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Monday, 24 August 2015

रब, सौरव

हर सुबह के शुरूआत जैसे एक नए अंदाज़ के साथ होती कभी पापा के गुर्राते चेहरे के साथ तो कभी सूरज की चमक के साथ। इसी तरह हर दिन एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता, कुछ पता ही नहीं चलता। हर रोज़ की तरह आज भी जब कदम चारपाई से उतरकर उस सुनहरी मिट्टी पर टिके तो जैसे पलभर में ही मेरी आँखें खुल गई। मैंने अंगड़ाई ली और चारों तरफ़ आसमान की सफेद चादर को निहारते हुए नज़र सामने सड़क पर घुमाई जहाँ से गुज़रते कई लोग जिन्हें देख अहसास हुआ कि कुछ अभी ठीक से सुबह हुई नहीं है। सड़क के कोने पर फेन, पापे वाले अंकल भी खड़े थे जो रोज़ाना छः बज से पहले ही हमारी गली में आ जाते है। पूरी सड़क पर लोगों की आवाजाही शुरू हो चुकी थी। मैं उठी और अंदर वाले कमरे में जा ही रही थी कि मेरी नज़र जा टिकी पार्क के नुक्कड़ पर, हमारे रिक्शे पर सोते हुए अपने मुँह को उधाये एक छोटे से बच्चे पर जो इतने कोहरे के बीच भी रिक्शे पर एक पतला सा पर्दा ओढ़कर सो रहा था। जिसे इस अंधेरे का कोई भी डर नहीं और न कोई एहसास वो तो जैसे गहरी नींद में पड़ा था जिसे देखते ही मेरे मन में कई सवाल उमड़ने शुरु हो गया . अरे ये कौन है? यही क्यों लेटा है? कहाँ से आया?

क्या इसे डर नहीं लग रहा, अपने आपसे ढेरों सवालों कर जब मुझे एक पल की राहत मिली, लगा कहीं ये सामने वाली भाभी का बेटा तो नहीं। मैंने खुद से ही मना करते हुए कहा, नहीं-नहीं वो यहाँ क्या करेगा। अपने आपमें डूबी मैं कई सवाल करती और खुद ही उनका जवाब खोज निकालती। तभी अंदर वाले घर से आती कुछ आवाज़ों ने मुझे चैकन्ना कर दिया। बाहर एक लड़का सो रहा है, पता नहीं कौन है? जब ध्यान से सुना तो पता चला कि दीदी भी पापा से उसी लड़के के बारे में बात कर रही थी। पापा चैंकते हुए बोले, ‘कौन? अपने रिक्शे पर। पापा जैसे यकीन ही नहीं कर पा रहे थे तभी मैंने दीदी की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, ‘दीदी ठीक कह रही है, पापा।सुनते ही पापा ने अपनी जेब से एक छोटा सा टॉर्च निकाला जो एक महीने से पापा की जेब में है। बेशक उसकी कीमत पाँच रुपये की है पर उसकी रोशनी इतनी है कि कितना भी घना अंधेरा हो उसे चीरते हुए रोशनी उभार देता है। उसी टॉर्च को जलाते हुए पापा ने हमें दिया और कहा, ‘जाओ देखकर आओ कौन है?’

हम टॉर्च को थामे अंधेरे के बीच उस नन्ही सी जान को देखने चल दिए। जब टॉर्च जलाकर देखा तो वो सुजल नहीं कोई आठ-नौ साल का लड़का था जो अपनी नन्हीं सी आँखों को बंद करे, नाक को सिकोड़े, होंठों को पिचकाए, गालों को फूला गहरी नींद में सो रहा था। हमने फिर से पापा को उसकी खबर दी। अब तो हमें सभी के उठने का इंतज़ार था। मेरे अंदर तो एक ही खलबली मची हुई थी कि आखिर ये कौन है? कहाँ से आया है? मेरे इन सवालों का जवाब, कहीं भी नहीं मिल पा रहा था। अपने इस जवाब को खोजने के लिए मैंने स्कूल की भी छुट्टी कर ली। धीरे-धीरे सूरज भी अपनी रोेशनी को आसमान के चारों तरफ़ फैला चुका था और आसपास के सब लोग भी उठ चुके थे। यहाँ तक की वो बच्चा भी उठकर अपने बिस्तर पर बैठा, आते-जाते लोगों को तांक रहा था। जो भी आता एक जोरदार आवाज़ के साथ कहता, ‘ये कौन है?’ ये कहते ही सभी की निगाहें उसी पर जा थमती।

कुछ ही देर बाद पलक झपकते ही उसे घेरे लोगों का जमघट लग गया। कुछ अपनी कमर पर हाथ रख कहने लगे, ‘अबे कहाँ का है तू?’ तो कुछ बड़े प्यार से उसका नाम पूछ रहे थे। कुछ आपस में बातें कर रहे थे, ‘अरे शीला देखियो, देखने में तो लगता है यहीं कहीं का है पर बताता भी तो नहीं।सभी के बीच मानो धीरे से फुसफुसाहट चल रही थी पर बच्चा जो लोगों की बातों को न सुनते हुए अपने में खोया नज़र आ रहा था लेकिन लोगों को वहीं फुसफुसाहट जैसे अभी भी बरकरार थी। लोगों के बीच कई किस्से उभर रहे थे, अरी आजकल तो बहुत बच्चे खो रहे है। हम तो अपने बच्चों को अकेला नहीं छोड़ते।

सामने वाली शीला आंटी बोली, ‘चलो खो भी गया तो कम से कम घर का पता तो मालूम होना ही चाहिए इतना बड़ा हो गया, घर का पता भी नहीं मालूम। हमारी पांच साल की कल्लो से ही पूछ लो, घर के पते से लेकर पूरे परिवार का नाम तक बता देती है।

Sunday, 7 June 2015

मेरी छत और आवाज़ें

पिछली दोपहर मै छत पर खड़ा होकर आसपास की आवाज़े सुन रहा था। मुझे उस समय बहुत अच्छी-अच्छी आवाज़े सुनाई दे रही थी जैसे- फट्र-फट्र की बहुत तेज आवाज़ थी। जिसे मैं समझ ही नहीं पा रहा था की वो किस चीज की है। एक और आवाज़ जो हवाई जहाज़ की थी। कुछ ऐसी झूं-झूं करके लगातार आ रही थी। इन आवाज़ों को सुनने में इसलिए भी मज़ा आ रहा था की ये मेरी समझ से बाहर थीमुझे आवाज़े सुनने में बहुत मजा आ रहा था। उस वक्त समय ग्यारह  बज रहे थे। कड़ी धूप थी, पत्ते लहरा रहे थे। दूर आसमान में उड़ती चील अपने दोस्तों के साथ खेल रही थी। पार्क में सारे बच्चे लट्टू खेल रहे थे, जिसकी आवाज़ झन-झन करती हुई मेरी छत तक आ रही थी। पार्क के कोने में बहुत सारे कबूतर फड़फड़ा रहे थे। सामने एक और पार्क था बिल्कुल सुनसान। लौहे के लगे झूले हवा से हिल रहे थे। मैं उन्ही को देखने मे इतना मगन था। की इतने में मेरे हाथ पर बार-बार एक चीटी मुझे छूकर गुजर रही थी। उसने मेरा ध्यान अपने मे लगा लिया। मैं उसको हाथ पर चलते हुए देखने लगा वह अपनी ही धून मे मेरे हाथ पर पर कि तरफ चड़े ही जा रही थी मानो उसने ठान रखा हुआ था कि आज वो हिमालय की चढाई पूरी कर लेगी। मैं उसी मे खोया हुआ था कि मेरी आंखे जलने लगी। मैंने आंखे उठा कर देखा सामने बहुत सारी लकड़ियों के ठेरे मे कुछ लडको ने आग लगा दी थी। अभी कुछ देर पहले तो यहाँ कुछ नही था। लकड़ियाँ सामने पड़ी थी ऐसे कि मानो जैसे कोई इनमें अभी आग लगाने वाला है। वहीं पर कुछ राजमिस्त्री भी बड़ी लगन से काम कर रहे थे। मिस्त्री पत्थर काटने की मशीन चला रहे थे। मशीन घड़-घड़ करती हुई चल रही थी जो बहुत शोर कर रही थी। अब समय साड़े बारह बज चुके थे जो कि मेरे स्कूल जाने का समय था इसलिए मैं चलने के लिए तैयार हो गया। मेरी छत से मेरा स्कूल दिखाई देता है। मैंने अपने स्कूल की ओर देख ही रहा था की कोई बहुत तेज आवाज़ आई। लगता था की कोई चिल्ला रहा है। मैं कुछ देर तक समझ ही नहीं पाया की ये है कौन? मैं अपनी गली में झाँकने लगा। पर मुझे कोई दिखा नहीं। मेरा दिमाग इसी तेज आवाज़ में खो गया और मेरे कान यहाँ वहाँ की आवाज़ों में खोने लगे। मैं पूरी तरह से पागल से हो गया। की किसे देखू और किसे सुनू। इसी पागलपन में मैं छत से उतर गया।


नीचे आया तो वही आवाज़ और तेज हो गई। देखा तो सामने वाले घर आ रही है। दवाज़ा बंद था मगर आवाज़ इतनी तेज थी की लोग उस घर की तरफ में मुह करके खड़े थे। समझ तो नहीं आ रहा था की क्या मजरा है लेकिन मालूम तो हो ही जायगा क्योकि गली अब पतली हो गई है। 


रवि

Monday, 18 May 2015

एक और बिस्तर

रोज की तरह आज भी दोपहर के करीब तीन या चार बज रहे होंगे। सभी गली में बातें करने में जुटे हुये थे। औरते अपनी मंडली में खोई हुई थी और बच्चे स्कूल की थकावट को दूर करने के लिए गली में दौड़ लगा रहे थे। पूरी गली में धूप बिखरी थी। कहीं – कहीं पर ही छाया थी, जिसका सहारा लेकर
औरतें अपनी कहानियाँ बुनने में लगी थी।

इतने में गली के कोने से एक अधेड़ उम्र की औरत भागते हुये दाखिल हुई। उस औरत की रंग-बिरंगी चुन्नी सिर से लेकर गले तक पड़ी हुई थी। वे गली के एक बड़े से चबूतरे पर तीन – चार औरतों के बीच जा बैठी और बोली, “क्या तुमने सुना है? पिछली गली से दो बच्चे गायब हो चुके हैं।“

उस औरत को कोई जानता तो नहीं था। लेकिन वो इस तरह से उनके बीच में बैठी थी की जैसे गली में वो सभी औरतों को जानती थी। बात ही कुछ ऐसी थी की उसके लिए किसी के साथ खास रिश्ता बनाने की कोइ जरूरत नहीं पड़ती।

वो फिर से बोली, “अरे वो ही समोसे वाले के पोते। अरे बड़े दुखी है वो। मैं वहीं से आ रही हूँ।“

सभी सुन रही थी। सभी को जैसे उस औरत की इस बात ने अपने में समा लिया था। उन्ही औरतों के बीच में बैठी एक औरत ने चौंकते हुये कहा, “वहीं जिनका कोने वाला मकान है?

“हाँ, हाँ वही।“ वो हाँ में हाँ मिलते हुये बोली।
उनके साथ वाली एक और औरत अपने पल्लू को आगे और खिसकाते हुये बोली, “उनपर क्या बीत रही होगी? उस माँ का क्या हाल हो रहा होगा?”

बातें दो औरतों के बीच में घूम रही थी मगर उसका असर सभी पर छाया हुआ था। की तभी साथ से अंजली हड़बड़ी में उठी और जोरों से चिल्लाने लगी, “नन्नो ओर नन्नो, कहाँ गई मेरी बच्ची?

अंजली को यहाँ पर सभी जानते है। कई बच्चो का अकेली सहारा अंजली, उनका घर बच्चो से भरा रहता है। उनका घर जैसे अंजान बच्चो के लिए किसी खेलने की जगह से कम नहीं है। ऐसा मैदान जहां पर कोई नहीं आकर खेल सकता है।

साथ वाले घर से निकलती चार या पाँच साल की लड़की ने कहा, “मम्मी में तो अंदर थी, टीवी देख रही थी। अंजली उस लड़की को अपनी गोद में बिठाती हुई बोली, “मेरी लाड़ो घर से बाहर मत निकलियों, कोई तुझे उठा कर ले गया तो मैं क्या करूंगी?” और वो बच्ची भोचक्की सी अपनी माँ को देखने लगी। अंजली ने उस लड़की को अपनी गोद में ही बैठा लिया। औरतों के बीच की बातें थोड़ी धीमी सी पड़ गई लेकिन बंद नहीं हुई थी।

दूसरी औरत उस चुप बैठी अंजली से बोली, “तू घबरा क्यों रही है? कुछ नहीं होगा हमारे बच्चो को, देखते है की कोई कैसे ले जाता है इन्हे।“

अंजली कुछ नहीं बोली, यहाँ पर सभी उसकी इस बेचैनी को जानती थी।
सब खामोश हो गई। कुछ ही देर के बाद में धीरे – धीरे सब कुछ सिमटने लगा। औरतें अपने अपने घरों की ओर लौटने लगी। और बीच में रह गई वो बात जिसने अपनी ही गली और उसमे आते नए लोगो को एक नए तरीके से देखने का नज़रिया दे दिया था।    

गली में एक ज़ोरदार आवाज़ हुई, सभी गली के लोग एक दम से बाहर की ओर आए। देखा की एक बच्चा बहुत जोरों से रो रहा है और यहाँ – वहाँ छुपने की कोशिश कर रहा है। सभी उसकी उस बेचैनी को देख रहे थे। कोई भी उस बच्चे की ओर नहीं जा रहा था। वो बच्चा लगातार रोये जा रहा था। इतने में वो एक घर के चबूतरे पर जाकर लेट गया। कुछ देर के लिए वो शांत हो गया। मगर अब आवाज़े दूसरी तरफ बिखर रही थी।

प्रेस वाले अंकल चिल्लाये, “अरे किसका बच्चा है ये?”
सब्जी वाले भैया, “पता नहीं लगता है किसी और ही गली का है?”
एक औरत ने कहा, “अरे देख तो लो कहीं बेहोश तो नहीं हो गया।“
दूसरी औरत ने बोला, “बेचारा ये तो गरम भी है।“
गली के दादा जी बोले, “देख क्या रही हो उठा तो इसे, यहाँ ले आओ मेरी खाट पर।“
सभी उसे उठा कर वहाँ पर ले गए।

“लगता है कहीं और है ये यहाँ का तो नहीं लगता।“
“ये कहीं छुट तो नहीं गया?, पिछली रात में यहाँ पर बारात आई थी।“
“लग तो यही रहा है।“
“थोड़ी देर रुक जाओ क्या पता कोई इसे ढूँढता हुआ आ जाए।“
“हाँ, हाँ, ऐसे ही करलो।“

वो बच्चा तो जैसे सो चुका था। सभी उसके जागने का इंतजार कर रहे थे और साथ ही उसके ढूँढने आने वाला का भी। लेकिन काफी देर हो चुकी थी। वो लड़का जब नहीं उठा तो उसके मुह पर पानी का छिड़काव किया गया। लेकिन वो नहीं उठा। सभी में एक हड़बड़ी सी उठने लगी। सभी के सभी उसे नजदीक के डाक्टर के पास में ले जाने के लिए भागे।

“चलो, चलो उठाओ, कहीं लड़के को कुछ हो ना जाए?”
“अरे पता तो करो की ये कहीं आसपास का ही तो नहीं है?”

गली के एक दो लड़को को यहाँ वहाँ भेजा गया। गली में सिर्फ औरते रह गई और आदमी उस लड़के को लेकर डॉक्टर के पास में ले गए। उन औरतों के बीच में घुमसुम बाते होने लगी।
कोई कहती, “बताओ किसी के बच्चे को कोई उठा कर ले जाता है और किसी का बच्चा खो जाता है।“
“सही कह रही हो जीजी। दर्द तो दोनों ही सूरतों में होता है।“
“पता नहीं किस का बच्चा है?”
“मैं तो कहती हूँ की पुलिस में दे दो।“
“अरे नहीं वहाँ पर ये और बेचारा पागल हो जायगा”

कुछ ही देर में आदमियों का जत्था उस बच्चे को लेकर लौटा। साथ वो दोनों लड़के भी जो इसका पता लगाने के लिए आसपास में गए हुये थे। किसी को भी इसका नहीं मालूम था। वो समोसे वाले अंकल भी आए थे की कहीं उनका ही तो पोता नहीं है। पर ये उनका भी नहीं था। बच्चा सो रहा था। रात हो चुकी थी। बच्चा दादा जी की खाट पर ही सोया हुआ था। बातें धीमी हो चुकी थी। फैसला हुआ की बच्चे को ढूँढने वाले जब तक यहाँ नहीं आएगे हम इसे कहीं भेजगे।
“पर इसे रखेगा कौन?”
दादा जी ने कहा, “और कौन रखेगा?” मैं रखूँगा, मेरे पास ही सो जायगा।“
सब्ज़ीवाले अंकल बोले, “अरे बच्चा खायगा, कपड़े सब कुछ चाहिए ही।“

कौन रखेगा, कौन रखेगा, का नारा और परेशानी सभी में देखी जा सकती थी। इतने में अंजली गली के अंदर आती हुई दिखाई दी। सभी की आँखों में जैसे खुशी छलक आई थी। जैसे ही अंजली उनके करीब आई तभी दादा जी ने कहा, “बेटा अपने घर में एक बिस्तर और कर दे। ये देख कौन है?”

अंजली उस बच्चे को देखती रही। छ: या सात साल का बच्चा, नंगा और सोया हुआ। वो कुछ नहीं बोली। जो भी करना था वो बाद में होता रहेगा। सबसे पहले वो उसे अपने घर में ले जाने के लिए खड़ी हुई। गली के बीच में खड़े लोगो से जैसे किसी बहुत ही बड़ी परेशानी खत्म हुई थी। दादा जी जाते हुये बोले, “जब तक इसके घर वाले इसे खोजते हुए नहीं आ जाते तब तक इसे रख ले।“


आज दो साल हो चुके है मगर उसे लेने कोई नहीं आया। कई शादियाँ हुई, हादसे हुये लेकिन अंजली के घर का शोर बढ़ता गया है कम नहीं हुआ।   


नंदनी

Tuesday, 21 April 2015

जश्न से भरी रात

आंखो पर पड़ता चौंधा और चारों तरफ लहराती रंग-बिरंगी लाल, हरी, पीली लाईटें जो चकाचक साईनिंग मारते लहरिया पर्दे की घूंघट की आड़ से तांका - झांकी कर रही थीकभी लाल रंग की बदलती लाईटें चेहरे पर अपनी चमक छोड़ जाती, तो कभी हरे रंग की पड़ती रोशनी हर तरफ के नजारे को अपने में रंगती हुई गुज़र जाती। इसी तरह पल-पल बुझ-बुझाती ये लाईटें जिनकी बदलती रोशनी सभी को डीजे की ओर खींचे चली जा रही थी। हर आते कदम इस तरह डीजे की ओर बढ़ने लगे थे कि मानो किसी के जन्मदिन में नहीं बल्कि डान्स के जुनून को साथ लिए कोई शोह दिखाने आए हैं। किसी की इस्टोन से जड़ी कंधे से सरकती साड़ी का पल्लू बारम्बार  खिसकते हुए डीजे पर लहरा रहा था तो कई तो नाचने में इस कदर मशरुफ हो चुके थे कि उन्हें तो अपने खिसकते कपड़ों का ही ख्याल न था, ‘‘ ये कुडि़यो का नशा प्यारे नशा सबसे नशीला है जिसे देखो वहीं यहाँ हुस्न की बारिश में गिला है, ये सबके नाम पर करते सभी हमराज लीला है मैं करू तो शाला करेक्टर ढीला है, मै करुं तो शाला करेक्टर ढीला हैं”
 
जोरो से कानो में गूँजते “रेडी” के ये गाने जो सभी को खुदके नशे में डुबोते जा रहे थे खाने से हटती भीड़ बस डीजे की ओर सिमटने लगी थी। टैन्ट ऐलोजिन की रोशनी से इस तरह जगमगा रहा था कि उसकी चकाचोंध हर तरफ अपना पहरा जमा रही थी। पूरे माहौल की सुगबुगाहट को बड़ाती तरह-तरह के खानो की महक जो हर तरफ बहकती ही जा रही थी। जहां एक तरफ गर्मा-गर्म रिफाइन्ड में इठलाती जलेबी की खुशबू सबको अपने बनने का न्यौता दे रही थी तो वहीं दूसरी ओर टन-टन पलटे पर पड़ती करछी की आवाज टैन्ट के कोने में होने का संदेशा दे रही थी। खाना बनाने वाले कारीगर भी हर आने-जाने वालो पर निगाहों की गश्त लगा रहे थे। लाईट की जगमगाती रोशनी में चकमकाते लोगो के कपड़ो के चाँद-तारे और साईनिगं मारने लगे थे  दूर से निहारती मेरी निगाहें टैन्ट में दाखिल होते हर शक्श को इतनी गहराई से देख रही थी कि नजरे उसी इंसान पर अटकी सी रह जाती। रंग-बिरंगी पन्नियों से चिपटे हाथों में थमे सभी के गिफ्ट हर किसी के साथ खुदकी भी मौजूदगी का अहसास करवा रहे थे। खिंचा-तानी, मौज-मस्ती सभी कुछ डीजे पर इस्टाट हो चुका था ‘‘ऐ आ जाना, चल शर्म किस बात की, अरे अम्मा थोड़ी साइड तो हो, जट यम ला पगला दीवाना, ओ रब्बा इतनी सी बात न जाना’’ ये तरह-तरह के चलते गाने जिनके शुरु होते के साथ ही सभी में बारम्बार एक जोश सा भर आता और फिर इसके चलते के साथ सब शुरु हो जाते डीजे को घेरती लोगों की तदाद घटने की बजाए बल्कि और बड़ती जा रही थी। नाचने का जुनून मानो सबके सिर पर चढ़ कर बोल रहा था। जैसे ही डीजे से कोई भी नया गाना निकलता तभी मेरी बेचैनी शुरु हो जाती कौन नाच रहा होगा? चल न छोड़ ये यहीं पर शुरु हो यहीं की यहीं खत्म हो जाती टैन्ट के बीच में पसरी गोल टेबल पर बिछे फूलो वाले पेपर के उपर सजा हुआ। निगाहों का आर्कषण बनता केक जिसकी छठी मंजिल बड़े अराम से उन मौज़ू500 लोगों को खुद मे बसाने के लिए बिल्कुल तैयार थी। ऊपर ही ऊपर मलाई की तरह चमकती सफेद क्रीम जिसने लाल रंग से खुद को वंश के रुप में रंग रंगा था। वंश जिसका आज जन्मदिन था वो ज्यादा बड़ा नही शायद एक साल का हुआ था। जो कभी एक हाथ से दूसरे हाथ तो कभी दूसरे से तीसरे हाथ तक पहुंचता हुआ लोगों की गोदी में झूल रहा था जैसे ही कोई दूसरा उसे गोदी में उठाता तभी वह उसे एक अजीब से चिड़-चिडे भाव के साथ देखता हुआ पहुँच जाता। उसका रोजाना खिलखिलाने वाला चेहरा आज इतनी भीड़ को देख एक चिड़-चिड़ा सा भाव उत्पन्न कर रहा था।

Monday, 6 April 2015

आज वो नही थी

आज उनकी कुर्सी खाली थी टेबल पर काली तनी वाला वो थैला भी नही था न ही उसके नीचे एक तरफ किसी की स्लीपर रखी थी। उनकी मेज दूसरी टीचरों के सामान से घिरती जा रही थी मानों वो चीजें उनके न होने के अहसास को जैसे दबा रही हों। पर दूसरों का सामान हटते ही फिर उनकी टेबल उनका इंतज़ार शुरु कर देती उनकी कुर्सी थोड़ा हिल कर दरवाजे पर उनकी राह ताकती और फिर एक लंबे इंतज़ार के साथ जैसे सभी शांत हो जाते। अमरजीत मैडम सोच रही थी कि आज आते ही किसी ने उनका कंधा थपथपाकर “और बढि़या नही पूछा न ही प्रार्थना की घंटी के समय किसी को अपनी धुन में चुस्त कदमों से मैदान की तरफ बढ़ता पाया गया यहाँ तक की स्टाफरुम के ओवन में रखे टिफिनों में आज वो चमकता हुआ स्टील का डिब्बा भी शामिल नही हुआ जो लंच के समय पूरी मेज पर घूमता और बंटता था। 

आज बहुत कुछ नही हुआ क्योंकि आज वो नही थी। स्टाफरुम की गपशप और चहल-पहल में एक शख़्स की कमी थी मिसिज़ कांता। जिनका होना बेशक किसी चर्चा या महफिल का हिस्सा न बने, लेकिन उनसे जुड़ी चीज़े हमेशा उनके होने में शामिल रहती हैं। कभी-कभी तो लगता है वो स्कूल की उन बुनियादी चीज़ों की तरह हैं, जिन्हे यदि हटा दिया जाए या उनकी जगह बदल दी जाए तो नज़रे उन्हे फौरन खोजने लगती हैं। ठीक वैसे ही मिसिज़ कांता किसी शोर में नहीं, किसी जि़क्र में नहीं, लेकिन सभी की तलाश में शामिल थी। 

पिछले 18 सालों से जुड़ी एक कडी़ जैसे टूटने को थी एक पहलू धुंधला पड़ रहा था पर रह-रहका एक अहसास जिंदा हो रहा था जिसमें न अफसोस था न वापिस लौटने की गुंजाइश बस एक कसक थी जो जब पुष्पा मैडम की आँखों में उतर आती, तो वो दोनो हथेलियां आपस में सहलाते हुए अपनी कुर्सी से थोड़ा उठकर कहती, हाँ” भई, चलो शशिकांता जी का आराम का समय भी आ गया, अब वो भी घर में बिज़ी हो जाऊँगी” और फिर अपनी बात का विषय बदल देतीं। वो इतनी शांत थी, लेकिन उनकी यादों में उतना ही शोर। उनसे छुपने, उनसे भागने के लिए ही सही, लेकिन बच्चे उन्हे स्कूल की गलियों में अब भी खोज रहे थे। मानो किसी ने सोचा ही न हो कि वो भी जा सकती हैं या चली गई हैं। दरवाजे की हल्की झिरी से, उनकी खाली कुर्सी को देखकर बच्चे वापिस लौट आते, हाँ” नही आई मैडम, सच में नही आई और बतियाते हुए अपनी क्लासों में चल देते। कोई काम न करने पर पिटने के उस खौफ से आज़ाद हो गया था, तो किसी की आँखों में उनके न आने पर वाकई एक कमी का अहसास था और हर कोने की हवा उनके जि़क्र में लेकिन अपना एक अंदाज़ लिए हुए थी। कोई कहता, और चल बढि़या है मैडम चली गईं, वरना पक्की शामत थी” तो कोई ये सोच रहा था कि उनके जाने से गणित की किताबें फिर से नीरस हो गई हैं। सब कुछ होते हुए भी कितना खाली था वो कोना,हाँ” खड़ी होकर मैडम प्रार्थना के समय कनखियों से बाकी टीचरों का निहारती थी। सभी का आपसी पहनावे पर बतियाना, किसी के सूट की तारीफ कर देना, तो किसी के शॉल की कढ़ाई को उंगली से छूकर भौंहें उचकाते हुए कहना,वाह” बड़ा सुंदर काम है आपके शॉल पर” इन सबके बीच भी शायद ही शशिकांता मैडम कभी कोई जुमला ढॅूंढती नज़र आई हों, उनके चेहरे पर तो सिर्फ सुबह की ताज़गी नज़र आती थी, और लिप्सटिक से चमकते हुए होंठो पर एक बड़ी सी प्यारी मुस्कान, जिसे किसी से बात शुरु करने के लिए किसी खास बिंदु की ज़रुरत नही थी। जब भी उनकी तरफ सहारे के लिए कोई हाथ बढ़ता, वो पहले ही कह देती,अपने लिए मैं अकेली ही काफी हूँ” और वाकई, ये बात वो ही नहीं, उनका लिबास भी कहता था क्योंकि न तो उसके कंधे पर रखे साड़ी के पल्लू को संभलने के लिए कभी पिन की ज़रुरत पड़ी, न ही कभी उनके कंधों ने पर्स की मजबूत तनियों को अपना गुलाम समझा। 

वो तो हमेशा उनके बाएँ हाथ के सहारे से उनकी बगल में दबा रहता, मानों उनके दिल के बहुत करीब हो। आज वो नजारा नही था जो लम्बी कतारों में बैठे बच्चों को आपस में बातें करने के लिए उकसाता था। सबकी नज़रें एक-दूसरे में नयापन ढूंढती, पर मिसिज़ कांता उस रोज़ वाले अंदाज में ही हर बच्चे की ज़ुबान पर छाई रहतीं। उनकी साड़ी की तारीफ कोई करे या न करे, लेकिन उनका पहनावा उन साथियों से ज़रुर जुड़ता, जो उनकी हरी साड़ी देख हरी मिर्ची, यानी आज मैडम गुस्से में हैं, आज पक्का मारेंगी, गुलाबी साड़ी, गुलाब का फूल कहकर खिलखिलाते। कभी कोई उनकी तारीफ में कुछ कह देता तो वो घूरकर गुस्से भरी अदा से डांट कर कह देती,चुप रहो, अपना काम करो” और कुछ बड़बड़ाती हुई सी चली जाती। वो छेड़छाड़, वो नोकझोंक भी आज नही थी बस था तो एक खालीपन और सहलाकर गुज़र जाने वाली उनकी यादें, जिनके साथ कोई हॅंस रहा था कोई हैरान हो रहा था तो कोई उन्हे अपने बीच शामिल कर रहा था। उनकी रिटायरमेंट की पार्टी वाले दिन स्कूल में जो खुशबू थी वो जैसे अभी तक यहीं समायी थी। लाइब्रेरी के सामने वाले आँगन में बैठे हलवाई, कढ़ाई से उठता हुआ धुआँ और हवा के साथ बहती पकवानों की खुशबू, स्कूल के एक हिस्से में जश्न का माहौल था, तो दूसरे में अनुशासन बनाए रखने की शर्त। उस आखिरी दिन सभी उनसे मिलना चाहते थे, लेकिन शायद पहली बार वो एक भीड़ में शामिल थीं टीचरों से घिरी उनके बीच खास होने के अहसास को जी रही थी उनका सफर हम सभी के साथ था, लेकिन उनके सफर का आखिरी दिन सिर्फ कुछ लोगों के लिए। पर छुटटी के समय जब दरवाजे की जाली से उन्हे उस पार खड़ा देखा था उनके चेहरे पर वही मुस्कुराहट थी मानो भीड़ न होती तो वो पास चली आती। क्योंकि उनके खयालों में सबके लिए जगह थी। 

मेन गेट के सामने वाली दीवार पर लगे बोर्ड को वो अकेली खड़ी होकर अक्सर गौर से देखती रहती थीं एक दिन पूछने पर बोली,मैं रोज़ स्कूल में आते वक्त इसे पढ़ती हूँ,  इस पर जो लिखा है वो मुझे अपनी जिंदगी में रचा-बसा लगता है कि यदि आपके जीवन में सच्चाई है तो उसका असर दूसरों पर ज़रुर पड़ेगा” कहते हुए एक गहरी सांस छोड़कर वो आगे चली गई   

टीना नेगी