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Tuesday, 29 January 2019

ग्यारह बजे का मोहल्ला



करीब रात के दस या ग्यारह का समय हो रहा है। मैं और मेरी बडी दीदी सब्जियाँ लेने के लिए घर से निकले तो देखा कि गली मे दरवाजे तो लगभग बन्द हो चुके थे। पर गली की ही रेनू दीदी, अंजू भाभी व प्रकाश बुआ गली के नुक्कड़ पर खडी हमारा ही इन्तिजार कर रही थी। हमे देखते ही वो पीछे से बोली कुछ बोली। उनके बोलते ही कुत्तों के एक झुड ने भौंकना शुरू कर दिया। मीना मामी ने डन्डे को  जमीन पर ज़ोरों से मारा। और तोतोकहा। उन्होने कई बार ये बोलती रही। उनकी आवाज सुन कर कुत्ते पीछे हट गए और भौंकना बन्द कर दुम हिल्ला कर अपनी ही जगह खडे रहे।

मीना मामी ने हमें देखते हुए कहा, “देखा कैसे है? अपनो को भी नही पहचानते।“

वो डन्डा हिलाती हुई आगे चल दी। रास्ते मे गेट पर चैकिदार कुर्सी पर बैठा बिडी फूँक रहा था। उसके सामने आलाव जल रहा था। साथ ही कुछ तेरह या चोदह साल के लडको का समुह आग ताप रहा था। वो सभी हाथो मे गन्दे कपडे की बोल सी पकडे हुए थे जिसे वो बार -बार अपने मुंह पर रख कर लम्बी सांस खेचे जा रहे थे। उससे आगे बढे तो देखा कि सडक कि दोनो किनारो पर माल ढोने के टेम्पू खडे थे। कुछ समान लाद कर निकल रहे थे और कुछ दुकानदार अपना समान लाद रहे थे। सडक पर खाली डिब्बे, पन्नी बिखरे पडे थे। सामने से एक अधेड उर्म की औरत और उसके साथ तेहरह चौदह साल का लडका कन्घे पर सफेद कलर का बडा सा बोरा उठाए सडक के दोनो तरफ से कागज पन्नियाँ उठा कर बोरे मे उभरते हुए आगे बढे आ रहा था। दुसरी तरफ से गाय कुडा खाती हुई सडक पर घूम रही थी। बाजार की सभी दुकाने बद हो चुकी थी। पीछे मुड कर देखा तो गलियाँ भी नींद की आगोश मे समाने लगी थी। छोटी – छोटी बेटरी लाईट की रोशनी मे दूर तक नजरे दोडाई तो देखा कि लोगो कि जगह अब गली मे गाडियो की लाईन लगी थी। देख कर ऐसा लग रहा था कि गाडियाँ भी दिन भर कि थकान मिटा रही है। एक-दुसरे को दिन भर कि कहानी सुना रही है।

कोने के घर के सामने खडी मोटर साईकिल तो फूलो वाली चादर से ढकी खडी है। उसके उपर एक सीट पर एक कुत्ता गुडली मुडली मारे मॅुह को पैरो के बीच रखे आराम फरमा रहा है। जब गर्दन घुमाई तो सब्जी मार्किट मे तो रात के बारह बजे भी दिन निकल रहा है। बडे -बडे थैले लिए औरते और आदमी दुकानो पर ऐसे टूट रहे हैं कि जैसे सब कुछ फ्री मे मिल रहा हो। समय का किसी को कोई अहसास नही हैं। हमने भी अपनी पसन्द की सब्जियाँ खरीदी और मीना मामी ने सभी को आवाज लगाई कि चलो रात के बाहर बज गए है।

अंजू भाभी ने अपना सब्जियो से भरा थैला कन्धे पर लाद कर कहा, “समय का तो पता नही चला।“

सभी ने अपने थैले कमर व हाथो मे लेकर जैसे ही वापसी कि तो कुछ आगे बढ तो देखा की कालोनी के गेट बन्द हो गया था और चौकिदार भी वहाँ से नादारत था। छोटे गेट के सामने जाकर देखा तो वो भी ताला लटकाए खडा था। सभी के चेहरो पर चिन्ता कि लकीरें आ गई। प्रकाश बुआ ने कहा, “मन्दिर के पास वाली गली मे से निकलते है।“ ये कहकर सभी जैसे ही पीछे हटे थे कि गाडियो के नीचे से कुत्तों की एक फौज निकल कर सामने दिवार की तरह खडे होकर एक स्वर मे भौं करने लगे। आसपास के घरो के दरवाजे ऐसे लग रहे थे कि कस कर बन्द हो रहे थे। कोई भी दरवाजा उन कुत्तों की आवाज पर नही खुला। कुत्तों को डांटते फटकारते हुए। जब मन्दिर वाली गली के सामने पहुच गए तो देखा कि गली मे गुप अंधेरा हो रहा था। अंजू भाभी तो डर कर पीछे होते हुए रेनू मासी से बोली, “मासी मैं कह रही  थी कि जल्दी चलो। पर मंडी मे तो पता ही नही लगा इतना टाइम हो गया।

प्रकाश बुआ ने सीने पर रखे मोबाईल को हाथ देकर निकाला और उसका बटन दबाकर  हल्की रोशनेी कर बोली, “सब धीरे - धीरे निकलो।“

गली इतनी सकरी थी। हम एक -एक कर आगे बढ रहे थे। जैसे ही गली के अन्तिम छोर पहुचे कुडेदान की बदबू से नाक के बाल भी जल गए। पुरे कुडेदान मे पाँच या छेः गाय  कुडा खा जा रहेी थी। कुछ जमीन पर बैठी ऊँग रही थी। उन्ही से कुछ दुर कुडेदान के पास बने कमरे के दरवाजे के पास आग  जला कर उससे थोडी दुर पर पन्नी बिछाकर जमीन पर कुछ लोग सोए हुए थे। उनमे से एक के खराटे साफ सुनाई दे रहे थे। कुडेदान के पास वाली सडक पर काफी दूर तक कुडे से  भरी थेलियाँ कुत्तों के पिल्ले इघर -उधर खीच रहे थे। अभी हम कुछ दूर ही निकले थे कि काले रंग कि बिल्ली अपने बच्चो के साथ एक बोरी के अन्दर खेल रही थी। उसे देख कर ऐसा लग रहा था कि इस वक्त उन्हे किसी का डर नही है।

मैं उसे देखने के लिए एक पल वही खडी हो गई तो रेनू मासी ने कहा, “यही जमने का इरादा है। क्या इन्हे तो सुबह भी देख लेगी घर चल।“

मैं भी उनकी एक आवाज पर उनके पीछे हो ली। जैसे ही हम गली के नुक्कड पर पहुचे फिर से कुत्तों ने भौंकना शुरू कर दिया। सामने से बिल्ली रास्ता काट गई। बिल्ली के रास्ता काटते ही मंजू भाभी कुछ पल के लिए वही खडी हो गई। तभी प्रकाश बुआ ने कहा, “अब रात के बारह बज रहे है। कोई नही आएगा। सारी रात रही खडी रहो जब कोई रास्ता काट जाए तब घर आ जाना।“

उनकी बात सुनकर सभी कुत्ते थे कि भौं – भौं किए ही जा रहे थे। सभी अपने -अपने घरो के दरवाजो को नोंक कर दरवाजा खुलने का इन्तिजार कर रहे थे जैसे ही दरवाजे खुले सभी एक दूसरे को गुड नाईट कर अन्दर चले गए ।


 नंदनी

  



Friday, 5 February 2016

अपनी खाटें, अपने चबूतरे

वे सभी लोग अपनी खाटें बिछा कर अपने चबूतरे पर बैठे थे तभी भोला आ गई और गली के बच्चे भोला के पीछे भागने लगे। भोला आ-आ। भोला बार-बार बच्चों को मारने के लिए भागती है तभी रामवती अम्मा बोली, ‘अरे ये बालको काहे पीछे पड़े हो जाके तंग न करो नाही तो तुमको तो मारीय! तभी भोला अम्मा के पास आके बैठी और कहा, ‘अरी अम्मा तुम ही तो एक जो मारी साइड लो सै।ऐसी बातें सुन पूरी गली हंसी में झूम उठी।

रामवती अम्मा के सामने वाले घर में एक अम्मा बैठी थी। वो उठी और रामवती अम्मा के कंधे पर हाथ रखती हुई बोली, ‘हाए अम्मा मर गई, अब कैसे होगी।तभी कला की दादी बोली, ‘अरे अब सारी जि़ंदगी तो काट डाली अब ई भी कट हि जाएगी।भोला कला की दादी की बातें सुन ताली मारकर हंसने लगी। भोला का चेहरा देख कला भी हंसते-हंसते कूदने लगा। कला भोला के पास गया और बोला, ‘अरी भोला थोड़ा डांस करके दिखा दे।भोला बोली, ‘अरे मरझासू थारी मां ने तने ई लक्क्षण सिखाये अपनी मां नु बोल कि मारेको अच्छी बातें सिखावे।तभी रामवती अम्मा बोली, ‘अरे भोला काहे लगती है तु इस बच्चे के मुंह अब जाने दे।गुस्से से लाल चेहरा लिए उसकी दादी उठी और कला को खचेड़ के कमरे में ले जाकर छोड़ दिया। अम्मा बोली, ‘अरी कला की दादी तुम घड़ी जल्दी गुस्सा हो जाती हो, थोड़ा गुस्सा कम किया करो, हरदम नाक पर गुस्सा धरा शोभा नहीं देता तो तुमरी नाक भी तुमही से गुस्सा हो जाएगी फिर थै को मनाना पड़ेगा।

रामवती अम्मा बोली, ‘अरे तू अपनी बातें अब इतनी भी मत सुना बाको कि तोई पर टूट पड़े।पूरी गली के लोगों की नज़रें उनको ताके जा रही थी। भोला उठी और अम्मा का हाथ पकड़ते हुए बोली, ‘अच्छा अम्मा अब मैं जा रही हूं और एको बात कहे देती हूं मारी बजा से आपको लड़ने की जरूरत न सै।भोला वहां से चलने लगी फिर वो ही बच्चे भोला के पीछे पड़ कर उसको तंग करने लगे। भोला ने पत्थर उठाया और बोली, ‘मैं मार दूंगी आगे आने की कोई ज़रूरत न सै।भोला ये कहकर धमकाने लगी जब बच्चे भागने लगे तभी भोला ने पत्थर झट से नीचे फेंका और फटाक से ग़ायब हो गई। जब बच्चों ने वापिस मुड़कर देखा तो भोला भाग चुकी थी। भोला को अजीब तरह से भागते देख हंसने लगे फिर वहां से लड़के भी भाग गए थे। सभी लड़के रामवती अम्मा के घर के सामने खड़े हो गए। अपनी खाट पर बैठते हुए बोली, ‘अरे नास्पीटो अब यहां खड़े हो गए। भोला को परेशान कर जी नाही भरा तुम्हारा।लड़के रामवती अम्मा की ये बात सुनकर हंसने लगे और धीरे-धीरे वहां से खिसक लिए। तभी मुन्ना भाई बोला, ‘अरे ताई क्यों डांटती हो विचारे कहा जाएंगे!रामवती अम्मा मुन्ना भाई की बात काट कर बोली, ‘अरे ये समय कितनी जल्दी बीत गयो पता ही कोनी चला। अरे ये मुन्ना जा लाईट जला दे सारी गली में अंधेरा ना रहेगा।मुन्ना भाई ने गुस्से में लाईट तो जला दी पर बड़बड़ाने लगे कि अपने घर की लाईट नहीं जलाती की कही बिल ना आ जाए। तभी रामवती अम्मा बोली, ‘ये मुन्ना का बड़बड़ा रहा है?’ मुन्ना भाई बोला, ‘कहां मैं कछु तो नाही बड़बड़ा रहा हूं!ये कह मुन्ना भाई भी अपने घर निकल गए। उस लाइट की रोशनी ने अपने पंख पूरी गली में पसार दिए थे अचानक लाईट चली गई।

मुन्ना भाई बोला, ‘लाईट जलाने का कोई फायदा नहीं हुआ पूरी गली फिर शांत हो गई।गली में मानो कालिक सी छा गई हो। किसी को कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। सभी लोग अपने अपने घर में घुस गए। कोई कहता कि मरी ये लाईट इसको भी अभी जाना था। थोड़ी देर बाद न जा सके। तो कोई कहता मैं तो सोने जा रहा हूं। रामवती अम्मा बड़बड़ाते हुए अपनी खाट पर बैठ गई। गली में सन्नाटा छा गया। कोई गली के बाहर से काले वस्त्र धारण किए मुंह पे भूत का मुकुट लगाए चुपचाप रामवती अम्मा की तरफ़ बड़ रहा था। वो शख़्स रामवती अम्मा की खाट पर बैठ गया। रामवती अम्मा को कुछ नहीं पता था। वो नींद में थी। वो अम्मा के पैरों में गुदगुदी करने लगा। अम्मा की चोटी गुथी हुई थी पर उसने जुड़ा बना दिया तभी रामवती अम्मा की आंख तभी खुल गई। अम्मा उस शख़्स को अपनी खाट पर बैठा देख ज़ोर से चिल्लाई। पूरी गली में अम्मा की आवाज़ गूंज उठी। पूरी गली के लोग बाहर आ गए। रामवती अम्मा की दोस्त बोली, ‘अरे का हुआ रात में भी तने चैन न सै, इतने खन भी कोई भूत देख लिया का!ये सुन वहां खड़े लोग हंसने लगे। रामवती अम्मा बोली, ‘तुम हंसने के लिए खड़े हो, यहां मैं डर के मारे मरी जा रही हूं। जाओ यहां से नालायक कहीं के!इतना सुन सब अपने घर की ओर निकल गए तभी उनकी बहु आई और कहने लगी, ‘क्या हुआ काहे इतना शोर मचा रखा है?’ रामवती अम्मा ने सभी बातें अपनी बहू को बताई। उनकी बहू बोली, ‘आपको आराम की जरूरत है। आप बौखला चुकी हो!आसपास के लोग भी उन दोनों की बातें सुन रह थे। बौखला शब्द सुन सभी लोग हंसने लगे। रामवती अम्मा बोली, ‘अरे मर जाओ जाके, हंसी छूट रही है। अपने घरों में चले जाओ। अगर उठ गई तो छोडूंगी नहीं!वो लोग हंस कर अपने घर चल दिए। जब अम्मा की बहू अंदर चली गई तब वो शख्स फिर से रामवती अम्मा को तंग करने के लिए आ गया। अजीब-अजीब सी आवाज़ें निकाल कर उनको डरा रहा था। रामवती अम्मा जाग रही थी। उन्होंने सोचा अब देखूंगी कौन है वो! अम्मा हिम्मत करके उठी और उसके मुखौटे को ही पकड़ा। अम्मा ने मन में कहा आज तो मुझे देखना है कि इस मुखौटे का राज क्या है! उन्होंने कस कर मुखौटा पकड़ रखा था, तभी मुखौटा निकल गया। अम्मा चिल्लाने लगी फिर से सभी परेशान होकर उनके पास आए। कला की दादी बोली, ‘अरे ये का नौटंकी लगा रखी से, खुद तो सोती न है, हमें भी सोने न देती है। अम्मा बोली - थे अपनी बातें चुप करो, मारी बात सुनो। अगर तुम्हारे पास एक इंसान भूत का मुखौटा लगाकर चुपचाप बैठ जाए तो तुम्हें डर नहीं लगता पर फिर भी मैंने हिम्मत की और उसका मुखौटा हटाया पर मैं उसका चेहरा नहीं देख सकी, मैं चिल्लाने लगी और तुम टपक गए।सभी अम्मा की बात सुनकर हंसने लगी। अम्मा बोली – इस बात का पता लगाकर रहूंगी।


... प्राची

Sunday, 7 June 2015

मेरी छत और आवाज़ें

पिछली दोपहर मै छत पर खड़ा होकर आसपास की आवाज़े सुन रहा था। मुझे उस समय बहुत अच्छी-अच्छी आवाज़े सुनाई दे रही थी जैसे- फट्र-फट्र की बहुत तेज आवाज़ थी। जिसे मैं समझ ही नहीं पा रहा था की वो किस चीज की है। एक और आवाज़ जो हवाई जहाज़ की थी। कुछ ऐसी झूं-झूं करके लगातार आ रही थी। इन आवाज़ों को सुनने में इसलिए भी मज़ा आ रहा था की ये मेरी समझ से बाहर थीमुझे आवाज़े सुनने में बहुत मजा आ रहा था। उस वक्त समय ग्यारह  बज रहे थे। कड़ी धूप थी, पत्ते लहरा रहे थे। दूर आसमान में उड़ती चील अपने दोस्तों के साथ खेल रही थी। पार्क में सारे बच्चे लट्टू खेल रहे थे, जिसकी आवाज़ झन-झन करती हुई मेरी छत तक आ रही थी। पार्क के कोने में बहुत सारे कबूतर फड़फड़ा रहे थे। सामने एक और पार्क था बिल्कुल सुनसान। लौहे के लगे झूले हवा से हिल रहे थे। मैं उन्ही को देखने मे इतना मगन था। की इतने में मेरे हाथ पर बार-बार एक चीटी मुझे छूकर गुजर रही थी। उसने मेरा ध्यान अपने मे लगा लिया। मैं उसको हाथ पर चलते हुए देखने लगा वह अपनी ही धून मे मेरे हाथ पर पर कि तरफ चड़े ही जा रही थी मानो उसने ठान रखा हुआ था कि आज वो हिमालय की चढाई पूरी कर लेगी। मैं उसी मे खोया हुआ था कि मेरी आंखे जलने लगी। मैंने आंखे उठा कर देखा सामने बहुत सारी लकड़ियों के ठेरे मे कुछ लडको ने आग लगा दी थी। अभी कुछ देर पहले तो यहाँ कुछ नही था। लकड़ियाँ सामने पड़ी थी ऐसे कि मानो जैसे कोई इनमें अभी आग लगाने वाला है। वहीं पर कुछ राजमिस्त्री भी बड़ी लगन से काम कर रहे थे। मिस्त्री पत्थर काटने की मशीन चला रहे थे। मशीन घड़-घड़ करती हुई चल रही थी जो बहुत शोर कर रही थी। अब समय साड़े बारह बज चुके थे जो कि मेरे स्कूल जाने का समय था इसलिए मैं चलने के लिए तैयार हो गया। मेरी छत से मेरा स्कूल दिखाई देता है। मैंने अपने स्कूल की ओर देख ही रहा था की कोई बहुत तेज आवाज़ आई। लगता था की कोई चिल्ला रहा है। मैं कुछ देर तक समझ ही नहीं पाया की ये है कौन? मैं अपनी गली में झाँकने लगा। पर मुझे कोई दिखा नहीं। मेरा दिमाग इसी तेज आवाज़ में खो गया और मेरे कान यहाँ वहाँ की आवाज़ों में खोने लगे। मैं पूरी तरह से पागल से हो गया। की किसे देखू और किसे सुनू। इसी पागलपन में मैं छत से उतर गया।


नीचे आया तो वही आवाज़ और तेज हो गई। देखा तो सामने वाले घर आ रही है। दवाज़ा बंद था मगर आवाज़ इतनी तेज थी की लोग उस घर की तरफ में मुह करके खड़े थे। समझ तो नहीं आ रहा था की क्या मजरा है लेकिन मालूम तो हो ही जायगा क्योकि गली अब पतली हो गई है। 


रवि

Monday, 18 May 2015

एक और बिस्तर

रोज की तरह आज भी दोपहर के करीब तीन या चार बज रहे होंगे। सभी गली में बातें करने में जुटे हुये थे। औरते अपनी मंडली में खोई हुई थी और बच्चे स्कूल की थकावट को दूर करने के लिए गली में दौड़ लगा रहे थे। पूरी गली में धूप बिखरी थी। कहीं – कहीं पर ही छाया थी, जिसका सहारा लेकर
औरतें अपनी कहानियाँ बुनने में लगी थी।

इतने में गली के कोने से एक अधेड़ उम्र की औरत भागते हुये दाखिल हुई। उस औरत की रंग-बिरंगी चुन्नी सिर से लेकर गले तक पड़ी हुई थी। वे गली के एक बड़े से चबूतरे पर तीन – चार औरतों के बीच जा बैठी और बोली, “क्या तुमने सुना है? पिछली गली से दो बच्चे गायब हो चुके हैं।“

उस औरत को कोई जानता तो नहीं था। लेकिन वो इस तरह से उनके बीच में बैठी थी की जैसे गली में वो सभी औरतों को जानती थी। बात ही कुछ ऐसी थी की उसके लिए किसी के साथ खास रिश्ता बनाने की कोइ जरूरत नहीं पड़ती।

वो फिर से बोली, “अरे वो ही समोसे वाले के पोते। अरे बड़े दुखी है वो। मैं वहीं से आ रही हूँ।“

सभी सुन रही थी। सभी को जैसे उस औरत की इस बात ने अपने में समा लिया था। उन्ही औरतों के बीच में बैठी एक औरत ने चौंकते हुये कहा, “वहीं जिनका कोने वाला मकान है?

“हाँ, हाँ वही।“ वो हाँ में हाँ मिलते हुये बोली।
उनके साथ वाली एक और औरत अपने पल्लू को आगे और खिसकाते हुये बोली, “उनपर क्या बीत रही होगी? उस माँ का क्या हाल हो रहा होगा?”

बातें दो औरतों के बीच में घूम रही थी मगर उसका असर सभी पर छाया हुआ था। की तभी साथ से अंजली हड़बड़ी में उठी और जोरों से चिल्लाने लगी, “नन्नो ओर नन्नो, कहाँ गई मेरी बच्ची?

अंजली को यहाँ पर सभी जानते है। कई बच्चो का अकेली सहारा अंजली, उनका घर बच्चो से भरा रहता है। उनका घर जैसे अंजान बच्चो के लिए किसी खेलने की जगह से कम नहीं है। ऐसा मैदान जहां पर कोई नहीं आकर खेल सकता है।

साथ वाले घर से निकलती चार या पाँच साल की लड़की ने कहा, “मम्मी में तो अंदर थी, टीवी देख रही थी। अंजली उस लड़की को अपनी गोद में बिठाती हुई बोली, “मेरी लाड़ो घर से बाहर मत निकलियों, कोई तुझे उठा कर ले गया तो मैं क्या करूंगी?” और वो बच्ची भोचक्की सी अपनी माँ को देखने लगी। अंजली ने उस लड़की को अपनी गोद में ही बैठा लिया। औरतों के बीच की बातें थोड़ी धीमी सी पड़ गई लेकिन बंद नहीं हुई थी।

दूसरी औरत उस चुप बैठी अंजली से बोली, “तू घबरा क्यों रही है? कुछ नहीं होगा हमारे बच्चो को, देखते है की कोई कैसे ले जाता है इन्हे।“

अंजली कुछ नहीं बोली, यहाँ पर सभी उसकी इस बेचैनी को जानती थी।
सब खामोश हो गई। कुछ ही देर के बाद में धीरे – धीरे सब कुछ सिमटने लगा। औरतें अपने अपने घरों की ओर लौटने लगी। और बीच में रह गई वो बात जिसने अपनी ही गली और उसमे आते नए लोगो को एक नए तरीके से देखने का नज़रिया दे दिया था।    

गली में एक ज़ोरदार आवाज़ हुई, सभी गली के लोग एक दम से बाहर की ओर आए। देखा की एक बच्चा बहुत जोरों से रो रहा है और यहाँ – वहाँ छुपने की कोशिश कर रहा है। सभी उसकी उस बेचैनी को देख रहे थे। कोई भी उस बच्चे की ओर नहीं जा रहा था। वो बच्चा लगातार रोये जा रहा था। इतने में वो एक घर के चबूतरे पर जाकर लेट गया। कुछ देर के लिए वो शांत हो गया। मगर अब आवाज़े दूसरी तरफ बिखर रही थी।

प्रेस वाले अंकल चिल्लाये, “अरे किसका बच्चा है ये?”
सब्जी वाले भैया, “पता नहीं लगता है किसी और ही गली का है?”
एक औरत ने कहा, “अरे देख तो लो कहीं बेहोश तो नहीं हो गया।“
दूसरी औरत ने बोला, “बेचारा ये तो गरम भी है।“
गली के दादा जी बोले, “देख क्या रही हो उठा तो इसे, यहाँ ले आओ मेरी खाट पर।“
सभी उसे उठा कर वहाँ पर ले गए।

“लगता है कहीं और है ये यहाँ का तो नहीं लगता।“
“ये कहीं छुट तो नहीं गया?, पिछली रात में यहाँ पर बारात आई थी।“
“लग तो यही रहा है।“
“थोड़ी देर रुक जाओ क्या पता कोई इसे ढूँढता हुआ आ जाए।“
“हाँ, हाँ, ऐसे ही करलो।“

वो बच्चा तो जैसे सो चुका था। सभी उसके जागने का इंतजार कर रहे थे और साथ ही उसके ढूँढने आने वाला का भी। लेकिन काफी देर हो चुकी थी। वो लड़का जब नहीं उठा तो उसके मुह पर पानी का छिड़काव किया गया। लेकिन वो नहीं उठा। सभी में एक हड़बड़ी सी उठने लगी। सभी के सभी उसे नजदीक के डाक्टर के पास में ले जाने के लिए भागे।

“चलो, चलो उठाओ, कहीं लड़के को कुछ हो ना जाए?”
“अरे पता तो करो की ये कहीं आसपास का ही तो नहीं है?”

गली के एक दो लड़को को यहाँ वहाँ भेजा गया। गली में सिर्फ औरते रह गई और आदमी उस लड़के को लेकर डॉक्टर के पास में ले गए। उन औरतों के बीच में घुमसुम बाते होने लगी।
कोई कहती, “बताओ किसी के बच्चे को कोई उठा कर ले जाता है और किसी का बच्चा खो जाता है।“
“सही कह रही हो जीजी। दर्द तो दोनों ही सूरतों में होता है।“
“पता नहीं किस का बच्चा है?”
“मैं तो कहती हूँ की पुलिस में दे दो।“
“अरे नहीं वहाँ पर ये और बेचारा पागल हो जायगा”

कुछ ही देर में आदमियों का जत्था उस बच्चे को लेकर लौटा। साथ वो दोनों लड़के भी जो इसका पता लगाने के लिए आसपास में गए हुये थे। किसी को भी इसका नहीं मालूम था। वो समोसे वाले अंकल भी आए थे की कहीं उनका ही तो पोता नहीं है। पर ये उनका भी नहीं था। बच्चा सो रहा था। रात हो चुकी थी। बच्चा दादा जी की खाट पर ही सोया हुआ था। बातें धीमी हो चुकी थी। फैसला हुआ की बच्चे को ढूँढने वाले जब तक यहाँ नहीं आएगे हम इसे कहीं भेजगे।
“पर इसे रखेगा कौन?”
दादा जी ने कहा, “और कौन रखेगा?” मैं रखूँगा, मेरे पास ही सो जायगा।“
सब्ज़ीवाले अंकल बोले, “अरे बच्चा खायगा, कपड़े सब कुछ चाहिए ही।“

कौन रखेगा, कौन रखेगा, का नारा और परेशानी सभी में देखी जा सकती थी। इतने में अंजली गली के अंदर आती हुई दिखाई दी। सभी की आँखों में जैसे खुशी छलक आई थी। जैसे ही अंजली उनके करीब आई तभी दादा जी ने कहा, “बेटा अपने घर में एक बिस्तर और कर दे। ये देख कौन है?”

अंजली उस बच्चे को देखती रही। छ: या सात साल का बच्चा, नंगा और सोया हुआ। वो कुछ नहीं बोली। जो भी करना था वो बाद में होता रहेगा। सबसे पहले वो उसे अपने घर में ले जाने के लिए खड़ी हुई। गली के बीच में खड़े लोगो से जैसे किसी बहुत ही बड़ी परेशानी खत्म हुई थी। दादा जी जाते हुये बोले, “जब तक इसके घर वाले इसे खोजते हुए नहीं आ जाते तब तक इसे रख ले।“


आज दो साल हो चुके है मगर उसे लेने कोई नहीं आया। कई शादियाँ हुई, हादसे हुये लेकिन अंजली के घर का शोर बढ़ता गया है कम नहीं हुआ।   


नंदनी

Friday, 13 March 2015

सवा 8 का वक्त

लगभग सवा 8 का समय हो रहा होगा। हर्षा मज़े से कमरे में कंबल औड़े टिक्की का मज़ा ले रही है। मम्मी खाना बना रही है। हर्षा सोच रही थी अगर कुरकुरे होते तो मज़ा आ जाता। उसने झट से बिस्तर का कपड़ा हटा कर उसमे पैसे टटोले पर पैसे नहीं मिले। वह कुछ पल के लिए सोचने लगी तभी उसकी बहन शारदा ने नीचे से आवाज़ लगाई।

 “हर्षा ओ हर्षा”
हर्षा कंबल को हटा एक तरफ फेंक झट से जीने में आ गई।

शारदा बोली, “अरे अम्मा तसले में आग जला रही है।“

अम्मा आग जलाते हुये गाना गुनगुना रही है।
“कैकई तूने ज़ुलम गुजारे वन में भेजे लक्ष्मण राम”

उनका गाना जैसे जैसे आगे बड़ रहा है वैसे वैसे तसले की आग भी आसपास के माहौल में गर्मी बिखेर रही है। अम्मा अपने गाने को लगातार गुनगुनाए जा रही है। अम्मा को अकेला बैठा देख पडोस वाली रजवती अपना पतला उठाए उनके बगल में आ कर बैठ गई। अम्मा अपने गाने में इतना मग्न है की राजवाती को अपने बगल में बैठने का एहसास भी नहीं हुआ। अम्मा का गाना सुनकर राजवती भी उसे गुनगुनाने लगे। धीरे धीरे महफिल में और लोग शामिल होने लगे।

तभी गाना खत्म होते ही राजवती बोली, “अम्मा लोहड़ी भी आने वाली है। इस बार गली में लोहड़ी मनाओगे?

अम्मा ने कहा, “अरी आने तो दे, तब की तब देखी जाएगी।“

रजवती उन्हे एक नजर देखकर चुप हो गई।

उसे देखकर अम्मा फिर से बोली, “अरे तू चुप क्यों हो गई? क्या मैंने कुछ गलत कह दिया?”

राजवती बोली, “अम्मा ऐसी बात नहीं है।“

अभी उनकी बात खत्म भी नहीं हुई थी की इतने में नाईन आ गई और बोली, “मैंने अभी अभी काम खत्म किया है। हाथ पैर एक दम ठंडे बर्फ जैसे हो रहे है।“

ये कहते हुये वो राजवती को कान्धो से पकड़ कर, आगे की ओर धक्का देते हुये थोड़ी सी जगह बनाकर बैठ गई और आग तापने लगी। थोड़ी देर के बाद में अम्मा बोली, “अरी मैं तो भूल ही गई, खाली बैठी हु थोड़ा स्वाटर ही बुन लूँ। अम्मा उठी और अंदर से ऊन और सिलाई उठा लाई और आकर अपनी जगह पर बैठ गई, स्वाटर बुनने लगी। बुनते हुये बोली, “अरी अभी थोड़ी देर पहले राजवती ने कहा था की लोहड़ी मनाएगे पर पता नहीं मैं ऐसा क्या कह दिया की तब से ये चुप और फुली बैठी है।“

नाईन बोली, “अरे मुझे तो ध्यान ही नहीं रहा था की लोहड़ी भी आने वाली है। पर ये हमारा त्योहार नहीं है। हमारा तो संकरात है।“

अम्मा बोली, “अरी संकरात हो लोहड़ी, त्यौहार तो त्यौहार होते हैं। इन में सारी गलियाँ और लोग खुशी मनाते है।“

ये सुन नाईन अम्मा का मुंह ताकने लगी।

राजवती बोली, “मैं तो त्यौहार की ही बात कर रही थी। तो अम्मा ने कह दिया की “देखेगे” और अब खुद ही त्यौहारों की बातें कर रही है।“

अम्मा ने कहा, “त्यौहार तो अच्छे लगते हैं। पर फिर भी बजट की भी तो बात है। अभी हाँ करूँ या ना करूँ। ऐसा ठीक नहीं रहता।“

अभी राजवती कहने लगी, “हाँ सही कह रही हो अम्मा। जब मैं दिल्ली में आई थी तो दूध सात रुपए किलो मिलता था और अब दूध भी 19 रुपए का आधा किलो मिलता है। अब तो सुबह का नाश्ता ही 100 या 150 रुपए में होता है।“

तभी झट से नाईन बोली, “100 का नोट यूं खुलता है और यूं गायब हो जाता है।“

राजवती बोली, “हाँ ये तो तुम ठीक कह रही हो। हमारे गाँव में मूँगफली यूं ही मुट्ठी भर भर कर अनाज के बदले में ले लिया करते थे। गाँव में भी अब तो बिना पैसे के हाथ भी नहीं रखने देते। दिल्ली में तो और आग लगी है। यहाँ पर हर चीज के दाम आबे के ताबे मांगते है। त्यौहारों में तो और भी महगाई बड़ जाती है।“

तभी अम्मा बोली, “हमारे गाँव में खेतों से मक्का आती है और गाँव में भड़भूजे के यहाँ झोली भर भर कर ले आते थे। आज गली में मक्का भुनने वाला आता है। मरा एक मुट्ठी मक्का भी 10 रुपए के देता है।“

तभी राजवती हँसते हुये बोली, “अम्मा वो मक्का नहीं है। वो तो पोपकोर्न है पोपकोर्न।“

अम्मा खिसियाते हुये बोली, “मरे अंग्रेज़ चले गए ये अँग्रेजी छोड़ गए। और लोहड़ी में मक्का और मूँगफली के दाम भी आसमान छु जाते हैं। अब क्या खरीदे और क्या खिलाये। ये तो अच्छा है की गली में सभी पैसे मिलकर समान खरीद लेते हैं तो बच्चो को खाने को मिल भी जाता है। वरना अकेले अकेले तो कोई कुछ भी नहीं खरीद पाएगा और त्यौहार भी नहीं मना पाएगा।“

ये कहते हुये अम्मा ने एक लंबी सांस छोड़ी। तब तक तो आग भी बुझ चली है। नाईन एक तिनके से तसले में बुझी राख को कुरेद रही है। जैसे उस राख़ से कोई चिंगारी ढूंढ रही हो जिससे उन्हे कुछ गरमाई मिल जाए।

राजवती उठते हुये बोली, “समय का पता ही नहीं चला। अभी तक स्नेहा के जीजा नहीं आए। ठंड काफी बड़ती जा रही है।

अम्मा बोली, “तेरे लिए ही तो बैठे थे। चलो अब कल बैठेगे”

इतना कहकर सभी अपना अपना पतला उठा कर अपने अपने घर की तरफ चल दिये।

चेतना.....  

मौहल्ले में चुनावी रंग

ठंड से कंपकपाते दांत, मुंह से निकलता धुआं, गली के नुक्कड़ पर सड़क के किनारे जलती आग का उठता धुंआ, आसमान में उड़ते कोहरे को और घना कर रहा था जिसको देख शरीर में सिहरन सी दौड रही थी। मन तो आग की गर्म-गर्म लपटों के सामने जाकर बैठने को कर रहा था। वहीं गली के नुक्कड़ पर प्रेस वाले काका दोपहर से ही आग जलाने का इंतज़ाम कर रहे थे। जहां भी कागज़ या पन्नी दिखाई पड़ती उसे उठाकर अपनी दुकान में रख लेते। यह तो उनका रोज़ का काम बन चुका था। अगर उनके घरवालों ने उसे कूड़ा समझ कर फेंक दिया तो उनकी पूरे दिन की मेहनत पर पानी फिर जाएगा।

आज फिर रात की तैयारी के लिए वे दुकान के अंदर अलमारी में रखे कागज़ व पन्नियों का ढेर हाथ में लिए बाहर आए और अलमारी के नीचे रखे कडि़यों के गट्ठर की संभाल कर उठाते हुए, उसे बाहर की तरफ़

घसीटते हुए ले आए और एक ठंडी आह भरते हुए कुछ देर वहीं खड़े उस लकड़ी के गठ्ठर को देखने लगे।

उन्होंने छत की तरफ़ देखते हुए जोर से चिल्लाकर कहा,

”लल्ला ज़रा माचिस तो फेंकना, हाथ गर्म कर लूं।”

लकडि़यों को दुकान के कोने में करीने से रखकर उनके नीचे पन्नी व कागज़ों को लगाकर आग जला दी और कुर्सी पर बैठते हुए बोले, ”अरे दीपक आजा, तू भी हाथ गर्म कर ले।”

काका ने सामने की दुकानवाले से कहा। उनकी बात उनके बगल वाले ने कहा, ”काका मुझे नहीं बुलाओगे?”

”अरे संजय अपनों को न्यौता देने की जरूरत नहीं होती! आ तू भी बैठ!”

वह मुस्कुराते हुए अपनी दुकान का शटर बंद कर उस तरफ़ चल दिए और हंसते हुए काका से कहने लगे, ‘लो भई काका हम भी आ गए सुनते हुए काका ने कहा, ‘हां-हां बैठो दीपक की दुकान से बेंच मंगवा लो वह कुछ देर खड़ा होकर सोचने लगा और फिर दीपक की दुकान से बेंच मंगवा लो।’ वह कुछ देर खड़ा होकर सोचने लगा और फिर दीपक को आवाज़ लगाते हुए वाले ‘दीपक बेंच लो आ काका की आग भी जल गई।’

काका हंसते हुए बोले, ‘देख लो, भई लकड़ी, कोयले मंहगे होने के बावजूद भी मैं तुम्हारे लिए पूरा इंतज़ाम रखता हूं।’

सुनते ही केमिस्ट वाले ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘अरे काका, आपके रहते हुए कैसी टेंशन। महंगी तो हर चीज़ है!’

‘पेट्रोल के दाम घट गए है।’ दीपक बोला,

काका खिसियाते हुए बोले, ‘कितने दिन?’

‘कितने भी दिन हो पर घटे तो हैं!’ दीपक ने कहा

दोनों की बात काटते हुए फिर से केमिस्ट वाले ने कहा, ‘जब तक चुनाव नहीं होंगे तब तक तो दाम घटते ही रहेंगे। एक बार चुनाव तो हो जाने दो फिर तो सभी के दाम सातवें आसमान पर पहुंच जाएंगे।’

काका ने आग तापते हुए माहौल में एक गर्म चिंगारी छोड़ दी।

‘इस बार दिल्ली में किसकी सरकार बनेगी?’

सड़क पर चलती रफ़्तार से गुजरती बाइक की ढर्र-ढर्र की आवाज़ में काका का सवाल खो गया। यह देख दीपक ने फिर काका का उकसाते हुए कहा, ‘काका क्या कह रहे थे!’

काका ने मूंछों को ताव देते हुए कहा, ‘मैंने पूछा किसकी सरकार बनेगी?’

आग धीरे-धीरे कम हो रही थी पर चुनावी बातचीत की आग बढ़ती जा रही थी। बगल वाले सभी टेलर मास्टर भी अपने-अपने काम को समेट बातचीत का हिस्सा बनने लगे।

टेलर मास्टर ने कहा, ‘सरकार तो भाजपा की ही आएगी।’

काका सरकार तो भाजपा की ही आएगी।

सलीम टेलर मास्टर जी की बात को काटते हुए बोला, ‘इस बार फिर से आम आदमी की सरकार बनेगी। अब भी बस उसकी बारी है मुझे तो लगता है कि आम आदमी पार्टी ही जीतेगी!’

सुनते ही भौंहे उचकाते हुए काका भी सलीम का हाथ पकड़ उसके समर्थन में खड़े हो गए, ‘ठीक कहता है बेटा!’

धीरे-धीरे चुनावी मजमा बढ़ने लगा। सड़क पर चलते हुए लोग भी इस बहस के हिस्सेदार बनने लगे। माहौल इतना गर्मा गया था कि केमिस्ट वाले ने काका के घुटनों पर हाथ रखते हुए कहा ‘काका पिछले दिन याद करो। हमें यहां किसने बसाया है? आज सब कांगे्रस को भूल बैठे हैं।’

‘नया नौ दिन पुराना 100 दिन।’ ये कहते हुए उन्होंने सभी के चेहरों की ओर देखा एक पार्टी है जो ग़रीबों के पक्ष में है।

‘अरे भाई क्या बात लेकर बैठ गए, कांग्रेस तो गई अब तो आम आदमी की बारी है। देखा नहीं मुख्यमंत्री होते हुए भी इंडिया गेट पर धरना देकर बैठ गया था। अब तक कोई मंत्री देखा है। उसके मन में सीट को लेकर तो कोई लालच नहीं था’

तभी नशे में झूमता हुआ एक शख्स हवा में हाथों को लहराते हुए वह काका की कुर्सी के पास टिक गया। काका आज तो महफिल पूरे जोश में है। अबे हमें क्या लेना-देना पार्टी में अपने को तो खाना और कमाना है। सभी एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। काका भी यह सुनते ही सलीम की बातों का जवाब देते हुए काका, कुर्सी से खड़े होते हुए जोश में बोले, ‘छोरे की बात में दम है, बस मौक़ा मिल जाए फिर तो सब कुछ बदल देगा।’ ये सुन सभी ने काका की बात का समर्थन करते हुए तालियां पीटनी शुरू कर दी। वही शराबी फिर से जोश में आते हुए काका से कहने लगा, ‘काका आप जिसे कहेंगे मैं उसे वोट दूंगा पर क्या फ्री में पिलाओगे? वह तो ख़ुद ही ग़रीब आदमी है, भीख मांग कर तो चुनाव लड़ रहा है। तुझे क्या खाक़ पिलाएगा। मौक़े पर चैंका मारते हुए केमिस्ट वाले ने कहा। काका भी बातचीत में ठहाका लगाते हुए बोले, ‘दारू तू पी लेना, वोट आम आदमी पार्टी को दे देना।’ ये सुन माहौल में हंसी की लहर दौड़ गई। आग कब की बुझ कर राख बन चुकी थी। किसी को पता ही नहीं था पर माहौल में चुनावी गर्मी का सभी की सांसें एहसास करवा रही थी। समय लगभग 12 बज चुके थे पर बातों का मजमा था कि टस से मस होने का नाम ही नहीं ले रहा था तभी काकी की आती आवाज़ ने सभी को समय का एहसास करवा दिया अब कब तक बैठे रहेंगे, अंदर आ जाओ। काका के कुर्सी उठाते ही पूरा हुजूम धीरे-धीरे सिमट गया।

... नन्दिनी

Sunday, 1 February 2015

अपनी ही गली में दूसरे की खिड़की से झांकना



वे सभी स्कूल में डांस की प्रैक्टिस कर रहे थे क्योंकि स्कूल में रेड एक्स डे की़ तैयारी बड़े जोर-शोर से चल रही थी। एक दिन बाद स्कूल में प्रोग्राम था। वे हमेशा कारिडोर में नाचते थे मगर उन्होंने मैम से बात की, तो मैम ने कहा कि स्र्पोट रूम के बराबर में जो छठी क्लास बैठती है उन्हें हॉल में शिफ्ट कर दो। सब काफी खुश होकर भागे और थोड़ी अकड़ से बोले, ‘सुनो, सब अपना बैग लेकर हॉल में चले जाओ! सभी तेजी से भागकर चले गए। संजना ने क्लास के सारे बेंच साइड में कर दिए और झाड़ू मार कर बोली, लो हो गया! जो कमरा उन्हें मिला था वह संजना की गली के एकदम सामने वाला था। जो कोई भी खिड़की से झांकता तो वह गली एकदम साफ दिखाई देती। संजना अभी सहेलियों का इंतज़ार ही कर रही थी कि उसकी नज़र खिड़की से बाहर पड़ी। उसने देखा कि उसका भाई जो काम पर गया था, वापस आ गया है। पर वह क्यों आ गया! उसने अपने आपसे पूछा। अभी बुदबुदा ही रही थी कि बड़ा वाला भाई और चाचा भी दादी को लेकर आ गए थे।

वह परेशान हो रही थी कि कब छुट्टी होगी। गली में भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। देखते ही देखते उसके घर के सामने सफेद टेंट लग गया था। यह सब देख उसके अंदर की बेचैनी बढ़ गई थी। वह अपनी बहन अलिशा, ईशिका, भावना के पास गई और उन्हें खिड़की के पास लाकर दिखाया। वे सभी एक गहरी सोच में डूब गए। कोई किसी से कुछ नहीं कह पाया, कुछ पल की खामोशी के बाद भावना बोली, मैडम से पूछ कर घर चलते हैं!

अलीशा ने कहा, नहीं, मैम जाने नहीं देंगी!

तभी मैडम आईं और उन चारों को डाँट कर बोली, तुम लोग यहाँ क्या कर रही हो
सभी वहाँ से चुपचाप निकलकर अपनी-अपनी क्लास में चले गए।

उसने क्लास में जाकर सिर झुकाकर आँखें बंद कर ली। सभी बार-बार पूछ रहे थे कि संजना क्या हुआ मगर उसके पास कोई जवाब नहीं था। वह चुपचाप रही। कब छुट्टी का घंटा बजा, पता ही नहीं चला।
वह तब भी यूं ही बैठी रही। तभी उसकी सहेली ने झिंझोड़ते हुए कहा, घर नहीं जाना! छुट्टी हो गई है! वह उठी और कंधे पर बैग टांग कर धीमे कदमों से चलने लगी। वह अपने आपको कमज़ोर महसूस कर रही थी। सड़क पार करते ही देखा रोज की तरह मंदिर पर जो चहल-पहल रहती थी, आज वह बात नहीं थी। रोज़ गाने बजते रहते थे, आज वह भी खामोशी में डूबा था। गली में एक खामोशी पसरी हुई थी।

अमीषा