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Monday, 28 January 2019

भूत भी होते हैं

हम सब बहुत दिनों के बाद घर लौटे थे। यहाँ पर पूजा थी।

मैं आराम से सो रही थी। की अचानक से मेरी आँख खुली। आज रात में अजीब - अजीब आवाजें आने लगी। मेरी नींद खुली, मैं बाहर गई तो कोई नही था। मुझे डर लगने लगा। मैं अंदर चली गई लेकिन फिर से आवाजें आने लगी मैं खुद से बात करने लगी -‘छोड़ न।‘  ये कहते हुए मैं बिस्तर पर लेट गई। मगर मुझे नींद नहीं आ रही थी।

कुछ ही देर बाद एक काली परछाई बाहर को भागी। मैं उठी और उस परछाई के पीछे - पीछे भागी। मगर मुझे कोई नहीं दिखा। वहीं से जैसे ही रिंकी दीदी बाहर आई तो वो परछाई गायब हो गई।

रिंकी दीदी ने मुझसे कहा, “इशिका अंदर आ जा।

मैं अंदर चली गई। फिर मुझे नींद कब आई पता ही नही पर जब आंख खुली तो देखा सुबह हो गई थी। मैं उसी जगह पर थी जहां मुझे काली परछाई दिखाई दी थी। रिंकी दीदी आई दीदी ने कहा, “क्या हुआ इतनी परेशान क्यों हैं?”
मैने बोला, “दीदी आप कल रात को बाहर आए थे?”
दीदी ने कहा, “नही तो, मैं तो सो रही थी।
मैंने कहा, “नहीं तुम आए थे।
वो बोली, “हट पागल, मैं क्यों आउंगी?”

सुनकर मैं बहुत ज्यादा डर गई थी। मैं कुछ देर वहीं पर खड़ी रही और यहाँ से वहाँ देखने लगी। मेरा कुछ करने को मन नहीं कर रहा था। की कशिश दीदी ने मुझे देखा और कहा, “इशिका आजा हमारे साथ खेल ले।
मैने कहा, “नही - नही मैं नही खेलूंगी। मेरी तबियत खराब है।

मैं मम्मी के पास गई। कुछ देर वहीं उनके नजदीक चुपचाप बैठी रही। मुझे इतना खामोश देखकर मम्मी ने मुझसे कहा, “क्या हुआ? तू इतनी परेशान क्यों है??
मैं उनके गले लग कर बोली, “मुझको कल रात से एक काली परछाई तंग कर रही है। मैं क्या करुं?”
मम्मी ने कहा, “झूठ मत बोल?”

मैं वहां से उठकर बाहर आ गई। मैं सोच रही थी कि अब क्या होगा? मुझको तो भूत भी दिखाई दे रहा है। मैं पापा के पास भी गई। पापा के पास गोपू खड़ा था। गोपू थरथर कांप रहा था। जिसे देखकर तो मैं बिना कुछ बोले ही बाहर आ गई।

दोपहर के 3 बज रहे थे। रात को घर में पूजा थी। मुझे नींद आ रही थी। दीदी बाहर गई थी। कशिश दीदी और भईया आम खाने दादू के पास गए थे। मैं और मेरा छोटा भाई घर पर थे। पापा, मामा के साथ रात का सामान लेने गए थे। मम्मी, बुआ और आरती दीदी सब रोटी बना रहे थे। पिंकी दीदी दादी के घर गई थी।

शाम हो गई। पूजा का सारा सामान सज गया। पूजा शुरु होने वाली थी कि मैं उन अंकल के पास गई जो पूजा करने वाले थे। मैंने उनसे कहा कि अंकल - अंकल मुझको भूत दिखाई देते हैं। अंकल ने कहा, भूत प्रेत कुछ नही होता।
इतने में रिंकि दीदी फिर आई उन्होनें कहा, क्या कर रही है?”
मैने कहा, अंकल से ये पूछ रही हूं कि भूत होते भी है? पर उन्होने तो मना कर दिया।

दीदी ने कहा, “वो अंकल नही, पंडित है।“
मैं बोली, “जो भी हो।“
उन्होने कहा, “जो तुम ने देखा वो कुछ नही था। तुमने बस किसी की परछाई देख ली उसी को तुमने भूत समझ लिया।“
मैने कहा, “पंडित जी तो झूठ बोल रहे हैं।“
मैं मम्मी के पास गई और यही सवाल फिर से पूछा। मम्मी ने कहा, “कोई कपड़ा उड़ा होगा।“

मैने तब भी यकीन नही किया और पापा के पास जा पहुंची तो पापा ने भी पूछने पर यही कहा की घर में भूत नही होता है - जा दीदी के साथ बाजार चली जा। मैने मना कर दिया और मैं कमरे में भाग गई। शाम हो चुकी थी। मैं कमरे में सोई हुई थी। तभी मेरी नींद खुल गई और मैं बाहर दीदी के पास जा पहुंची।

मुझे देखकर दीदी बोली, “तू तो कहीं जाती भी नही है। सही बात है तू तो दिल्ली में ही घूमेगी यहाँ घर के आसपास मे तो बस टाईम पास करने आती है।“
मैने दीदी से पूछा, “दीदी अगर आपको भूत या कोई परछाई दिखे तो क्या आप उसे मजाक समझकर टाल दोगे?”
दीदी बोली, “किसकी परछाई दिखी?”
मैने कहा, “अगर मुझे पता ही होता तो आपसे थोड़ी पुछती?”
दीदी ने कहा, “आज रात को देखेंगे।“
मैने कहा, “नही - नही मैं तो मर ही जाउंगी।“
दीदी बोली, “खाना खाकर सोते जाते हैं। ठीक है।“

हां-हां कहकर मैं उनके पीछे - पीछे कमरे में चल दी।

रात हो चुकी थी। सब लोग सो गए थे। पर मैं नही सोई थी। मैं दीदी को उठा रही थी। दीदी - दीदी उठो पर दीदी उठ ही नही रही थी लेकिन मैं भी जिदद किए जा रही थी। तभी दीदी उठी और गुस्से में चिल्ला कर बोली, “क्या है? क्यो तंग कर रही है?”
मैने बोला, “चलो बाहर। भूल गए क्या मुझसे किया हुआ वादा। दीदी नही याद है?”

कहती हुई उठी और हम दोनों बिना आवाज़ किए चुपचाप बाहर चल दिए। बाहर ठंडी- ठंडी हवा चल रही थी।

दीदी बोली, “बता कहां है तेरा भूत?”
मैने बोला, “रुको दीदी।“

पर कोई फायदा नही हुआ। हमे एक घण्टा हो चुका था। इसी तरह हमे रात में बाहर आते - आते चार दिन हो गए थे पर बाहर परछाई अभी तक नही दिखाई दी थी और भाभी के घर की लाईट भी नही जल रही थी। कल तो भाभी भी अपने घर जाने वाली थी। सुबह हुई तो मैं और दीदी बाहर ही लेटे हुए थे। मैं उठी तो देखा दीदी अंदर चली गई थी।

मैने कहा, “क्या हुआ दीदी?”
दीदी बोली, “रात भर नही सोई मैं?”
मैने बोला, “बस सिर्फ आज रात और आखिरी देख लेते हैं। उसके बाद फिर तंग नही करुंगी ठीक है?” कहकर दीदी मुस्कुरा दी।

आज भी खड़े हुए हमें काफी देर हो गई थी। दीदी तो गुस्सा होकर अंदर चली गई पर मैं अभी भी बाहर खड़ी थी। आज तो भाभी के घर की लाईट जल रही थी। तभी एक परछाई बाथरुम की तरफ भागी और बाथरुम में अंदर चली गई जिसे देखते ही मैने दीदी को तेजी से आवाज़ लगाई “दीदी जल्दी आओ।“ वो आ गई, “कहां है?” कहती हुई दीदी बाहर आई और हम वहीं वहीं रुककर उसके बाहर निकलने का इंतजार करने लगे।

इशिका




Sunday, 15 February 2015

मैं पेड़ के गले लग गई

चारू ने अपनी दोस्त से कहा, चल मेरे साथ दुकान पर चल!’

वो उसका हाथ छिटकते हुए बोली, ‘नहीं, पहले तू मेरे साथ चल! फिर मैं तेरे साथ चलूँगी!

‘ठीक है, पर ज़्यादा दूर नहीं!’

वे दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चलती रही तभी अचानक चारू की दोस्त अंजली ग़ायब हो गई। चारू अंजली को ढूंढ़ती रही लेकिन वो कहीं नहीं मिली। चारू को लगा कि अंजली उसे धोखा देकर भाग गई है। वो पेड़ पर अपना सिर मारते हुए बोली, ‘अंजली मुझे धोखा देकर भाग गई। मैं उससे कभी बात नहीं करूंगी!’

चारू के पेड़ पर सिर मारने से उसे गुस्सा आया और वो बोला, ‘कौन है मेरी नींद खराब कर रहा है! मैं उसे नहीं छोड़ूंगा!’ ये सुनकर चारू पीछे हटी और चैंकती हुई बोली, ‘कौन है जो मुझसे बात कर रहा है! लगता है ये अंजली है? अभी इसे मजा चखाती हूँ!’ तभी पेड़ ने कहा, ‘अरे बच्ची तुम किसे ढूंढ़ रही हो? तुमने मुझे मार-मार के सूजा दिया है!’ ये सुनकर चारू चैंकते हुए बोली, ‘बोलने वाला पेड़! ’

पेड़ ने रोते-रोते कहा, ‘हाँ मैं बोलने वाला पेड़ हूँ! मुझसे सभी लोग डरते है, पर मैं किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता हूँ!’

चारू ने कहा, ‘यहाँ तो कई पेड़ है और कोई भी नहीं बोल रहा है सिर्फ़ तुम ही बोल रहे हो!’

पेड़ ने कहा, ‘कई साल पहले की बात है मैं इस जंगल में भटक गया था। रास्ता ढूंढ़ रहा था कि तभी अचानक मुझे एक गुफा दिखी। उस समय मैं इंसान हुआ करता था। एक बूढ़ी अम्मा तेजाब पी रही थी। मैंने जल्दी से उस बोतल को उनके मुँह से हटाया और कहा, ‘अम्मां ये तेजाब है इसे कभी मत पीना, नही ंतो तुम्हारा मुँह जल जायेगा।’ बूढ़ी अम्मा को क्रोध आ गया और बोली, बेवकूफ ये मेरी दवाई थी। इसे पीकर मैं इंसान बन जाती और गाँव जाकर इंसानों को अपना दोस्त बना लेती। बाद में उन्हें खा भी जाती। अब मैं तेरा खून पीयूंगी। तू एक पेड़ बनेगा! उस बूढ़ी अम्मा ने गुस्से में आकर मुझे काला पत्ती वाला पेड़ बना दिया!’

चारू को उस पेड़ की बात सुनकर उस पर रोना आ गया और वो गुस्से से बोली, ‘अभी उस बूढ़ी अम्मा को ठिकाने लगाती हूँ!’

‘पेड़ राजा मुझे उस गुफ़ा में लेकर चलो!’ चारू ने कहा

पेड़ बोला, ‘मैं इस जगह से हिल नहीं सकता पर अपने दोस्त को बुलाता हूँ!’

पेड़ राजा ने अपने दोस्ता को सीटी मारी। सीटी की आवाज़ सुनकर एक बड़ा सा बाज़ आया और बोला, ‘पेड़ राजा बोलो, क्या बात है?’

पेड़ ने कहा ‘मेरी दोस्त को उस बूढ़ी अम्मा की गुफा में ले जाओ!’

वो मुझे अपनी पीठ पर बिठा कर उस गुफ़ा में ले गया। मैंने अम्मा की एक झलक ही देखी थी!

तभी मम्मी ने कहा, ‘कौन सी अम्मा? चल उठ और ब्रश कर ले!’

मैंने फटाफट ब्रश किया और खाना खाकर मैं पार्क में घूमने चली गई। वहाँ मैंने उसी पेड़ को देखा। मैं बिना सोचे-समझे उस पेड़ के गले लग गई।

... चेतना

Wednesday, 11 February 2015

सपना


काश की मैं खुले आसमान में उड़ पाती पर सोचती कि ऐसा नहीं हो सकता। तभी ख्यालों से होते हुए मेरा मन एक पक्षी से मेरी तूलना करने लग जाता और भरी कल्पनाओं में डूब जाता। मैं अपने बारे में सोचती रहती कि मैं क्यों नहीं उड़ सकती।

और मैं फिर से उसी सपने में खो जाती      

चेतना

Wednesday, 21 January 2015

तभी मेरी आँख खुल गई



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एक सपना हकीकत सा



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