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Tuesday, 5 February 2019

मंझली खो गई


रात के बारह-साढ़े बारह का समय था। आसपास के सभी लोग सो चुके थे। हमारा परिवार भी सो चुका था पर मम्मी-पापा चाची की बीमारी की बातें कर रहे थे। आज उनकी तबीयत बहुत खराब थी और घर में चाचा जी भी नहीं थे। मम्मी उन्हें उनके कमरे में सुलाकर आई थी। उनके दोनों बच्चे छत पर बड़ी ताई जी के साथ सो रहे थे तभी ताई ने दीपू, उनकी बड़ी बेटी को जगाया और नीचे पानी लेने भेज दिया। दीपू जैसे ही कमरे में घुसी तो देखा मम्मी लंबी-लंबी सांसें ले रही थी। वो भागकर मम्मी के पास पहुँची और उनका हाथ पकड़ते हुए बोली, क्या हुआ मम्मी। उसकी मम्मी थी कि लगातार हाँफे जा रही थी। दीपू ने फिर से उनका हाथ पकड़कर हिलाया तो उन्होंने उसका हाथ पकड़कर पंखे की तरफ़ इशारा किया। दीपू मम्मी का हाथ छोड़कर पंखे का बटन दबाने भागी। जब वह मम्मी के पास जाकर खड़ी हुई तो देखा कि उनका चेहरा पसीने से त था औ सांसे तेज़ रफ़्तार में चल ही थी। दीपू को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह घबराकर रसोई से ठंडे पानी की बोतल लाकर मम्मी को पानी पिलाने लगी पर उन्होंने पानी पीने से मना कर दिया। दीपू की घबराहट बढ़ती ही जा रही थी। मम्मी की सांसों की रफ़्तार कम होने लगी। दीपू ने मम्मी को छूकर देखा तो उनके हाथ-पैर ठंडे पड़े थे। दीपू ने मम्मी के हाथ-पैर मसलने शुरू कर दिए। वो इतनी घबरा गई थी कि बड़ी ताई को कमरे से ही ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ें लगानी शुरू कर दी थी। मम्मी ने उसका हाथ कसकर पकड़ रखा था। दीपू की आवाज़ किसी ने नहीं सुनी।

काफ़ी देर बाद दीपू ने मम्मी के हाथ से अपना हाथ छुड़ाया और ज़ीने से ऊपर भागी और जाकर ताई का दरवाज़ा खटखटाते हुए आवाज़ लगाने लगी, ताई... ओ ताई। ताऊ और ताई दोनों गहरी नींद में थे। दीपू की आवाज़ सुनकर नीचे से मौसी आईं और उन्होंने आवाज़ लगाकर पूछा क्या हुआ दीपू? दीपू रोती हुई ज़ीने से नीचे की तरफ़ भागती हुई आई और बोली, मौसी मम्मी...। मौसी ने नीचे से ही पूछा क्या हुआ मम्मी को। ये कहते हुए वो ज़ीने से ऊपर की तरफ़ भागी और दीपू की मम्मी के पास जाकर खड़ी हो गईं। दीपू भी मौसी का हाथ पकड़कर बोली, मम्मी को पता नहीं क्या हुआ है। मौसी ने देखा तो उसकी मम्मी अभी भी लंबी-लंबी सांसें ले रही थी पर हाथ-पैर ठंडे पड़े थे। आँखें भी ठंडी हो गई थी। मौसी ने ताऊ-ताई को आवाज़ लगाते हुए कहा, जीजी नीचे आओ मंझली जीजी को पता नहीं क्या हुआ। हाथ-पैर ठंडे पड़े हैं, लंबी-लंबी सांसे ले रही है। मम्मी की आवाज़ सुनकर ताऊ-ताई और उनके सभी बच्चे कमरे में आकर खड़े हुए। ताऊ ने मंझली ताई की हालत देखी तो कहने लगे इन्हें अस्पताल ले चलते हैं। इनकी तबीयत बहुत खराब लग रही है।

अभी ये बात चल ही रही थी कि दीपू तेज-तेज रोने लगी। मौसी ने दीपू को अपने सीचने से लगाकर कहा, कुछ नहीं हुआ है अभी ठीक हो जाएगी। इस बीच बड़े ताऊ ने चाचा को फ़ोन करके बताया कि उनकी पत्नी की तबीयत खराब हो गई। चाचा ने कहा मैं तो सुबह ही पहुँच जाऊँगा तब तक आप उन्हें अस्पताल दिखा लो। चाची ने बड़ी ताई जी को कहा, जीजी आप इनके साथ चले जाओ, मैं इन्हें संभाल लूँगी।

ताऊ ज़ीने से उतर कर ऑटो लेने चले गए। घर में सब बच्चे उन्हें देख-देखकर रो रहे थे। मौसी थी कि सबको चुप करा रही थी। ताई मंझली ताई के कपड़े ठीक कर रही थ। धीरे-धीरे मंझली ताई की सांसें लगी। ताई के चेहरे पर घबराहट दिखाई देने लगी। ताई और चाची आपस में धीरे-धीरे बातें कर रही थी अचानक मंझली ताई ने तेज़ की हिचकी ली और आँखें खोली, उनके सांसें रूक गई। बड़ी ताई मंझली ताई के हाथ-पैर तेज़ी से मलने लगी पर हाथ-पैर तो ठंडे हो चुके थे। सांसें भी रूक चुकी थी। ये देखकर मौसी और बड़ी ताई की आँखों से आँसू बहने लगे पर वे बच्चों से यही कह रही थी कि मंझली ताई ठीक है। मौसी और बड़ी ताई ने बच्चों को नीचे के कमरे में भेज दिया। सब बच्चे चुपचाप नीचे चले गए। रात के करीब तीन बज चुके थे। ताऊ जी को भी कोई ऑटो नहीं मिला था। वो भी थकहार कर वापस घर आ गए थे। वो जैसे ही ज़ीने से ऊपर चढ़े बड़ी मौसी जी और ताई ने उन्हें बताया कि मंझली ताई खत्म हो चुकी हैं। ये सुनकर ताऊ जी घबरा गए। उन्होंने ताई और मौसी से कहा जब तक प्रेमपाल गाँव से दिल्ली न पहुँच जाए तब तक किसी को भी मत बताना। जब प्रेमपाल आयेगा तभी हम सबको बतायेंगे। ये कहते हुए वो कमरे में चले गए।

मंझली ताई को पलंग से उठाकर जमीन पर लिटा दिया। हल्दी से उनके चारों तरफ़ लाइन खींच दी। बच्चों को भी ये कहकर सुला दिया कि मम्मी को अस्पताल लेकर गए है, ठीक होकर आ जाएगी।

दीपिका

Monday, 24 August 2015

रब, सौरव

हर सुबह के शुरूआत जैसे एक नए अंदाज़ के साथ होती कभी पापा के गुर्राते चेहरे के साथ तो कभी सूरज की चमक के साथ। इसी तरह हर दिन एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता, कुछ पता ही नहीं चलता। हर रोज़ की तरह आज भी जब कदम चारपाई से उतरकर उस सुनहरी मिट्टी पर टिके तो जैसे पलभर में ही मेरी आँखें खुल गई। मैंने अंगड़ाई ली और चारों तरफ़ आसमान की सफेद चादर को निहारते हुए नज़र सामने सड़क पर घुमाई जहाँ से गुज़रते कई लोग जिन्हें देख अहसास हुआ कि कुछ अभी ठीक से सुबह हुई नहीं है। सड़क के कोने पर फेन, पापे वाले अंकल भी खड़े थे जो रोज़ाना छः बज से पहले ही हमारी गली में आ जाते है। पूरी सड़क पर लोगों की आवाजाही शुरू हो चुकी थी। मैं उठी और अंदर वाले कमरे में जा ही रही थी कि मेरी नज़र जा टिकी पार्क के नुक्कड़ पर, हमारे रिक्शे पर सोते हुए अपने मुँह को उधाये एक छोटे से बच्चे पर जो इतने कोहरे के बीच भी रिक्शे पर एक पतला सा पर्दा ओढ़कर सो रहा था। जिसे इस अंधेरे का कोई भी डर नहीं और न कोई एहसास वो तो जैसे गहरी नींद में पड़ा था जिसे देखते ही मेरे मन में कई सवाल उमड़ने शुरु हो गया . अरे ये कौन है? यही क्यों लेटा है? कहाँ से आया?

क्या इसे डर नहीं लग रहा, अपने आपसे ढेरों सवालों कर जब मुझे एक पल की राहत मिली, लगा कहीं ये सामने वाली भाभी का बेटा तो नहीं। मैंने खुद से ही मना करते हुए कहा, नहीं-नहीं वो यहाँ क्या करेगा। अपने आपमें डूबी मैं कई सवाल करती और खुद ही उनका जवाब खोज निकालती। तभी अंदर वाले घर से आती कुछ आवाज़ों ने मुझे चैकन्ना कर दिया। बाहर एक लड़का सो रहा है, पता नहीं कौन है? जब ध्यान से सुना तो पता चला कि दीदी भी पापा से उसी लड़के के बारे में बात कर रही थी। पापा चैंकते हुए बोले, ‘कौन? अपने रिक्शे पर। पापा जैसे यकीन ही नहीं कर पा रहे थे तभी मैंने दीदी की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, ‘दीदी ठीक कह रही है, पापा।सुनते ही पापा ने अपनी जेब से एक छोटा सा टॉर्च निकाला जो एक महीने से पापा की जेब में है। बेशक उसकी कीमत पाँच रुपये की है पर उसकी रोशनी इतनी है कि कितना भी घना अंधेरा हो उसे चीरते हुए रोशनी उभार देता है। उसी टॉर्च को जलाते हुए पापा ने हमें दिया और कहा, ‘जाओ देखकर आओ कौन है?’

हम टॉर्च को थामे अंधेरे के बीच उस नन्ही सी जान को देखने चल दिए। जब टॉर्च जलाकर देखा तो वो सुजल नहीं कोई आठ-नौ साल का लड़का था जो अपनी नन्हीं सी आँखों को बंद करे, नाक को सिकोड़े, होंठों को पिचकाए, गालों को फूला गहरी नींद में सो रहा था। हमने फिर से पापा को उसकी खबर दी। अब तो हमें सभी के उठने का इंतज़ार था। मेरे अंदर तो एक ही खलबली मची हुई थी कि आखिर ये कौन है? कहाँ से आया है? मेरे इन सवालों का जवाब, कहीं भी नहीं मिल पा रहा था। अपने इस जवाब को खोजने के लिए मैंने स्कूल की भी छुट्टी कर ली। धीरे-धीरे सूरज भी अपनी रोेशनी को आसमान के चारों तरफ़ फैला चुका था और आसपास के सब लोग भी उठ चुके थे। यहाँ तक की वो बच्चा भी उठकर अपने बिस्तर पर बैठा, आते-जाते लोगों को तांक रहा था। जो भी आता एक जोरदार आवाज़ के साथ कहता, ‘ये कौन है?’ ये कहते ही सभी की निगाहें उसी पर जा थमती।

कुछ ही देर बाद पलक झपकते ही उसे घेरे लोगों का जमघट लग गया। कुछ अपनी कमर पर हाथ रख कहने लगे, ‘अबे कहाँ का है तू?’ तो कुछ बड़े प्यार से उसका नाम पूछ रहे थे। कुछ आपस में बातें कर रहे थे, ‘अरे शीला देखियो, देखने में तो लगता है यहीं कहीं का है पर बताता भी तो नहीं।सभी के बीच मानो धीरे से फुसफुसाहट चल रही थी पर बच्चा जो लोगों की बातों को न सुनते हुए अपने में खोया नज़र आ रहा था लेकिन लोगों को वहीं फुसफुसाहट जैसे अभी भी बरकरार थी। लोगों के बीच कई किस्से उभर रहे थे, अरी आजकल तो बहुत बच्चे खो रहे है। हम तो अपने बच्चों को अकेला नहीं छोड़ते।

सामने वाली शीला आंटी बोली, ‘चलो खो भी गया तो कम से कम घर का पता तो मालूम होना ही चाहिए इतना बड़ा हो गया, घर का पता भी नहीं मालूम। हमारी पांच साल की कल्लो से ही पूछ लो, घर के पते से लेकर पूरे परिवार का नाम तक बता देती है।

Tuesday, 21 July 2015

मैं अकेली कहाँ

“मिसिज कांता आपकी चाय” गर्म भाप से पसीजा हुआ गिलास ठक से मेज पर रखते हुए एक आवाज सुनाई पड़ी और उसके बाद मिसिज कांता, अपनी चाय और केवल उनके लिए चलता हुआ पंखा तीनो कमरे मे फिर से अकेले रह गए।

टेबल पर रखी कॉपियों की मीनार शशि कांता मैडम की गर्दन से भी उॅची थी। साइड मे यूटी के तीन-चार बंडल भी रखे थे जो बार-बार उनकी तरफ ऐसे लुढ़क आते थे कि लग रहा था कह रहे हो मैडम जल्दी करो, इन कॉपियों के बाद हमारी बारी है, ‘‘उन्हे पेन को थामकर अपनी कलाई चटकाने तक की फुर्सत नही थी, ऐसे मे शायद बेखबर थी कि बेचारा चाय का गिलास कब से उनकी राह देख रहा है, मानो स्टाफ रूम की हर चीज की तरह वह भी सब्र कर रहा था कि शायद यह खामोशी कुछ देर बाद टूट जाएगी। उस टेबल के चारो ओर लगी कुर्सिया कुछ एक-दूसरे की तरफ मुड़ी कुछ टेढ़ी कुछ अपनी बगल वाली के बिल्कुल करीब तो कुछ टेबल के नीचे घुसी हुई, उस मंजर की याद दिला रही थी जो शायद कुछ देर पहले यहाँ रहा होगा, सामने रखे वो खाली गिलास जिनके तलो मे कुछ चाय अब भी बाकी थी, बता रहे थे कि काम और गपशप के माहौल मे उनकी भी खास भागीदारी रही है लेकिन अब ,अब हर चीज मे एक ठहराव था।

वो अधखुला दरवाज़ा, वो टेबल के नीचे रखी मैंडम की स्लीपर, उनके नीले थैले से झाँकती पानी की बोतल और उनके से लटकता वो चाबी का गुच्छा सब कुछ उनकी तरह, उनके साथ ढला हुआ। जब वो अकेली होती हैं तो उसकी दुनिया एक ऐसा ही रुप ले लेती है जहां ना कोई गुंजाईश होती है, न कोई इंतजार, ना किसी का खालीपन और न ही कोई भराव। वो दिन भी कुछ ऐसा ही था कभी पेन को ज़रा थामकर बाँय हाथ की उंगली से माथे की सिलवटें गिनने लगती, तो कभी एक धीमी मुस्कुराहट के साथ अपने आप से कहते, ‘‘बढिया है इस लड़की ने अच्छा किया है‘‘ मानो उनके हाथ मे थमा पेन, पेन पा होकर इंसाफ का तराजू हो, जहां न्याय के रुप मे कभी किसी को वह शाबाश लिख भेजती तो कभी सीधा गंदा काम लिखकर कॉपी ठक से बंद कर देती, क्योंकि छुपाना तो उन्हें आता नहीं और वो हमेशा कहती हैं जब तक अपनी कमी को अपनाओगे नहीं, तो सुधार की गुंजाइश कहाँ से लाओगे। ये सिलसिला बड़ा लम्बा चलता हैं, कॉपियाँ कम होती जाती हैं पर उनकी चेक करने की गहराई में कोई बदलाव नहीं आता, अगर कुछ बदलता है तो उनके बैठने का अंदाज। कभी पाँव पर पाँव चढ़ा टेबल की तरफ झुक जाती, तो कभी दोनो पैर ऊपर कर सहारा लेकर बैठ जाती।

यूं तो हर कोई उन्हें काम के सिलसिले मे ही पुकारता हैं, पर हर पुकार पर उनका चेहरा खिल उठता हैं और वो पलटकर बड़ी तहज़ीब से पूछती हैं, ‘‘हांजी, कहिए क्या काम है?‘‘   

टीना



Friday, 13 March 2015

सर्दी की रात और माँ का झाड़ू

वो ठिठुरता हुआ गली में घुस ही रहा था कि तभी पीछे से गौरव बोला, ‘आकाश कहां जा रहा है?’

‘घर जा रहा हूं, नही तो मम्मी बाद में घर में नहीं घुसने देगी! एक बार उन्हें शक्ल दिखाकर आ रहा हूं। मम्मी गली में ही गाली देने लगती है।’ कहकर आकाश गली में घुस गया।

उसकी बात सुनकर गौरव हंसता हुआ पार्क की तरफ़ चला गया। गौरव पार्क में गया तो देखा वहां उसके दोस्त आग जलाने की तैयारी कर रहे थे। उन्हें देख गौरव जोर से बोला, ‘बहुत अच्छे!’ और दौड़ता हुआ उनके पास जाकर बैठ गया।

हाथ सेकता हुआ वो अपने दोस्त से बोला, ‘दिल खुश कर दिया!’ और जमीन पर टिक कर बैठ गया।

नूना बोला, ‘गौरव, आकाश नहीं आया?’

गौरव हैरान होता हुआ बोला, ‘आकाश! वो तो आज लम्बा ही निकल गया। बेचारा बहुत अच्छा था!’

ये सुनकर सभी हंस पड़े। तभी आकाश भी आ गया। उसे देखकर सभी अपनी हंसी रोक न पाए और ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। सभी को हंसता देख आकाश बोला, ‘क्या हो गया?’

नूना बोला, ‘क्या हो गया, जो होगा तेरी ही गोद में खेलेगा। वो तो डाक्टर बताएगा कि क्या हुआ है?’

ये सुनकर आकाश भी हंस पड़ा। अब पूरा माहौल खुशनुमा हो गया था। आकाश भी सभी के साथ बैठकर हाथ सेकने लगा। इतने में कुलदीप भी आ गया और आग के एकदम आगे बैठ गया। सागर ने उसकी गुद्दी पर हाथ मारते हुए कहा, ‘जलेगा क्या! पीछे हो जा! भुन जायेगा!’

कुलदीप बुरा सा मुंह बनाकर बोला, ‘क्या है? पीछे ही तो बैठा हूं!’

ये सुन सागर बैठ गया और आकाश से बोला, ‘आजकल तू तो फूल नोट कमा रहा है। हमें भी बता दे, हम भी कुछ हरी पत्ती कमा ले!’

आकाश थोड़ा पीछे होता हुआ बोला, ‘अरे तू कल बोलता मैंने एक लड़के को लगा दिया!’

‘किसे लगा दिया?’

‘अरे ऐसे ही एक लड़का है बहुत दिनों से पीछे पड़ा था। मैंने सोचा इसे भी लगा देता हूं। कोई बात नहीं कभी-कभी पुण्य का काम भी कर लेना चाहिए। वैसे भी दिन में हम यहां सबसे छत्तीस गालियां सुन लेते हैं कम से कम वो तो दुआ देगा।’

कुलदीप हंसता हुआ बोला, ‘ठीक कह रहा है!’

मम्मी-पापा कहते है कि कोई काम-धंधा ढूंढ ले हम पूरी जि़ंदगी बैठाकर नहीं खिलायेंगे। सागर बीच-बीच में बोला, ‘हां सही कह रहा है। और तो और ये सुनकर खाना खाने का मन नहीं करता।’

‘भई तुम्हारे घर में तो तुम्हें कुछ नहीं कहते, मुझे तो सुनने को मिलती है। मेरी मम्मी तो बहुत गंदी-गंदी गालियां देती है। रात को मुझे झाड़ू से मारती है। कभी-कभी तो जी करता है कि छत से कूद कर मर जाऊं।’ नूना बोला

नूना की बातों को सुनकर सभी हंस पड़े। सभी क्या वो खुद भी हंस पड़ा। आकाश सभी की बातों को सुनकर बोला, ‘इलेक्शन आ रहे है। झंडे लेकर घूमेंगे। कुछ पत्ते इसमें कमा लेंगे। कम से कम घर में तो कोई निठल्ला नहीं कहेगा!’

तभी कुलदीप उछलता हुआ बोला, ‘हमें भी एक झंडा दे देना। हम भी थोड़ा पसीना बहाकर कुछ कमा लेंगे।’

कुलदीप टाइम क्या हो रहा है? गौरव ने पूछा

कुलदीप बोला, ‘भाई टाइम तो आजकल बहुत खराब चल रहा है?’

गौरव थोड़ा मुस्कुराता हुआ बोला, ‘अबे बता दे न, मजे मत ले।’

नूना बोला, ‘अच्छा कब चले बात करने?’

बात करने, किससे? सागर ने पूछा

रैलियां निकालने के लिए। भूल गया अभी तो बात शुरू हुई है और अभी भूल गया। इसलिए कहता हूं कि उतनी पीया करो जितनी छोड़ सको! नूना बोला

फालतू बकवास मत कर, जितना पूछा जाए उतना बताया कर!

दोनों की बातों को सुनकर कुलदीप बोला, ‘क्या औरतों की तरह बहस करने लग जाता है!’

अकेली लड़की

सभी की नज़र उसके गोल-मटोल से चेहरे को निहार रही थी। लोगों की नज़रे पल-पल उसे निहारती क्योंकि वह बस में अकेली थी और अपनी ही कश्मकश में डूबी थी। खिड़की से बाहर के नज़ारों को भाप रही थी और सोच रही थी कि कब अपने घर पहुंचूंगी और कब उनकी शक्ल देखूंगी। देखते ही देखते बस ख़ाली होने लगी। मगर बस में बैठे-बैठे उसकी आंख लग गई। बस चल दी मगर वो नहीं उठी। तभी उसकी आंख खुली और वो बोली, ‘मैं कहां हूं?’

ड्राइवर के पास जाकर उसने पूछा, ‘भइया, मैं कौन सी जगह पर हूं?’

उसकी आवाज़ सुनकर बस वाला भी डर गया कि पूरी बस तो ख़ाली हो गई, ये यहां क्या कर रही है? उसने आगे देखा नहीं और बस एक पेड़ से टकरा गई। वो लड़की बस की सीढि़यों पर जाकर गिरी। बस का दरवाज़ा खुल गया।वो चिल्लाई, ‘बचाओ, बचाओ!’ मगर ड्राइवर बेहोश था। उसने अपने आपको बचाने की कोशिश की मगर वो बच नहीं पाई। उसकी सांसे अभी चल रही थी। पुलिस वालों ने उसे बच्चों के अस्पताल पहुंचाया। वहां बच्चों की अच्छे से देखभाल की जाती है। उस अस्पताल को जंगल की तरह सजाया हुआ था। वहां नकली तितली भी बहुत सी थी। उसका वहां मन लगने लगा। वरना वो बार-बार यही बोल रही थी कि मुझे घर जाना है। जब पुलिसवालों ने पूछा तो वो बोली, ‘मुझे कुछ याद नहीं!’

पुलिस वाले चले गए फिर वो पलंग पर चढ़कर नाचने लगी। बाद में उसे याद आया कि मुझे तो नानी से मिलने जाना है। उसने वहां से भागने की कोशिश की।

जो भी आता वो उसे वापस कमरे में बंद करके चला जाता। वो पलंग पर सिकुड़कर बैठ गई और सोचने लगी कि कोई तो रास्ता हो जहां से मैं निकल सकूं पर चारों ओर सख़्त पहरा है।

वो भागने की कोशिश कर ही रही थी कि डाॅक्टर आए और उसे एक सुई लगाकर चले गए। धीरे-धीरे उसे नींद आ गई।

... ... अमीशा

Thursday, 22 January 2015

दादी को ख़त

नमस्ते दादी जी। आप कैसी हो? 

मुझे आपकी बहुत याद आ रही है। आप जल्दी से लौट आओ मुझे आपके हाथ से बनी रोटी और सब्जी की याद आ रही है। आपके हाथ के बने पकोड़े, टिक्की, दही-भल्ले, कचोड़ी और दाल चावल। जब से आप गईं हैं मैं ठीक से खाना भी नहीं खा पाई हूँ। कुछ भी खाने का मन नहीं होता। आप तो जानती ही हैं की घर में सभी अपने अपने काम में लगे रहते हैं। पापा काम में, मम्मी घर में और मैं अकेली रह जाती हूँ। मेरे साथ में कोई बात नहीं करता। मैं जब स्कूल से आती हूँ तो अकेली घर में बैठी रहती हूँ। रात में नींद नहीं आती, खेल भी नहीं पा रही हूँ। बहुत अकेलापन लग रहा है। स्कूल में मेरी एक नई दोस्त बनी है। वो बहुत अच्छी है। पर पढ़ाई में उसका मन नहीं लगता है। कल उसका जन्मदिन है, मैं जाना चाहती हूँ पर आपको तो पता है पापा जाने नहीं देगे। आप होते तो मैं आपको ले जाती। आपने बिना तो मैं बाहर भी नहीं जा पा रही हूँ। 
 
आप अपनी दवाइयाँ यहाँ ही भूल गई हैं। वो आपके लिए बहुत जरूरी हैं। गाँव से किसी को भेज दीजिये या खुद ही आ जाइए।

पिछली बार तो आप मुझे भी अपने साथ में ले गई थी। मगर इस बार नहीं ले गई। हाँ, मैं जानती हूँ मेरी पढ़ाई के कारण ही ऐसा हुआ है लेकिन अगली बार मैं ज़रूर आपके साथ में चलूँगी। अच्छा तो सुनिए, जब आप गाँव से आए तो मेरे लिए वहाँ की हिन्दी की किताब लेकर ज़रूर आना। जो वहाँ के बच्चे पढ़ते रहते हैं, मैं उस किताब को पढ़ना चाहती हूँ। साथ ही वहाँ के देसी घी के लड्डू, जलेबी भी ज़रूर लेकर आना। पिछली बार जब आप मुझे गाँव लेकर गई थी तो मैंने बहुत खाये थे। भूलना मत। और हाँ, मेरी एक फ्रॉक वहाँ पर छुट गई थी, वो भी लेते आना। भूलना मत दादी।
आप बस जल्दी से आ जाओ, मेरा मन नहीं लग रहा आपके बिना।

आँचल

Wednesday, 9 October 2013

किरायेदार


सामने वाले घर की खिड़की पर न चाहकर भी ध्यान बार-बार जा रहा था। उस खिड़की से दिखाई देने वाले शीशे में झलकता मेरा अक्श, आज की हकीकत से रू--रू कराने की बेतोड़ कोशिश में था। तभी एक चेहरा उस शीशे के आगे आ खड़ा हुआ। उसकी घूरती आँखों ने पल भर के लिए कुछ खोजा फिर जैसे चुप्पी भरे अपमान को जाहिर करते हुए पलटकर खिड़की का परदा खिसका दिया।

वो छवि, वो हकीकत उस आइने के साथ मुझ से दूर हो गई। सोच फिर उसी इंतज़ार पर आ थमी। सिर रेलिंग पर टिक गया लेकिन ख्याल कुछ देर कहीं गली के छोर पर ही पसर गए। अब भीतर का अंधेरा सच में भीतर उतरने लगा था। अचानक बगल वाले मकान की चौथी मंजिल पर लुप से बल्ब जला और उसकी रोशनी का कतरा, घर की टूटी चादर से दीवार पर उतर आया। पलट कर आगे बढ़ी तो पाया, जिन्दगी के खुरदरे पलों से निकलकर कुछ नया था। कुछ अपना। सामने खड़ी दीवारें नयी दुनिया बसाने का न्यौता दे रही थी। नये कोने दोस्ती करने को उतावले थे। एक वो नयी आवाज़, वो भी शायद। एक सुकून गहराई तक उतर गया। रोशनी का वो कतरा यूंही दीवार झाँक रहा था। लग रहा था कुछ अपनी कहने और कुछ मेरी सुनने आया हो। एक पतली चंचल सी आवाज अचानक उस ओर से सुनाई दी, "काम इतना हो जाता है न आंटी, बस कोल्हू के बैल का तरह जुते रहो, न दिन को चैन है, न रात को आराम। माँ ठीक ही कहती थी कि जितनी मौज करनी है कर ले, दूसरे घर जाकर तो नानी याद आ जाएगी क्यूँ?”

Monday, 7 October 2013

वो आई थी क्या

"अरे भाभी वो आई थी क्या?” घूंघराले बाल व बड़ी-बड़ी आंखों वाले उस लड़के की आवाज़ अभी गले से निकली ही थी कि अपने सारे काम को छोड़ भाभी ने उसकी ओर देखकर मुस्कुराते हुए कहा,"मत पूछो, बेचारी सुबह से कितने चक्कर लगा चुकी हैं कभी कपड़े प्रेस करवाने के बहाने, तो कभी मेरे बुलाने पर, अब तक 4बार आ चुकी है।" कहते हुए भाभी का चेहरा घूम गया और हिलती जुंबा कुछ पल उस लड़के के चेहरे पर खामोशी छोड़ गई जो ‘जे’ ब्लॉक तो कभी, ‘के’ ब्लॉक को ताड़ता हुआ दोबारा से उनकी ओर तांकने लगा। सिर से खिसकते अपने पल्लू को उठाते हुए उन्होने सिर पर रखा और फिर आँखों में आँखे डाल उससे बतियाने लगी। दोनों का यूं बतियाना दिल में एक ऐसा अहसास छोड़ने लगा था जिसका कोई अंत नही था।

"जरुर किसी लड़की की बात कर रहे होगें" मन में मचलते मेरे इस ख्याल ने अभी कुछ आगे जानना ही चाहा था कि अचानक उनके इशारो ने मुझे और गहराई में डुबो दिया। पलकों को उठाते हुए, प्रेस को साईड रख उनकी नजरें अपने ठीए के सामने पड़ते 4मंजिला बने उस टाईलों वाले मकान पर जा टिकी जिसकी बालकनी पर खड़ी कान पर फोन लगाए बतियाती वो लड़की ही शायद उनके बतियाने का विषय थी। कभी दोनों एक-दूसरे की ओर देखते हुए बुदबुदाते, तो कभी हंसते हुए फिर से उसी ओर देखने लगते। दोनों की बातों को सुन पाना जितना मुश्किल था उतना ही उनके चेहरे पर उभरते भावों को देख बातचीत का मुद्दा जानना बेहद आसान। वो इस कदर आपस में खोए थे कि उन्हें अपने बगल में अष्टा-चक्कन खेलती उम्रदराज टोली तक का कोई अहसास न था। वाईट शर्ट व ब्लैक पैन्ट में खड़ा वो लड़का कान में हैन्डफ्री लगाए उनकी टेबल पर इस कदर झुका हुआ था कि जैसे अपने सालों के राज बता रहा हो। वो भी पूरी तरह से उसकी बातों के साथ बहने लगी थी। हाथ में थमी प्रेस अब हाथ में नहीं टेबल के साईड में रखी आराम फरमा रही थी। लोहे कि बिछी चारपाई पर रखे कपड़े जिनमें से कुछ सज-सवरकर करीने से तय दर तय लगे हुए थे, तो कुछ उन लाल, पीली गठरी में से झांकते हुए अपने निकलने का इंतजार कर रहे थे। जिनमें कुछ तो ऐसे भी शामिल थे जिन्हें शायद पानी की छींटे दे, मोड़कर रख वो भूल गई थी।


Wednesday, 31 July 2013

शहर अब भी अपना ही है

'लोग उसे नहीं जानते जो आपके अन्दर है - लोग तो उसे जानते हैं जो दिखता है।'

बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर देती है ये बात। इसपर बहस करने वाले और लड़ने वाले इतने लोग खड़े हो जाते हैं कि हर कोई इसको फेल करने या कहने वाले को कोई ढंग का जवाब देने के लिये अपने - अपने शब्दों और ज्ञान के हथियार लेकर चले आते हैं। हर किसी के पास इतनी बातें और जवाब होती हैं कि जो इसे निस्तनाबूत कर सकती हैं। लेकिन जितनी भी बार ये युद्ध हुआ है। उस युद्ध में सभी से सिर्फ, "कारण" ही हाथ लगे हैं। 'इस बात का कोई मोल नहीं है' तो कोई कहता है 'ये बात बेमोल है।' स्कूल में पढ़ाया जाता था की अनमोल और बेमोल को समझो तो एक ही मायने बनाते हैं। जैसे - अजय और विजय के साथ है। एक जो कभी हार नहीं सकता और दूसरा जिसे कभी हराया नहीं जा सकता। यहाँ पर भी ये बात कुछ इसी तरह से अभी तक टिकी हुई है। एक जिसका कोई मोल ही नहीं है और दूसरा जिसका कोई मोल नहीं लगा सकता।

इसके साथ टक्कर लेने वाले कई डायलॉग है जो आसपास बहुत नज़र आते हैं। जैसे - "मैं आपकी रग़ - रग़ से वाकिफ हूँ।", “आप अन्दर से कुछ और हो और बाहर से कुछ और।" , "आप जैसे दिखते हो वैसे हो नहीं।"

किसी मे खाली अंदेशा महसूस होता है तो कोई दावे के साथ खुद को पेश करता है। मगर बात में इज़ाफा करने या बात को घटाने के अलावा क्या हो सकता है? वैसे ये खाली इस "बात" की ही बात नहीं हो रही। इसमें अनेकों लोग हैं, हम हैं, दोस्त हैं, हमारे टीचर हैं, वालदेन हैं, हमसफ़र हैं यहाँ तक की सरकार भी है। तो खाली हम बात से नहीं,  खुद से बहस करने के लिये इस बात को उठा सकें तो ज़्यादा महत्वपूर्ण और लाभदायक बात हो सकती है।

अब इसका अहसास कैसे कर सकते हैं - कई बार हर किसी को पलट – पलट कर देखना होगा। उसे एक टक लगाये देखना होगा। उसको घण्टों सुनना होगा। उसके शब्दों को अपनी बनाई समाजिक और खुद की रची दुनिया से बाहर जाकर पढ़ना होगा। इससे ज़्यादा और हम क्या कर सकते हैं?

हाथ बढ़ाने से अगर चीज़ हासिल हो जाती तो कितना आसान हो जाता जीना! इस लाइन को गुज़रे हुए कई साल बीत गये हैं। वक़्त भाग गया है खुरदरी जमीन को छोड़कर। अपने ढंग और अपने अन्दाज बन गुजरे हैं यहाँ की हवाओ में। कैसे न कैसे लोग चीज़ों और अन्दाजों में घुस जाते हैं और बना ही लेते हैं कुछ सपने।


वैसे खुश रहने के लिये किसी को ज़्यादा इंतजार भी नहीं करना पड़ता। बस, रात नींद में नये सपने सजाओ, काम पर हुई बेज़्जती का मज़ाक बनाओ और रखलो अपनी जेब में खुशी की तमाम टिकटें। ये वे टिकटें हैं जिनको ब्लैक भी किया जा सकता है। इसके लिये तो लोग जैसे कतार में खड़े हैं बस, पहले हाथ बढ़ाने से डरते हैं। कहीं आसपास में कोई मुज़रिम करार कर देने वाला कर्मचारी न खड़ा हो और फिर न जाने क्या किमत लगाई है आपने इस ब्लैक में देने वाली टिकट की।

Monday, 15 July 2013

दादी का बक्सा

दोपहर का समय था। मेरी दादी यहाँ-वहाँ बिखरे अपने कपड़ों को लेकर बहुत परेशान हो रही थी। वह कई दिनों से सोच रही थी कि वो एक बक्सा खरीदेंगी लेकिन कभी वो दिन या मौक़ा नहीं आ रहा था। कभी वो ही अपनी छोटी सी पोटली में बंधे पैसों को गिनकर चुप हो जाती क्योंकि वो कम लगते तो कम ज़्यादा होने पर उनमें उन्हें और जोड़ने का मन होने लगता पर उनके लिए बक्सा कभी जैसे नहीं आने वाला था।

मगर आज वह अपने पुराने कपड़ों को काफी देर से देखे जा रही थी! कभी हाथों को बड़े प्यार से ऊपर घुमाती तो कभी आँखें। जैसे एक-एक कपड़ा उनके लिए एक-एक दास्तान बना हो। थोड़ी देर उसे निहारने के बाद वो उठी और इस काम को करने की ठान ली शायद इसका दूसरा कारण ये भी रहा कि आज वो अपनी नौकरी से रिटायर भी हो रही थी। बड़े दिनों बाद उन्हें घर में रहकर अपनी चीज़ें सँवारने का मौक़ा भी मिला था। उन्होंने जोरों से कहा मैं एक बक्सा खरीदूँगी मगर कौन सा लेना है? कैसा होगा, कहाँ से लेंगे, कितने का होगा, क्यों ले, क्या रखना है, कहाँ रखना है, बेकार है, अच्छी कम्पनी का, न जाने अनेक तरह की बातों में दिन कब गुजर गया पता ही नहीं चला लेकिन शाम होते ही दादी को फिर अपने बक्से की याद सताने लगी। बस फिर क्या था दादी ने मम्मी से कहा, ‘सुन शकुन्तला तुझे मेरे साथ चलना है।’ मम्मी दादी की बात पर हमेशा सतर्क व चैकन्ना हो जाती हैं। वो तुरंत ही बोलीं, ‘हाँ, चलिए!’ और वो ही क्या घर, गली, रिश्तेदार सभी हिल पड़ते है उनकी आवाज़ पर।