों को उठाका इलास्टिक पर कूदी। एक पैर इलास्टिक पर और एक पैर ज़मीन पर टिक गये और मैं आउट हो गई। मैं कई बार इसी तरह आउट होती रही। धीरे-धीरे मुझे खेलना आ गया। आज भी जब मैं इलास्टिक खेलती हूँ और कोई मुझसे उस खेल के बारे में पूछता है तो मेरी निग़ाहों के सामने उस दिन का मंज़र आ जाता है।



नेहा श्रीवास्तव

मैं बना ड्राइवर

चार-पाँच साल की उम्र में अपने हमजोलियों को टायर को छड़ी से पीटते हुए देखा करता था। लेकिन कभी उस जगह से दूर नहीं जा सकता था जहां पर मुझे रोज सुबह से ही बैठा दिया जाता था। मेरे आसपास में सभी होते थे। बडे आदमी, औरतें, लड़कियां, लड़के और बच्चे भी मगर मैं फिर भी जैसे उन सब में अकेला ही रहता था। सुबह से ही मेरे बराबर बच्चो की भीड़ लग जाती थी। वो पूरी दोपहरी खेलते थे।
 
एक दिन मैंने सोचा कि एक बार मैं भी तो चला कर देखूँ कि टायर को कैसे चलाते हैं। उम्र के साथ टायर को छड़ी से पीटते हुए बड़ा हुआ और टायर इधर-उधर घुमाना सीखा। ग़ली के बच्चों के साथ अक्सर टायर घुमाता। एक दिन मैं और मेरे साथी जे ब्लॉक से लेकर अपनी ग़ली का चक्कर मारकर आ रहे थे कि मेरे भाई ने मुझे देख लिया और मेरे टायर को मुझसे काफी दूर एक नाली में फेंक दिया। मेरा मन बहुत उदास हो गया। मेरा भाई मुझे घर लेकर आया और मुझे बहुत मारा। मारते-मारते कहा, दोबारा टायर चलाता दिखा तो हाथ-पैर तोड़ दूँगा।“ और मुझे फिर से उसी दुकान पर लाकर बैठा दिया। मैं जब भी साइकिल के टायर को देखता तो जी करता की बस इन्हे लेकर दूर कहीं भाग जाऊ। मगर नहीं जा सकता था। जब मेरी पिटाई हुई तो उसी समय मैंने सोचा कि अगर फिर मैं साइकिल टायर से खेलूँगा तो मार पड़ेगी और दोस्त मज़ाक उड़ाएँगे।
 
मैं अपनी छत पर गया और देखा कि एक नया टायर और उसके पास छड़ी पड़ी है। टायर उठाया और छत पर घुमाने लगा। लेकिन टायर के लिए छत छोटी थी। वह दीवार पर टकराकर गिर जाता। मैं छुप-छुप कर टायर चलाता और जब जी भर जाता तो उसे फिर से छत पर फेंक देता। 

अगले दिन फिर से उतार कर इस नायाब खेल का मज़ा लेता।


कार्तिक



Wednesday, 22 April 2015

बचपन और उसके खेल

गिट्टे जैसे खेल को सीखने और खेलने की तमन्ना तो मुझे शुरू से हो रही थी। जब गर्मी की छुट्टियों में लोग अपने घरों के सामने बैठ गिट्टे खेलते तो बड़ा मन करता उनके साथ खेलने का। एक दिन अपने इसी शौक को लिए मैं भी ग़ली के बच्चों के साथ चल दी गिट्टियाँ ढूँढ़ने। पाँच गिट्टियाँ लाकर अकेले ही शुरू कर दिया गिट्टियाँ उछालना। फर्श पर बिखेर जैसे ही हाथ में कैद गिट्टी को उछालती सभी इधर-उधर हो जातीं और मैं ज़मीन पर पड़ी गिट्टियों में से एक भी नहीं उठा पाती। धीरे-धीरे कोशिश कर उन्हें उठाना सीखा।

फिर कुछ दिनों बाद सहेलियों के साथ टिके खेलना सीखा। उन्होंने साथ टिके खेलना शुरू कर दिया। हम सभी अपनी एक सहेली के चबूतरे पर जाकर टिके खेलते। हर दिन स्कूल से आकर दोपहरी में भी चबूतरे पर अपना डेरा डाल देते। जब वो चबूतरा टूटा तब हमने दूसरे ठिकाने की तला शुरू की और अपनी एक सहेली की बालकनी में जाकर खेलना शुरू कर दिया। उनकी बालकनी में खेलना मुझे पसंद आने लगा क्योंकि वहाँ न आने-जाने वाले परेषान किया करते थे न ही सिकुड़कर बैठना पड़ता था। एक दिन दोपहरी में बालकनी में बैठकर खेल रहे थे, सोनम की मम्मी अंदर कमरे में सो रही थी। गिट्टियों के बजने की आवाज़ सुन उसकी मम्मी अंदर से उठकर आईं और गुस्से भरी आवाज़ में कहा, जब देखो गिट्टियाँ ही उछालती रहती हो कोई काम नहीं मिलता तुम्हें स्कूल का।, सभी सहेलियाँ डांट सुनकर शांत हो गई लेकिन वो अपनी मम्मी की डाँट को अनसुना कर अपने खेल में मगन रही। तभी उन्होंने सभी टिको को अपने हाथ में दबोचकर पार्क की और फेंक दिया। सभी सहेलियाँ वहाँ से उठकर चल दी और अगले दिन फिर नयी टिको ढूँढ़कर ग़ली के बाहर बनी बंद दुकान के चबूतरे पर खेलने का ठिकाना बना लिया।

हम वहाँ रोज खेला करते थे। जैसे हम सहेलियों के मिलने का कारण वही बन गया था। काश के गुज़रा वक्त एक बार फिर से लौट आता। काश के हमारी जिंदगी में रिवाइंड बटन होता .


गुड्डो