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Monday, 15 July 2013

दादी का बक्सा

दोपहर का समय था। मेरी दादी यहाँ-वहाँ बिखरे अपने कपड़ों को लेकर बहुत परेशान हो रही थी। वह कई दिनों से सोच रही थी कि वो एक बक्सा खरीदेंगी लेकिन कभी वो दिन या मौक़ा नहीं आ रहा था। कभी वो ही अपनी छोटी सी पोटली में बंधे पैसों को गिनकर चुप हो जाती क्योंकि वो कम लगते तो कम ज़्यादा होने पर उनमें उन्हें और जोड़ने का मन होने लगता पर उनके लिए बक्सा कभी जैसे नहीं आने वाला था।

मगर आज वह अपने पुराने कपड़ों को काफी देर से देखे जा रही थी! कभी हाथों को बड़े प्यार से ऊपर घुमाती तो कभी आँखें। जैसे एक-एक कपड़ा उनके लिए एक-एक दास्तान बना हो। थोड़ी देर उसे निहारने के बाद वो उठी और इस काम को करने की ठान ली शायद इसका दूसरा कारण ये भी रहा कि आज वो अपनी नौकरी से रिटायर भी हो रही थी। बड़े दिनों बाद उन्हें घर में रहकर अपनी चीज़ें सँवारने का मौक़ा भी मिला था। उन्होंने जोरों से कहा मैं एक बक्सा खरीदूँगी मगर कौन सा लेना है? कैसा होगा, कहाँ से लेंगे, कितने का होगा, क्यों ले, क्या रखना है, कहाँ रखना है, बेकार है, अच्छी कम्पनी का, न जाने अनेक तरह की बातों में दिन कब गुजर गया पता ही नहीं चला लेकिन शाम होते ही दादी को फिर अपने बक्से की याद सताने लगी। बस फिर क्या था दादी ने मम्मी से कहा, ‘सुन शकुन्तला तुझे मेरे साथ चलना है।’ मम्मी दादी की बात पर हमेशा सतर्क व चैकन्ना हो जाती हैं। वो तुरंत ही बोलीं, ‘हाँ, चलिए!’ और वो ही क्या घर, गली, रिश्तेदार सभी हिल पड़ते है उनकी आवाज़ पर।

Wednesday, 19 December 2012

दक्षिणपुरी में एक महफिल


अनुभवी लोगों के संवाद के बाद में ये पहला दिन था।

यादें, सपने, आसपास, माहौल, फैसले, कारण, कामयाबी, सफ़र, शादी, परिवार, स्कूल, बचपन, जवानी, काम, पैसा, किराया, फिल्म, नाटक, टीवी, पर्दा, दिनचर्या, दिलचस्पी, हिदायतें, रविये, कल्पनाएं, लड़ाईयां, झगड़े, घटनायें, किताबें, डर, चेतावनियां, चोरियां, छतें, रातें, सरकारी लाइनें, काल्पनिक दीवारें, अपने मन मुताबिक बर्तन, अपनी पसंद के जूते और बेकर चीज़ों से औजार बनाना जो शायद उनके खेलने के काम में आये लेकिन लोगों से बातचीत करने के बाद में सभी एक बार फिर से किताब के अनेकों किरदारों के बारे में बोल रही थी।

वे किरदार जो कभी वे खुद ही थी। जीवन के अनेकों पल जो कहीं छिटक गये थे उन्हे पकड़कर लाना इतना आसान नहीं होता लेकिन याद रखने से ज्यादा मिठा सफ़र याद करने का होता है। जो यहां पर था।

दक्षिणपुरी की सारी दादियां जो अपने अनुभवों के किस्सों को इस तरह से सुनाती आई हैं कि वे उनके बारे में नहीं है वे तो वो किरदार हैं जो कहीं थे ही नहीं। फिल्म देखना, छुपना, निजी फैसले लेना सब किसी और पर डालकर सुनाना जीवन के याद करने के सफ़र को और मिठा बना देता है।

आज उसी सफ़र पर उतरने का दिन था।  

पिंकी 

Thursday, 3 November 2011

सुर्खियों में बटा लीलू


हाल ही में पेपरों के चलते हम सभी दोस्त एक साथ स्कूल जाते थे। पेन्ट की जेब में पैन रख और एक गत्ता पेन्ट की लुप्पी में टांग हम सभी दोस्त टशन से निकलते। क्लास में भी एक साथ बैठते। पूरी क्लास में मैं, अतुल, लीलू और विक्की सबसे शरारती हैं। जब चाहा किसी के पास बैठ उस पर कई तरह की छाप मारते और उन्हें किलसा देते। हमें अगर कहीं चॉक पड़ी मिलती तो हम सभी ब्लैक बॉर्ड, दिवारों पर अपना-अपना नाम लिख देते।


एक बार हम सभी दोस्त काफी देर से पहुंचे। अफरा-तफरी में कहीं और नज़रें घुमाए बिना पेपर की सीट पर निगाहें गड़ाये बैठे रहे। पैन चलता रहा और नज़रें किसी और की सीट पर टिकी रही। पी एन गुप्ता के आने का इंतज़ार अब खत्म हो रहा था वे हमारे समाजिक के सर हैं। अब किसी को फिक्र नही थी उनके आने की क्योंकि पास होने तक के नम्बरों तक का पेपर ज्यादातर सभी साथी कर चुके थे।

हम सभी यारो की टोली बन बैठे सभी को चिड़ाने का जरिया। आज तक की मशहूर फिल्म गदर जिसके डायलॉग मन को भावुक कर देते है मगर हम कहाँ ऐसे दर्शक हैं, जो किसी फिल्म को फिल्म की तरह देखें? उस फिल्म के डायलॉगों को अपनी हॅंसी-ठिठोली में शामिल कर सबको हंसने का मस्त मौका दे रहे थे। उस फिल्म के किरदारों को अपने बाकि दोस्तों को बना उन्हें हंसाने के लिए उन डायलॉगों को अपनी अदा से सबके सामने अभिनय कर रहे थे। क्या पता ये मस्ती हमें दोस्तो कि यादों में हमेशा के लिये कैद कर दे?

देर तक हम यूहीं मज़ाकिया दौर में हंसतें खिलखिलाते रहे उसी समय नज़रे दिवार पर जा भिड़ी और देखा कि बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था 'आई लव ज्योति' सभी ने उसे देखा और पढ़ा और आगे बढ़ गए। पर मेरा दोस्त लीलू तो जैसे चौंक ही गया। उसे ऐसा देख सभी उसकी मज़ाक उड़ाने लगे। वह कसमें खाने लगा। "माँ कसम मैनें नहीं लिखा" उसके चेहरे से पसीने छूट रहे थे। बस चन्द सैकेन्ड बचे थे वो रोने ही वाला था। कहीं सर न देख लें। यही सोच मैं उठा और कागज़ से उस नाम को पोंछने लगा। हम सभी ने उसे विश्वास दिलाया कि कोई भी सर को नहीं बताएगा। वो थोड़ा शांत तो हुआ मगर उसे हमारे ऊपर भरोसा नही था। हम अपना एक पीरियड छोड़ उसे लेकर बाहर आए और स्कूल के बाहर बनी दिवार पर बैठ कर उस बात को छोड़ उससे पेपरो के बारे में बात करने लगे। कल कौन सा पेपर है? कल तो जल्दी ही आना है इन्हीं बातों के चलते अतुल ने लीलू के कंधे पर हाथ रख कर कहा, 

"भाई कब मिलवाएगा? कहाँ रहती है?”

ये बात सुनकर तो लीलू का गुस्सा मानो इतना भड़क चुका था कि अतुल की तो हवाईया गुल हो गईं। इसी बहस बाजी के दौरान अतुल और लीलू की लड़ाई हो गई। हम सभी इस लड़ाई को हंसी-मज़ाक में ले रहे थे। अगले दिन जब लीलू स्कूल पहुंचा तो क्लास में घुसते ही चौंक गया। चारों तरफ उसकी नज़रें घूम रही थीं।

दिवारों, दरवाज़ों, ब्लैक बॉर्ड पर 'आई लव ज्योति' लिखा था। ये देख तो लीलू की आँखों में खून उतर आया। वह हर जगह अतुल को तलाशने लगा। सभी उस नाम की परछांई को प्यार का नाम देने लगे।

आज सभी टीचरों के डांटने फटकारने का विषय लीलू था। बाकी साथियों के बतियाने का विषय भी यही था। कोई समझ नही पा रहा था कि ये हो क्या रहा है? आज स्कूल कि चर्चा लीलू के साथ शुरू हुई और खत्म भी शायद इसी पर होने वाली थी। हल्ला स्कूल की दिवारों से गुंजता हुआ बाहर की दुनिया तक जा रहा था। 'आई लव ज्योति-आई लव ज्योति'
जिस नाम को सुनने का दुख लीलू को था उस रूह को देखने कि चाहत सभी को थी। आखिर ये ज्योति कौन है?

इन्हीं सवालों का जवाब पाने के लिए लीलू को ढूढा गया। क्लासों में, स्कूल की छतो पर, यहाँ तक की बाथरूम में भी, मगर लीलू नहीं मिला। सबकी तलाश पाँचवे पीरिडय तक आते-आते खत्म होने लगी थी उसके बाद सभी ने अपना रूख अपनी-अपनी क्लासों की तरफ कर लिया। टीचरों के होते हुए भी सभी लीलू को याद कर उसका मज़ाक उड़ा रहे थे। सभी का समय उसी की चर्चा करते हुए हंसी-ठिठोली मे बित रहा था।

लीलू की खबर किसी को नहीं थी। उसका बैग भी क्लास मे उसकी सीट पर पड़ा हुआ था। मैनें बैग उठाकर अपने कन्धे पर टांगा और चल दिया लीलू के घर की तरफ।

अगले दिन जब मैं स्कूल पहुंचा तो देखा गोल दायरा बनाए खड़ी लड़को की भीड़, मेरे कदम तो ठहर नही पाए मैं फटाक से उस भीड़ में शामील हुआ।

ये देखते ही चौक गया की अतुल और लीलू की धूआंधार लड़ाई हो रही थी। सभी उस लड़ाई का लुफ्त उठा रहे थे। चारों तरफ उड़ती मिटटी बस यही गुहार लगा रहीं थी-

"कौन है वो?"
"कहाँ रहती है?"
"हमें नही मिलवाएगा क्या?”

अनिकेत

Sunday, 28 August 2011

वो एक दिन, फिर से मिला मुझे


मैंने पूछा, "पूरी दुनिया में हर कोई सब कुछ भूल रहा है, दुनिया को अगर ऐसे देखे तो?”

छत्तर भाई ने कहा, “मैं मेले मे काम करता था, 10 दिन का ये काम मेरे लिये इस तरह का होता की, मैं पूरे शहर से, इलाके से और अपने आसपास से मिल भी लेता और उनसे दूर भी रहता। ये 10 दिन मेरे लिये दिन के जैसे नहीं होते थे। ये लगता था की मेरे लिये सारा समय उल्टा चल रहा है।

कई लोग किसी को ढूंढते हुये आते तो उन्हे मैं मिल जाता और कुछ जो अपनो से खो जाते तो मैं मिल जाता। मेरा तो सबको मिल जाना तय ही रहता था। कभी मेरी ड्यूटी मेले के भीतर लगती थी तो कभी गेट पर, गेट पर मुझे मेरी ड्यूटी पसंद नहीं थी, वहाँ पर जबरदस्ती रिश्तेदारी निभानी होती थी। लम्बी लाइन से बचने के लिये लोग मुझे खोजते हुये आते और सही बताऊं तो कभी - कभी मैं उनसे छूपने के लिये अपने मुहँ पर कपड़ा लपेट लेता। मेरे लिये उस लाइन मे कोई भी तो पराया नहीं था। मुझे तो ये भी नहीं मालुम था की इस लम्बी लाइन मे लगे लोग मेरे इलाके के है या उससे बाहर के। मेला का हर दिन मेरे लिये ऐसा लगता था कि मेरा काम 10 से 12 दिनों का नहीं है बल्कि बहुत लम्बे समय से चल रहा है। 10 दिन पूरा महीना लगने लगते। रात मे बस बिजली की रोश्नियों मे लोग मुझे जरूर तलाशते थे वो भी जो मुझे जानते थे और वो भी जो मुझे जानना चाहते थे। और मैं मेले में खड़ा यही सोचता था की, मैं तो यहाँ पर खुले मे खड़ा हूँ और फिर मुझे लोग ढूंढ रहे हैं। कभी - कभी होता है ना, हम बस स्टेंड पर खड़े जिस गाडी का इंतजारे करते है वही नहीं मिलती। उसके अलावा सब कुछ मिलता है। वैसे ही यहाँ मेले की जिन्दगी है, जिसे ढूंढों वही नहीं मिलता बाकी सब मिलते हैं और जिससे खो जाना चाहो वही सबसे पहले मिलता है। मैं गेट से अन्दर की तरफ हमेशा खिसक आता था। क्योंकि मेले के अन्दर रेहडी वालो, खोका मार्किट वालो से मेरी दोस्ती थी, वहाँ पर खड़ा होकर मैं पूरे मेले के मजे लूट लिया करता था। एक बार की बात बताता हूँ मेरी ड्यूटी मेले की बीच जगह पर लगी, जहाँ पर जमीन पर बैठकर लोग दुकान लगाया करते थे। ये वे लोग थे जो मेले मे दुकान लगाने का कुछ नहीं देते थे। वहाँ पर एक नाम गोदने वाला बन्दा था। उसके यहाँ पर बहुत भीड़ लगी थी, सभी नाम गुदवा रहे थे कोई किसी का नाम तो कोई किसी का, कोई भगवान का तो कोई अपने पति। वहीं पर भीड़ थी सबसे ज्यादा। एक लड़का सबसे पीछे आया और जल्दी से अपना काम करवाना चाहता था। मगर कुछ शरमा रहा था। इतने मे उसने अपनी कमीज उतारी और सीने पर नाम गुदवाने लगा। उसकी पूरी कमर पर नाम गुदे हुये थे। ये गजनी फिल्म तो अब आई है। यहाँ मेले मे कई ऐसे लड़के देख चुका हूँ जो अपने शरीर पर नामो का रेला लेकर चलते हैं। 10 दिन तक चलने वाला मेला, ऐसे लोगों से मिलवा देता था। मगर 10 दिन बीत जाने के बाद मे लगता की ये फिर नहीं मिलेगे। मैं भी सोचता था की अपने हाथों पर कुछ गुदवा लूँ, कम से कम पहली बार लगे मेले का साल ही। पर जब सब लोग भूल जाते हैं तभी तो मिलने का मज़ा था है। हमारी ड्यूटी मेला लगने के बाद और मेला उतरने से पहले ही खत्म हो जाती थी। तो वो उतरता हुआ मैं कभी नहीं देख पाया। सही बताऊँ तो इस विराट के मैदान मे मैं जब मेला नहीं लगता तब जाता हूँ तो मुझे सच मे ये नहीं पता रहता कि कौनसी दुकान कहाँ पर लगी थी और मैं कहाँ खड़ा होता था।"


मैंने पूछा, "खुद को कब आपने खोया हुआ पाया?”

छत्तर भाई ने कहा, “आज कल मेरी ड्यूटी बीआरटी लाइन पर है, यहाँ पर मुझे कोई नहीं पहचानता, वो जो मेरे साथ काम करते हैं वो भी और जो सड़क से निकल रहा है वो भी। यहाँ पर तो आप आटोमेटिक खोये हुये हो और सही मायने मे ये बहुत अच्छा है, खोये हुये रहना, एक अलग से जीने को भी कहता है। जिसमें शर्म, किसी के पहचान लेने का डर नहीं होता, बैठो - उठों और खाओ पियो। वैसे कोई जानने वाला भी क्या रोक लेगा तुम्हे कुछ करने से। मगर किसी के कुछ पूछ लेने का जवाब नहीं देना चाहते तो क्या हो? मैं ट्रफिक के बीचों बीच होता हूँ, शुरू शुरू मे बहुत डर लगता था। ऐसा लगता था की जैसे अगर कोई ध्यान न देकर चल रहा होगा तो वो पहले मार ही देगा चाहे हल्की सी ही क्यों न लगे। मगर कुछ दिनों के बाद में सब कुछ अपने आप सख़्त होता गया। मैं खुद भी सख़्त हो गया। मैं इसी सड़क पर कई समय से काम कर रहा हूँ, जगह बदल जाती है, कभी सड़क के सीधे जाने वाले रोड़ पर होता हूँ तो कभी यू टर्न पर, कभी उल्टे हाथ की तरफ जाने वाले रोड़ पर होता हूँ तो कभी सीधे हाथ की तरफ, एक ही ये रोड़ हर साइड पर खड़े होने के बाद मे अलग लगता है। गाडियां सारी एक जैसी है जो पूरे सड़क पर भाग रही है, लेकिन कहीं पर कुछ कम जाती है तो कहीं पर कुछ ज्यादा। कोई लाइट छोटी कर रखी है तो कोई बड़ी। मैं जो चाहता हूँ वो हमेशा होगा ये तो मेरी भूल है पर मैं चाहता हूँ की सड़क के बीच मे रहूँ मगर फिर भी खोया हुआ रहूँ।मैं जब सड़क पर होता हूँ तो खोया रहता हूँ और जब मैं घर आता हूँ तब लगता है कि मैं उस छत्तर को खो आया जो सड़क पर खड़ा था। अच्छा नहीं लगता वहाँ से वापस आना। घर में आपको सभी प्यार बहुत करते हैं मगर उनका प्यार अपनी तरफ खींचता है, पकड़े रखता है। मैं विराट के मैदान मे पला बड़ा हूँ, वहीं पर मैं सब कुछ सीखा, कुश्ती, क्रिक्रेट और काम भी, गाड़ी चलाना भी पर आज तक उसको पहचान नहीं पाया हूँ, जब मुझे कोई नौकरी मिलती है वो विराट के मैदान से ही जुड़ी होती है और मैं फिर से उसमें एक अजांन आदमी तरह खड़ा हो जाता हूँ। ऐसा मेरे साथ मेरे घर मे कभी महसूस नहीं हुआ। घर काफी बार बदला, हर साल बदलता है लेकिन फिर भी लगता है कि मेरा है, मैं इसे जानता हूँ। परिवार वाले कभी - कभी खोये हुये लगते हैं लेकिन घर कभी नहीं लगता।


मैनें पूछा, “अपने को खो देना क्या है?”

छत्तर भाई ने कहा, “दुनिया बनाना है, ये मैं नहीं कहता मेरी बीवी कहती है - तब मुझे पता चलता है। वो बहुत किताब पढ़ती है, जब घर लौटता हूँ तो वो किताब पढ़ रही होती और जब वो घर मे नहीं होती तो किताब जमीन पर इस तरह रखी होगी की देखते ही लग जायेगा की अभी किताब पढ़कर गई है कहीं। उसको मैंने पूछा था ये कि तुझे लगता है कि तू किताब पढ़कर इन घरेलू झमेलो से दूर हो जाती है? तब उसने कहा था की मैं किताब इन झमेलो से दूर होने के लिये नहीं पढ़ती हूँ मैं तो ऐसा माहौल चाहती हूँ अपने पास में जो मुझे अपने मे लगाये रखे, इसलिये ये मैं खुद से बना लेती हूँ। किसी चीज़ से लगाव रखना बाकी चीज़ों से काटता नहीं है वो तो एक और चीज़ एड कर देता है। वो अपनी इस बनाई हुई दुनिया में लीन रहती है, जो सिर्फ उसके अकेले के लिये नहीं है, उसकी बहन भी इसमे शामिल हो जाती है। जब वो नई नई आई तो उसको देखने के लिये सब आये, वो कमरे मे बैठी हुई थी, अपने समान को दिखा रही थी, पहले तो सब उसे देखते और उसकी खूबसूरती की सब तारीफ करते। पूरे कमरे मे काफी औरते थी। पहले उसे देखती फिर समानों पर निगाह डालती, उसके समान को खोलकर सभी देख रही थी। फिर उसका छोटा बैग खोला तो उसमे कुछ किताबे थी, उसकी डायरियाँ की तो सभी चौंक गई, कहने लगी किताबे भी लाई है। बस यही बात सबकी जुबान पर चिपक गई,  क्या - क्या समान लाई है बहू हुआ तो सबसे पहले तो किताबों का जिक्र होता। सब कहते, बहुत समान लाई है बहू और पता है किताबे भी लाई है। पढ़ती होगी, टीचर होगी, पढ़ाती होगी न जाने क्या क्या बोलते गई। लेकिन उसने ऐसा समा बना दिया यहाँ कि सब उसमें घूस गये। फिर तो हमारे घर के बाकी सभी किताबों को देखने लगे। मैं भी देख रहा था।"

मैंने पूछा, “आप अपनी इस दुनिया में, एक और दुनिया बनाना चाहें तो वो किस तरह की होगी?

छत्तर भाई ने कहा, “मैं सर्वे के लिये पानीपत गया हुआ था। वहाँ पर हमें रात का सर्वे करना था गाड़ियों का, हमारा ठिकाना सड़क के किनारे पर किया गया था। वही पर टेंट लगाकर हमें रखा गया था। बहुत कड़ाके की सर्दी थी, हम सभी जागे रहते थे। ऐसा लगता था की हम फोजी जिन्दगी जी रहे हैं, पूरे इलाके को दूर से देखना मगर बहुत गहरे ढंग ( शार्प तरीके ) से देखना। कोई पूरी सड़क पर घूमता था, तो कोई पुलीस वाले की केप पहनकर रात मे सफर करने वालो के लिये कुछ और बन जाता था, कोई पास की जगह में घूमकर कुछ मांग लाता था तो कोई दुकान वालो को रात मे दुकान लगाने का न्यौता दे आता था। पूरी रात मे लगता था की सुबह हो ही ना, रात में हवा, सड़क और वहाँ का सन्नाटा कभी परेशान नहीं करता था वे तो जगाता था, सोने ही नहीं देता था, लगता था की सो गये तो बहुत कुछ गंवा देगें। हर रात दो लोगों की ड्यूटी लगती थी जागने की मगर सब जागते थे। जहाँ पर ये नहीं मालूम था कि दिल्ली मे क्या हो रहा होगा, कौन किससे लड़ रहा होगा, कौन घर से भाग गया होगा, एक महीना बस, लगता था सभी को एक और महीना मिल जाये। और लौटने के बाद मे लगता था की एक और महीना मिल जाये बस, मैं मेले में भी ऐसे ही दुआ मांगा करता था कि बस, 10 दिन और मिल जाये। ये होना चाहिये, भले ही दिन मिल जाये मगर वहाँ पर किसी बात का डर ना हो। सिर्फ लड़का पार्टी के ही या आदमियों के लिये नहीं उसमें सभी होने चाहिये, हाँ, मेरी बीवी भी। मैं तो अक्सर सोचता था की एक ग्रुप ऐसा बन जाना चाहिये जो हर तीन महीने के बाद में एक महीना बाहर जाये और किसी जगह पर रहकर आये। ऐसे ही सड़क पर अपना डेरा डाले और आसपास की जगहों से सब कुछ लाये मगर वापस आ जाये।"


मैंने पूछा, “अपनी बनाई हुई दुनिया मे कब लगता है कि मैं अकेला नहीं हूँ बल्कि अनगिनत रूप हैं मेरे?”

छत्तर भाई ने कहा, “मैंने बहुत नौकरियां बदली है, कहलो की जगहें भी बदली हैं। हर जगह पर नया काम और नई पहचान मिल ही जाती है। वहाँ पर सभी किसी वक़्त मे एक समान हो जाते हैं। सब कुछ चाहते हैं, पर किसी को पता नहीं होता की क्या? सब कहते हैं "अबे घर ही तो जाना है रूकजा आराम से चला जाइयों, जल्दी क्या है?” इसी बात मे सब आसानी से रूक जाते हैं। लगता है जैसे कोई भी घर नहीं जाना चाहता। उसी जगह पर बहुत देर तक बैठे रहते हैं कुछ भी बातें करते हैं, कोई कहीं की बताता है, कोई कहीं जाने की बस सभी लगे रहते हैं। मैं भी उन्ही के बीच मे बैठ जाता हूँ। कुछ नहीं करता, ना बोलता, बस सुनता रहता हूँ, कभी लगता है कि मैं यहाँ पर आसानी से बोल सकता हूँ और कभी लगता है कि ये लोग अपने बारे मे कहाँ बोलते हैं जो मैं अपने बारे मे बोलूं। या मैं क्या बोलू की उलझन मे रहता हूं। वो लोग मुझे देखते रहते हैं, कभी उकसाते हैं तो कभी नहीं। कभी हाथ पकड़कर खींच ही लेते हैं। मुझे लगता है कि मैं उनके बीच का ही एक हिस्सा हूँ। हमारी बातें एक समान सुनाई देती हैं, कोई दर्द या दुखी होने को बोलना यहाँ पर उसका मजाक बनवाने के जैसा है। बड़ी - बड़ी बातें करते हैं सब। कोई किसी की मदद शायद नहीं कर पाये लेकिन बातें करने मे उसका खुश कर देते हैं। ये सब बातें मुझे दुखी कर देती हैं क्योंकि मैं इनमे घूलाना नहीं चाहता, क्योंकि भइया हमारा काम तो डेलीवेज़ पर काम करने का है। कभी यहाँ तो कभी वहाँ पर, ऐसे मौके मिलना आसान नहीं होता। बीआरटी को, उसमे काम करने वालों को लोग गाली देते हैं, कोई नहीं लेकिन कभी रात मे देखना, मस्त हो जाता है पूरा रोड़। लगता है जैसे साला सच्ची का फोरनकंट्री है। अपनी ही जगह को भूल जाओंगे। लोग निकलते हैं इसे देखने के लिये, तब लगता है कि मैं अकेला दिवाना नहीं हूँ। बहुत लोग हैं।"

लख्मी

Saturday, 6 August 2011

मैं नीलम


उसने मुझसे पुछा, "आप यहाँ नये हो?”
मैंने पूरी जगह मे नज़रें घुमाते हुये कहा, “मेरी यहाँ पर तीसरी मुलाकात है, पहले भी कई बार आ चुकी हूँ पर कई साल पहले।"
उसने पूछा, “यहाँ क्यों आई हो कुछ सिखाने?”
हमारे साथ बैठे एक शख़्स ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुरा दिया। मैंने कहा, “कुछ सिखाने नहीं आ‍ई बल्कि इस जगह पर आना मुझे अच्छा लगता है।"
तुम यहाँ पर कबसे आ रही हो?” मैंने उससे फिर सवाल किया।
उसने अपने पोलीबैग को एक तरफ रखते हुए कहा, “दो दिन हुए है मुझे यहाँ आते हुए।"
"यहाँ पर क्या चीज़ है जो तुम्हे यहाँ तक ले आई" मैंने उसकी तरफ देखते हुए पूछा।
उसने कहा, “मैंने कई से, यहाँ के बारे मे सुना है पर समय ही नहीं मिलता था की यहाँ पर आ पाऊँ। लेकिन अब बच्चे की छुट्टियाँ हैं तो समय मेरे पास बच गया है। इसलिये सोचा की इन दो महीने मे कुछ सिखा जाये।"
"यहाँ पर क्या करोगी?” मैंने उससे पुछा।
मुझे सोफ्टवेयर सिखना है।" उसने कहा।
सोफ्टवेयर मे क्या?” मैंने पूछा।
वो कुछ रूक गई सोचने लगी और फिर बोली, “मुझे कुछ नहीं पता कम्पयूटर के बारे में, मैं कुछ नहीं जानती। बस लोगों के मुहँ से सुना है, सोफ्टवेयर, हार्डवेयर, लिखा हुआ देखा है सोफ्टवेयर हार्डवेयर। मैंने ये भी सुना है कि कहीं जोब करों तो इससे जुड़ी चीजें मागते हैं, लेकिन मुझे इसका जीरो भी नहीं पता, क्या सिखना है मुझे, ये मैं नहीं जानती।"
मैंने कहा, “टाइपिंग से स्टार्ट करोगी?”
उसने कहा, “हाँ, हिन्दी या अंग्रेजी दोनों ही मैं सिखना चाहती हूँ।"
मैंने उसकी पोलीबेग देखते हुए कहा, “तुम्हारी नोटबुक कहाँ है?”
उसने कहा, “उसका क्या करना है?”
मैंने कहा, “हिन्दी की टाइपिंग करोगी तो क्या टाइप करोगी?”
उसने कहा, “कहीं से भी कोई भी पेज उठा लुंगी, कर लुंगी।"
मैंने कहा, “कहीं से भी कुछ क्यो उठाओंगी? अपना लिखकर टाइप करों, उसी मे तो मज़ा है।"
उसने कहा, “नहीं बाबा, मुझे लिखना अच्छा नहीं लगता। मैं लिखना नहीं चाहती।"
मैंने कहा, “क्यों लिखना क्यों नहीं चाहती, क्यों अच्छा नहीं लगता?”
उसने कहा, “मुझे लिखना बोर लगता है। अपने बेटे को पढ़ाती हूँ उतना ही बहुत है।"
मैंने उससे कहा, “अच्छा, तुम करती क्या हो?”
उसने कहा, “मैं 5 बजे उठ जाती हूँ।"
मैंने कहा, “ये तो आपका रूटीन है। आप करती क्या हो?”
उसने कहा, “मैं अपने बेटे को स्कूल छोड़कर आती हूँ, घर का काम करती हूँ, खाना बनाती हूँ।"
मैंने कहा, “ये तो बना बनाया रूटीन है, जो किसके लिये है, कौन करवा रहा है पता ही नहीं है, ये तो एक से दूसरे मे शिफ्ट हो रहा है। तुम क्या करती हो?”

फिर उसने सोचा, वो कुछ देर चुप रही।

मैंने उससे कहा, “आपका बेटा आपको कैसे जानता है?”
उसने कहा, “कैसे जानता है क्या? मैं उसकी माँ हूँ उसे पता है।"
मैंने कहा, “इस रिश्ते से नहीं।"
उसने कहा, “फिर?”
मैंने कहा, “आपकी सास आपको बहू के रिश्ते से जानती है, पती पत्नी के, बेटा मां के क्या ये बहुत है जीने के लिये? इसके अलावा कुछ नहीं चाहिये?”
उसने कहा, “मै खुश हूँ इसमें, मुझे अच्छा लगता है ये।"
मैंने कहा, “जब आपका बेटा बड़ा होगा और आपका परिचय किसी को देगा तो आप क्या चाहोगे की वो आपके बारे मे क्या बोले? कि ये मेरी मां है, इसने मुझे पालपोस कर बड़ा किया है बस, या इसके अलावा भी कुछ और होगा?”

वो थोड़ी रूक गई और सोचने लगी।

उसने कहा, “मैं अपने बेटे की बहुत अच्छी दोस्त हूँ।"
मैंने कहा, “कब तक, 20 साल तक, 22 साल तक उसके बाद क्या?”
उसने एक जिन्दादिली के साथ कहा, “मैं हमेशा रहूँगी।"
मैंने कहा, “हर माँ बाप ये सोचते हैं कि वे अपने बच्चे के बहुत अच्छे दोस्त हैं पर एक उम्र तक आते आते बच्चा अपने रिश्ते और अपनी जगह खुद तलाशने और बनाने लगता है।"
उसने कहा, “वो मुझसे कुछ नहीं छुपाता और न कभी छुपायेगा।"
मैंने कहा, “अभी तो सब कुछ बताता है लेकिन जब बड़ा होगा, उसके दोस्त बनेगे, उसका दायरा बड़ेगा तब वो शेयरिग के लिये खास लोग तलाशेगा शायद उसमे आप न हो। घर और परिवार से दूर वो अपनी चीज़ें बांटने की जगह बनाये। क्योंकि बहुत सी बातें होगी जो वो आपको नहीं बताना चाहेगा।"
उसने कहा, “हाँ मैं मानती हूँ ऐसा होगा।"
मैंने कहा, “फिर अपने आपको आप कैसे तलाश रही हो, एक ही रिश्ता क्यों चाहती हो की सब आपको एक ही रिश्ते से जाने? क्या कभी लगता नहीं है के शायद अब अपने जीने के तरीके पर हमें सोचना होगा?'
उसने कुछ सोचते हुए बोला, “मैं ज्वैलरी बनाना सिखाती हूँ, मुखे ब्यूटीशियन का कोर्स भी आता है और सिलाई भी।"
मैंने कहा, “आपसे जो लडकियाँ सिखने आती हैं उनसे आप क्या चाहते हो की वो आपको कैसे जाने? मां, बीवी, बहू इस रिश्ते से या कुछ और है?”
उसने कहा, “मैं नहीं चाहती और न ही इस बारे मे मैं उनसे कोई बात करती। वो मुझे मेरे हूनर से जाने बस, मैं यही चाहती हूँ।"
"कोई हमें हमारे हुनर से जाने, ये कितना उत्साह भर देता है हममें?” मैंने कहा।
वो बहुत एनर्जी के साथ बोली, “हाँ, अपने आपको एक नई पहचान मिलती है। मैं पहले बाहर नहीं निकलती थी, नौ साल हो गये हमारी शादी को, मैं सिर्फ अपने बेटे को स्कूल छोडने और लेने जाती थी। मगर अभी दो महीनो से, मैंने जो सीखकर छोड दिया था। उसी को अपने जीने के तरीके मे ले आई हूँ। अब मुझसे लड़कियाँ घर में सीखने भी आती हैं और मैं बाहर जाकर भी सिखाती हूँ।"
"आपको लगा है कि इससे दायरा बड़ा है?” मैंने पूछा।
उसने कहा, “हाँ, मुझे काफी लोग जानने लगे हैं मेरे सिखाने के रिश्ते से।"
घर में सभी इस बदलाव से खुश होगें?” मैंने कहा।
उसने कहा, ““हां सास,ससुर को तो इतना क्या पता लेकिन जब मैं इन्हें फोन पर बताती हूँ तो ये बहुत खुश होते हैं।"
मैंने कहा, “फोन पर क्यों?”
उसने कहा, “वो बाहर रहते हैं ना।"
कहाँ?” मैंने कहा।
उसने कहा, “कलकत्ता। हमारी शादी के दूसरी साल ही वो काम के सिलसिले में वहां चले गये।"
मैंने कहा, “तो उन्हें ख़त लिखती हो?”
नहीं। हमारी तो फोन पर बात हो जाती हो।" उसने कहा।
मैंने कहा, “तुम्हें नही लगता की तुम्हें ख़त लिखना चाहिये?”
उसने कहा, “मैंने कहा तो मुझे लिखना अच्छा नही लगता।"
मैंने कहा, “मैं लिखने के लिये नही बोल रही मैं ख़त के लिये बोल रही हूँ।"
उसने कहा, “नही मुझे तो फोन बेहतर लगता है।"
मैंने कहा, “पर मुझे तो लगता है कि खत के जरिये हमारे पास सारी बातें सैव हो जाती हैं जिन्हे जब चाहो पढ़कर ताज़ा कर लो।"
उसने कहा, “नही फोन पर हुई बातों में भी बहुत मज़ा होता है। मैं कभी खाना बना रही होती हूं और इनकी कोई भी बात याद आ जाती है तो हंस देती हूँ।"
मैंने कहा, “क्या दो महीने पहले हुई बात जस की तस आपको याद रहती है?”
उसने कहा, “नही कुछ-कुछ भूल जाते है।"
मैंने कहा, “और छह महीने बाद कुछ-कुछ से ज्यादा भूल जाते हैं शायद।"
हाँ ऐसा तो होता है।" उसने कहा।
मैंने कहा, “ये जो भूलने की क्षमता है वो कमाल की है तभी तो हमारे साथ हुई घटना ज्यादा समय तक ताज़ी नही रहती अगर ऐसा न हो तो शायद हम उसी दर्द में अकेले रह जाये।"
उसने कहा, “हाँ ये तो सही है अगर ऐसा न हो तो हम कोई रिश्ता भी नही बना पायेगें।"

उसने बहुत देर देखने के बाद मे मुझसे पूछा, “आपका नाम क्या है?”
मेरा नाम यशोदा है। और आपका?
वो बोली, “मै नीलम।"


दक्षिणपुरी 23 मई 2011
यशोदा