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Friday, 5 February 2016

आम लड़की

हेमा हम सबकी तरह एक आम लड़की थी, परंतु उसने बचपन से दुख ही देखे थे। सुख का अनुभव भी नहीं था। हेमा बचपन में ही अपने पिता से किसी कारणवश दूर हो गई। वो अपनी मम्मी के साथ नाना के घर रहती थी। उसके दो छोटे भाई थे- एक का नाम भोला था और दूसरे का शिक्का। उसका नाम तो अरुण था पर प्यार से सब उसे शिक्का कहते थे। हेमा की मम्मी स्कूल में खाना बनाती थी। खाना बनाने के साथ-साथ वह घर का तथा जानवरों का पूरा काम करती थी। हेमा ने अपनी मम्मी को कभी आराम करते नहीं देखा था। हेमा की मामी जी मानसिक रूप से कमज़ोर थी। इसलिए सारा काम हेमा की मां को करना पड़ता था। हेमा ने जब से होश संभाला वो अपनी मां के साथ घर के तथा खेतों के काम में हाथ बंटाने लगी। जब हेमा 7 साल की हुई तो उसके नाना ने उसका दाखिला गांव के स्कूल में करवा दिया। स्कूल हेमा के घर से नजदीक में था इसलिए हेमा का ध्यान स्कूल में कम घर में ज़्यादा रहता था।

उसे पढ़ाई के नाम से ही चिढ़ थी। जब भी उसे मौक़ा मिलता घर भागने की कोशिश करती रहती। उसके स्कूल का काम कभी पूरा नहीं होता था। जब भी टीचर पूछती कि हेमा गृहकार्य क्यों नहीं किया तो उसका एक ही जवाब रहता कि कपड़े धो रही थी, बत्र्तन धो रही थी। जानवरों के लिए चारा लेने खेत पर गई थी आदि। अनगिनत बहाने उसके पास तैनात रहते थे। कुछ समय तक ऐसा चलता रहा फिर एक दिन टीचर ने हेमा के नाना को बुलाया और उनसे पूछा कि आप हेमा से काम क्यों करवाते हैं, अभी उसके खेलने-कूदने की उम्र है न कि चैका-चूल्हा संभालने की।टीचर के मुंह से ऐसे वचन सुनकर उनका चेहरा सफेद पड़ गया मानो उन्हें कुछ पता ही न हो। जब उन्होंने घर जाकर नानी की पूछा तो पता चला कि नानी हेमा से जान-बूझकर काम करवाती हैं। नाना ने उन्हें बहुत डांटा तथा हेमा को प्यार से समझाया कि स्कूल जाना अच्छी बात होती है, पढ़ने से व्यक्ति का जीवन अच्छा बनता है। हेमा ने मासूमियत के साथ कहा, ‘नाना जी, मम्मी को अकेले काम कन्नो परैगो। जब मम्मी घर को, पौहेन को और स्कूल में खाना बनानो सब काम उन्हीं पै आ जाएगो, मम्मी तो वैसेऊ बहुत चिंता करती है।नाना के बहुत समझाने पर हेमा स्कूल जाने लगी।

एक दिन हेमा स्कूल नहीं आई। टीचर के पूछने पर एक लड़की ने बताया कि वो अपने पापा के घर गई है। उसके पापा उसे बुलाने आए थे इसलिए वो चली गई परंतु विमला बुआ, भोला और सिक्का यहीं हैं, वो नहीं गए। हेम आठ महीने पापा के पास रही। जब वहां से लौटी तो एकदम गोल-मोल, क्यूट सी बहुत सुंदर लग रही थी। रोज़, एक से एक नए कपड़े पहनती थी। मैं, शीतू तथा कक्षा के और बच्चे हेमा से बहुत कम बोलते थे पर दो दिन बाद जब वो स्कूल आई तो हम सबसे बहुत अच्छे से बोली। पहले बोलना तो दूर हम सबकी तरफ़ देखती भी नहीं थी क्योंकि उसकी नानी का कहना था कि वो ब्राह्मण है और हम अन्य जाति के। हम सबको इस बात का बेहद आश्चर्य था कि पहली बार हेमा ने अपनी नानी की कोई बात नहीं मानी थी। हेमा जबसे अपने पापा के पास रहकर आई थी, वो बेहद समझदार हो गई थी। मैंने सुना था कि उसके पापा खुले विचारों के व्यक्ति थे। वे जात-पात पर विश्वास नहीं करते थे। हेमा की पढ़ने में रूचि देख हमारी कक्षाध्यापक श्रीमान अजय भी चकित व हैरान थे कि जिस हेमा को पढ़ाई के नाम से चिढ़ थी उसे आज पढ़ने में इतनी रूचि देख मास्टर जी भी बहुत खुश थे क्योंकि एक तरह से उनकी मेहनत रंग लाई थी।

कुछ समय बाद वार्षिक परीक्षा थी। परीक्षा परिणाम सुनकर हम सब हैरान थे कि हेमा ने कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। हेमा बहुत खुश थी पर उसकी ये खुशी ज़्यादा देर तक न रही क्योंकि उसकी नानी घर का काम न होने की वजह से आगबबूला हो रही थी। स्कूल से जब हेमा घर की दहलीज़ पर कदम रखा ही था कि नानी ने डंडे से उसे बहुत मारा। हेमा ने रो-रोकर घर का सारा काम किया। जब हेमा खेत पर चारा लेने जा रही थी तो मेरी दादी ने बुलाया उसके घाव देखे। कुल 18 जगह हाथ-पैरों पर उसके नील पड़े थे। दादी ने उसे हल्दी वाला दूध दिया। हेमा ने पहले तो मना किया पर दादी के कहने पर बाद में दूध पी लिया। कुछ देर उसने घर पर आराम किया। मेरे चाचा तो बैलगाड़ी पर चारा काट कर लाते थे। चाचा एक बार में इतनी चारी काट कर लाते थे कि जानवर तीन छाक खाए। उस दिन भी चाचा चारी लाए, दादी के कहने पर चाचा ने एक गठरी चरी हेमा को दे दी। हेमा घर गई तो नानी ने खरी-खोटी सुनाई, गालियां दी और सांझ को खाना तक नहीं दिया, बेचारी भूखी ही सो गई। दूसरे दिन स्कूल था। सरकारी स्कूल था इसलिए हम सबको वहीं से खाना मिलता था। हेमा से आधी छुट्टी तक का इंतज़ार नहीं हो रहा था पर जैसे-तैसे उसने अपनी भूख पर काबू किया। आधी छुट्टी हुई तो सभी बच्चे हाॅल में पहुंच गए। उस दिन खाने में दाल-रोटी बनी थी। जब हम हाॅल में पहुंचे तो देखा कि कम से कम तीन सौ बच्चे खाने की लाइन में लगे थे। पूरे हाल में शोर गूंज रहा था। पहले मुझे दो, मुझे दो का शोर गूंज रहा था। शोर सुनकर अजय मास्टर जी हाॅल में पहुंचे। मास्टर जी के पहुंचते ही सभी बच्चे शांत हो गए। मास्टर जी मुझसे बोले, ‘जाओ जाकर खाना बनाने में ताई जी की मदद करो!उस वक़्त मैं ज़्यादा बढ़ी नहीं थी, सात-आठ साल की रही होंगी पर कहते है न कि जितनी छोटी उतनी खोटी वही हिसाब मेरा भी था। पूरे स्कूल में मेरा रौब था। उस वक़्त स्कूल का प्रत्येक बच्चा मेरी बात मानता था इसलिए नहीं कि मैं पढ़ने में अच्छी थी या कोई मुझसे डरता था बल्कि इसलिए क्योंकि सब मेरे दादा जी की बहुत इज्ज़त करते थे और मेरे दादा जी मुझे परेशान या उदास नहीं देख सकते हैं। वो बस मुझे खुश देखना चाहते थे। ये बात गांव के सभी लोग जानते थे इसलिए मुझसे कभी कोई कुछ भी नहीं कहता था इसलिए मास्टर जी ने मदद करने वाली बात मुझसे कही। मास्टर जी की बात अभी पूरी भी नहीं हो पाई थी कि मैं जल्दी से जाकर खाना बंटवाने लगी। मैंने एक थाली में खाना परोसा और हेमा के पास पहुंचा दिया। उसी दिन से मेरी और हेमा की दोस्ती की शुरूआत हुई। उस दिन के बाद हेमा अपनी अच्छी-बुरी यादें, सुख-दुख सब मेरे साथ बांटने लगी। हेमा की मां का तबादला भी हमारे स्कूल में हो गया। अब वो हमारे स्कूल में खाना बनाती थी। हेमा और मैं, कभी-कभी उसकी मां की मदद कर दिया करते थे। हेमा मुझसे दो-तीन साल बड़ी थी इसलिए उसे खाना बनाना आता था, मुझे खाना बनाना नहीं आता था।

मैं, शीतू और हेमा हम तीनों पक्की सहेली बन गई। हम तीनों जब तक स्कूल में रहते, साथ खाते-पीते, साथ खेलते। देर-देर तक बातें करते। हेमा की नानी को ये तो पता था कि मैं उसकी सहेली हूं पर ये नहीं पता था कि शीतू भी उसकी सहेली है। जब हेमा मेरे साथ नहीं होती थी तभी मैं शीते से बात करती थी पर जब ये बात हेमा की मां को पता चली तो उन्होंने हमारी दोस्ती को प्रोत्साहित किया। अब तो हमें किसी बात का डर ही नहीं था। हम तीनों बहुत मस्ती करते थे। हम तीनों ने साथ में बहुत से खेल खेले जैसे गिट्टे, कबड्डी, खो-खो, रस्सा टापना, गिल्ली-डंडा इत्यादि अनेकों खेल खेलें पर हमने कभी लड़कियों की तरह गुड्डे-गुडिया से नहीं खेला, ज्यादातर लड़कों वाले खेल खेलते थे। कड़ी टक्कर देते थे हम लड़को को। एक बार ये बात हेमा की नानी को पता चल गई कि हम तीनों मंदिर के पास गिट्टे खेल रहे हैं। वह गुस्से में भागती हुई आईं, वहीं हम सबके सामने हेमा को शीशम की डंडी से पीटने लगी। उस वक़्त हम कुल ढाई सौ बच्चे होंगे। एक बच्चा भागकर हेमा की मां और मास्टर जी को बुलाने गया। उन्हें आने में पता नहीं कितनी देर लगती, हम अपनी सहेली को इतनी देर पिटते देख नहीं सकते थे। मैंने रिंकू और लालू से कहा तुम दोनों जाकर डोकरी से कैसेऊ करके डंडा छीन लाओ फिर तो हम देख ही लेंगे। वो दोनों लंबे-लंबे थे इसलिए उन्होंने डोकरी के हाथ से डंडा छीन लिया, फिर क्या डोकरी तिलमिला गई। वो दोनों ठहरे छोटे डोकरी के हाथों आने से रहे। उन्हें जा बात समझते देर न लगी कि जा सब मेरी करतूत है तब तक मास्टर जी और हेमा की मां आ गई। हेमा सिसक रही थी। उसकी मां ने उसे जैसे-तैसे चुप करवाया। मास्टर जी ने हेमा की नानी को बहुत समझाते हुए कहा अगर बच्चे साथ रहेंगे तो खेलेंगे-कूदेंगे तो फिर येउनकी उम्र है खेलने-कूदने की पर नानी कुछ समझना नहीं चाहती थी। वो वहां से घर के लिए चल दी और हम सब स्कूल में वापस चले गए। नानी ने जाकर मेरे घर, शीतू, लालू, रिंकू के घर जाकर शिकायत लगा दी। मेरा सारा गुस्सा मेरी दादी पर निकाल दिया। मेरी दादी को उन्होंने खूब खरी-खोटी सुनाई। जब हम सब अपने-अपने घर पहुंचे तो मेरी मम्मी ने पहली बार मुझ पर हाथ उठाया था। तीन-चार थप्पड़ मार दिए और बहुत डांटा और कहा कोई ज़रूरत ना हेमा के साथ रहने की। अब मैंने सुन लिया ना कि तू हेमा के साथ रहती है तो देख लियो तेरी खैर नहीं। मैं थोड़ी देर तक रोती रही। घर से बाहर खेलने नहीं गई। रात को दूध पीकर ही सो गई। खाना भी नहीं खाया। दोपहर को स्कूल से आने के बाद जो खाना खाया सो उसके बाद मार खानी पड़ी। एक गिलास दूध से क्या होता है पर गुस्से में खाना नहीं खाया। सुबह उठकर नहाने के लिए नल पर गई मम्मी ने नल चला दिया और मैंने जल्दी से नहाया, नहाने के बाद चाय पी, नाश्ता किया। फिर तैयार होने के बाद स्कूल गई तो पता चला कि हम पांचों ही कल पिटे थे और लालू, रिंकू, हेमा को उनकी मम्मी ने खाना दिया नहीं। मैंने और शीतू ने खाया नहीं, उस दिन स्कूल में आलू-पूरी बनी थी। मास्टर जी से हमने कह दिया कि सबसे पहले खाना हम पांचों को दिलवाना क्योंकि हमारी पिटाई आपकी वजह से हुई है। मास्टर जी हंसकर बोले, मेरी वजह से कैसे! मैंने कहा कि मास्टर जी अगर आप जल्दी आ जाते तो ये सब नहीं होता। अच्छा जी, हम सब एक साथ बोल पड़े। मास्टर जी बोले, मैंने कहा था न कि अम्मा जी की छड़ी छीन लो मास्टर जी ने हंसते हुए कहा कि अच्छा ये बताओ कि तुम्हारी पिटाई कैसे हुई। लालू बोला, उस खुसड़ बुढि़या ने जाकर हमारे घरों में चुगली कर दी तो पिटना तो था ही। मास्टर जी ने हम पांचों की खाना दिलवाया और अपने सामने बिठाकर खिलाया। ऐसे ही धीरे-धीरे पांच साल बीत गए हेमा की जि़ंदगी में कोई सुधार नहीं आया। मैं दिल्ली चली आई। हेमा वहीं पढ़ती रही। शीतू अपनी दीदी के घर उझयानी पढ़ने चली गई। हम तीनों अलग-अलग हो गए। ग्रीष्मावकाश में हम तीनों गांव में मिलते थे। आठवीं की परीक्षा के बाद हेमा के नाना ने उसका स्कूल छुड़ा दिया। शीतू भी गांव वापस आ गई क्योंकि गांव में भी अब इंटर काॅलेज बन गया था। शीतू ने उसी स्कूल में दाखिला ले लिया इस बार मैंने और शीतू ने नौंवी की परीक्षा में सफलता प्राप्त की। ग्रीष्मावकाश शुरू हुए मैं जब गांव पहुंची तो पता चला कि हेमा की शादी हो गई। ये सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा क्योंकि अभी हेमा सिर्फ़ सोलह साल की थी। मैं अब कुछ कर भी नहीं सकती थी दूसरे दिन मैं और शीतू मास्टर जी से मिलने स्कूल गए। मैंने मास्टर जी से पूछा कि आपने हेमा की शादी क्यों नहीं रोकी! आपको पता था कि यह ब्याह कानून के खिलाफ़ है। मास्टर जी ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि बेटा लड़का बहुत अच्छा है, वो हेमा को सदैव खुश रखेगा। मास्टर जी की बात पर भरोसा करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं था। कुछ दिनों बाद मैं वापस दिल्ली आ गई। जब दोबारा गांव जाना हुआ तो पता चला कि हेमा सच में बहुत खुश है अपनी जिं़दगी में। उसने कभी हार नहीं मानी, कभी टूटी नहीं, दुख से घबराई नहीं बल्कि दुख को अपना मित्र बना लिया।

... शीतल

Sunday, 28 August 2011

वो एक दिन, फिर से मिला मुझे


मैंने पूछा, "पूरी दुनिया में हर कोई सब कुछ भूल रहा है, दुनिया को अगर ऐसे देखे तो?”

छत्तर भाई ने कहा, “मैं मेले मे काम करता था, 10 दिन का ये काम मेरे लिये इस तरह का होता की, मैं पूरे शहर से, इलाके से और अपने आसपास से मिल भी लेता और उनसे दूर भी रहता। ये 10 दिन मेरे लिये दिन के जैसे नहीं होते थे। ये लगता था की मेरे लिये सारा समय उल्टा चल रहा है।

कई लोग किसी को ढूंढते हुये आते तो उन्हे मैं मिल जाता और कुछ जो अपनो से खो जाते तो मैं मिल जाता। मेरा तो सबको मिल जाना तय ही रहता था। कभी मेरी ड्यूटी मेले के भीतर लगती थी तो कभी गेट पर, गेट पर मुझे मेरी ड्यूटी पसंद नहीं थी, वहाँ पर जबरदस्ती रिश्तेदारी निभानी होती थी। लम्बी लाइन से बचने के लिये लोग मुझे खोजते हुये आते और सही बताऊं तो कभी - कभी मैं उनसे छूपने के लिये अपने मुहँ पर कपड़ा लपेट लेता। मेरे लिये उस लाइन मे कोई भी तो पराया नहीं था। मुझे तो ये भी नहीं मालुम था की इस लम्बी लाइन मे लगे लोग मेरे इलाके के है या उससे बाहर के। मेला का हर दिन मेरे लिये ऐसा लगता था कि मेरा काम 10 से 12 दिनों का नहीं है बल्कि बहुत लम्बे समय से चल रहा है। 10 दिन पूरा महीना लगने लगते। रात मे बस बिजली की रोश्नियों मे लोग मुझे जरूर तलाशते थे वो भी जो मुझे जानते थे और वो भी जो मुझे जानना चाहते थे। और मैं मेले में खड़ा यही सोचता था की, मैं तो यहाँ पर खुले मे खड़ा हूँ और फिर मुझे लोग ढूंढ रहे हैं। कभी - कभी होता है ना, हम बस स्टेंड पर खड़े जिस गाडी का इंतजारे करते है वही नहीं मिलती। उसके अलावा सब कुछ मिलता है। वैसे ही यहाँ मेले की जिन्दगी है, जिसे ढूंढों वही नहीं मिलता बाकी सब मिलते हैं और जिससे खो जाना चाहो वही सबसे पहले मिलता है। मैं गेट से अन्दर की तरफ हमेशा खिसक आता था। क्योंकि मेले के अन्दर रेहडी वालो, खोका मार्किट वालो से मेरी दोस्ती थी, वहाँ पर खड़ा होकर मैं पूरे मेले के मजे लूट लिया करता था। एक बार की बात बताता हूँ मेरी ड्यूटी मेले की बीच जगह पर लगी, जहाँ पर जमीन पर बैठकर लोग दुकान लगाया करते थे। ये वे लोग थे जो मेले मे दुकान लगाने का कुछ नहीं देते थे। वहाँ पर एक नाम गोदने वाला बन्दा था। उसके यहाँ पर बहुत भीड़ लगी थी, सभी नाम गुदवा रहे थे कोई किसी का नाम तो कोई किसी का, कोई भगवान का तो कोई अपने पति। वहीं पर भीड़ थी सबसे ज्यादा। एक लड़का सबसे पीछे आया और जल्दी से अपना काम करवाना चाहता था। मगर कुछ शरमा रहा था। इतने मे उसने अपनी कमीज उतारी और सीने पर नाम गुदवाने लगा। उसकी पूरी कमर पर नाम गुदे हुये थे। ये गजनी फिल्म तो अब आई है। यहाँ मेले मे कई ऐसे लड़के देख चुका हूँ जो अपने शरीर पर नामो का रेला लेकर चलते हैं। 10 दिन तक चलने वाला मेला, ऐसे लोगों से मिलवा देता था। मगर 10 दिन बीत जाने के बाद मे लगता की ये फिर नहीं मिलेगे। मैं भी सोचता था की अपने हाथों पर कुछ गुदवा लूँ, कम से कम पहली बार लगे मेले का साल ही। पर जब सब लोग भूल जाते हैं तभी तो मिलने का मज़ा था है। हमारी ड्यूटी मेला लगने के बाद और मेला उतरने से पहले ही खत्म हो जाती थी। तो वो उतरता हुआ मैं कभी नहीं देख पाया। सही बताऊँ तो इस विराट के मैदान मे मैं जब मेला नहीं लगता तब जाता हूँ तो मुझे सच मे ये नहीं पता रहता कि कौनसी दुकान कहाँ पर लगी थी और मैं कहाँ खड़ा होता था।"


मैंने पूछा, "खुद को कब आपने खोया हुआ पाया?”

छत्तर भाई ने कहा, “आज कल मेरी ड्यूटी बीआरटी लाइन पर है, यहाँ पर मुझे कोई नहीं पहचानता, वो जो मेरे साथ काम करते हैं वो भी और जो सड़क से निकल रहा है वो भी। यहाँ पर तो आप आटोमेटिक खोये हुये हो और सही मायने मे ये बहुत अच्छा है, खोये हुये रहना, एक अलग से जीने को भी कहता है। जिसमें शर्म, किसी के पहचान लेने का डर नहीं होता, बैठो - उठों और खाओ पियो। वैसे कोई जानने वाला भी क्या रोक लेगा तुम्हे कुछ करने से। मगर किसी के कुछ पूछ लेने का जवाब नहीं देना चाहते तो क्या हो? मैं ट्रफिक के बीचों बीच होता हूँ, शुरू शुरू मे बहुत डर लगता था। ऐसा लगता था की जैसे अगर कोई ध्यान न देकर चल रहा होगा तो वो पहले मार ही देगा चाहे हल्की सी ही क्यों न लगे। मगर कुछ दिनों के बाद में सब कुछ अपने आप सख़्त होता गया। मैं खुद भी सख़्त हो गया। मैं इसी सड़क पर कई समय से काम कर रहा हूँ, जगह बदल जाती है, कभी सड़क के सीधे जाने वाले रोड़ पर होता हूँ तो कभी यू टर्न पर, कभी उल्टे हाथ की तरफ जाने वाले रोड़ पर होता हूँ तो कभी सीधे हाथ की तरफ, एक ही ये रोड़ हर साइड पर खड़े होने के बाद मे अलग लगता है। गाडियां सारी एक जैसी है जो पूरे सड़क पर भाग रही है, लेकिन कहीं पर कुछ कम जाती है तो कहीं पर कुछ ज्यादा। कोई लाइट छोटी कर रखी है तो कोई बड़ी। मैं जो चाहता हूँ वो हमेशा होगा ये तो मेरी भूल है पर मैं चाहता हूँ की सड़क के बीच मे रहूँ मगर फिर भी खोया हुआ रहूँ।मैं जब सड़क पर होता हूँ तो खोया रहता हूँ और जब मैं घर आता हूँ तब लगता है कि मैं उस छत्तर को खो आया जो सड़क पर खड़ा था। अच्छा नहीं लगता वहाँ से वापस आना। घर में आपको सभी प्यार बहुत करते हैं मगर उनका प्यार अपनी तरफ खींचता है, पकड़े रखता है। मैं विराट के मैदान मे पला बड़ा हूँ, वहीं पर मैं सब कुछ सीखा, कुश्ती, क्रिक्रेट और काम भी, गाड़ी चलाना भी पर आज तक उसको पहचान नहीं पाया हूँ, जब मुझे कोई नौकरी मिलती है वो विराट के मैदान से ही जुड़ी होती है और मैं फिर से उसमें एक अजांन आदमी तरह खड़ा हो जाता हूँ। ऐसा मेरे साथ मेरे घर मे कभी महसूस नहीं हुआ। घर काफी बार बदला, हर साल बदलता है लेकिन फिर भी लगता है कि मेरा है, मैं इसे जानता हूँ। परिवार वाले कभी - कभी खोये हुये लगते हैं लेकिन घर कभी नहीं लगता।


मैनें पूछा, “अपने को खो देना क्या है?”

छत्तर भाई ने कहा, “दुनिया बनाना है, ये मैं नहीं कहता मेरी बीवी कहती है - तब मुझे पता चलता है। वो बहुत किताब पढ़ती है, जब घर लौटता हूँ तो वो किताब पढ़ रही होती और जब वो घर मे नहीं होती तो किताब जमीन पर इस तरह रखी होगी की देखते ही लग जायेगा की अभी किताब पढ़कर गई है कहीं। उसको मैंने पूछा था ये कि तुझे लगता है कि तू किताब पढ़कर इन घरेलू झमेलो से दूर हो जाती है? तब उसने कहा था की मैं किताब इन झमेलो से दूर होने के लिये नहीं पढ़ती हूँ मैं तो ऐसा माहौल चाहती हूँ अपने पास में जो मुझे अपने मे लगाये रखे, इसलिये ये मैं खुद से बना लेती हूँ। किसी चीज़ से लगाव रखना बाकी चीज़ों से काटता नहीं है वो तो एक और चीज़ एड कर देता है। वो अपनी इस बनाई हुई दुनिया में लीन रहती है, जो सिर्फ उसके अकेले के लिये नहीं है, उसकी बहन भी इसमे शामिल हो जाती है। जब वो नई नई आई तो उसको देखने के लिये सब आये, वो कमरे मे बैठी हुई थी, अपने समान को दिखा रही थी, पहले तो सब उसे देखते और उसकी खूबसूरती की सब तारीफ करते। पूरे कमरे मे काफी औरते थी। पहले उसे देखती फिर समानों पर निगाह डालती, उसके समान को खोलकर सभी देख रही थी। फिर उसका छोटा बैग खोला तो उसमे कुछ किताबे थी, उसकी डायरियाँ की तो सभी चौंक गई, कहने लगी किताबे भी लाई है। बस यही बात सबकी जुबान पर चिपक गई,  क्या - क्या समान लाई है बहू हुआ तो सबसे पहले तो किताबों का जिक्र होता। सब कहते, बहुत समान लाई है बहू और पता है किताबे भी लाई है। पढ़ती होगी, टीचर होगी, पढ़ाती होगी न जाने क्या क्या बोलते गई। लेकिन उसने ऐसा समा बना दिया यहाँ कि सब उसमें घूस गये। फिर तो हमारे घर के बाकी सभी किताबों को देखने लगे। मैं भी देख रहा था।"

मैंने पूछा, “आप अपनी इस दुनिया में, एक और दुनिया बनाना चाहें तो वो किस तरह की होगी?

छत्तर भाई ने कहा, “मैं सर्वे के लिये पानीपत गया हुआ था। वहाँ पर हमें रात का सर्वे करना था गाड़ियों का, हमारा ठिकाना सड़क के किनारे पर किया गया था। वही पर टेंट लगाकर हमें रखा गया था। बहुत कड़ाके की सर्दी थी, हम सभी जागे रहते थे। ऐसा लगता था की हम फोजी जिन्दगी जी रहे हैं, पूरे इलाके को दूर से देखना मगर बहुत गहरे ढंग ( शार्प तरीके ) से देखना। कोई पूरी सड़क पर घूमता था, तो कोई पुलीस वाले की केप पहनकर रात मे सफर करने वालो के लिये कुछ और बन जाता था, कोई पास की जगह में घूमकर कुछ मांग लाता था तो कोई दुकान वालो को रात मे दुकान लगाने का न्यौता दे आता था। पूरी रात मे लगता था की सुबह हो ही ना, रात में हवा, सड़क और वहाँ का सन्नाटा कभी परेशान नहीं करता था वे तो जगाता था, सोने ही नहीं देता था, लगता था की सो गये तो बहुत कुछ गंवा देगें। हर रात दो लोगों की ड्यूटी लगती थी जागने की मगर सब जागते थे। जहाँ पर ये नहीं मालूम था कि दिल्ली मे क्या हो रहा होगा, कौन किससे लड़ रहा होगा, कौन घर से भाग गया होगा, एक महीना बस, लगता था सभी को एक और महीना मिल जाये। और लौटने के बाद मे लगता था की एक और महीना मिल जाये बस, मैं मेले में भी ऐसे ही दुआ मांगा करता था कि बस, 10 दिन और मिल जाये। ये होना चाहिये, भले ही दिन मिल जाये मगर वहाँ पर किसी बात का डर ना हो। सिर्फ लड़का पार्टी के ही या आदमियों के लिये नहीं उसमें सभी होने चाहिये, हाँ, मेरी बीवी भी। मैं तो अक्सर सोचता था की एक ग्रुप ऐसा बन जाना चाहिये जो हर तीन महीने के बाद में एक महीना बाहर जाये और किसी जगह पर रहकर आये। ऐसे ही सड़क पर अपना डेरा डाले और आसपास की जगहों से सब कुछ लाये मगर वापस आ जाये।"


मैंने पूछा, “अपनी बनाई हुई दुनिया मे कब लगता है कि मैं अकेला नहीं हूँ बल्कि अनगिनत रूप हैं मेरे?”

छत्तर भाई ने कहा, “मैंने बहुत नौकरियां बदली है, कहलो की जगहें भी बदली हैं। हर जगह पर नया काम और नई पहचान मिल ही जाती है। वहाँ पर सभी किसी वक़्त मे एक समान हो जाते हैं। सब कुछ चाहते हैं, पर किसी को पता नहीं होता की क्या? सब कहते हैं "अबे घर ही तो जाना है रूकजा आराम से चला जाइयों, जल्दी क्या है?” इसी बात मे सब आसानी से रूक जाते हैं। लगता है जैसे कोई भी घर नहीं जाना चाहता। उसी जगह पर बहुत देर तक बैठे रहते हैं कुछ भी बातें करते हैं, कोई कहीं की बताता है, कोई कहीं जाने की बस सभी लगे रहते हैं। मैं भी उन्ही के बीच मे बैठ जाता हूँ। कुछ नहीं करता, ना बोलता, बस सुनता रहता हूँ, कभी लगता है कि मैं यहाँ पर आसानी से बोल सकता हूँ और कभी लगता है कि ये लोग अपने बारे मे कहाँ बोलते हैं जो मैं अपने बारे मे बोलूं। या मैं क्या बोलू की उलझन मे रहता हूं। वो लोग मुझे देखते रहते हैं, कभी उकसाते हैं तो कभी नहीं। कभी हाथ पकड़कर खींच ही लेते हैं। मुझे लगता है कि मैं उनके बीच का ही एक हिस्सा हूँ। हमारी बातें एक समान सुनाई देती हैं, कोई दर्द या दुखी होने को बोलना यहाँ पर उसका मजाक बनवाने के जैसा है। बड़ी - बड़ी बातें करते हैं सब। कोई किसी की मदद शायद नहीं कर पाये लेकिन बातें करने मे उसका खुश कर देते हैं। ये सब बातें मुझे दुखी कर देती हैं क्योंकि मैं इनमे घूलाना नहीं चाहता, क्योंकि भइया हमारा काम तो डेलीवेज़ पर काम करने का है। कभी यहाँ तो कभी वहाँ पर, ऐसे मौके मिलना आसान नहीं होता। बीआरटी को, उसमे काम करने वालों को लोग गाली देते हैं, कोई नहीं लेकिन कभी रात मे देखना, मस्त हो जाता है पूरा रोड़। लगता है जैसे साला सच्ची का फोरनकंट्री है। अपनी ही जगह को भूल जाओंगे। लोग निकलते हैं इसे देखने के लिये, तब लगता है कि मैं अकेला दिवाना नहीं हूँ। बहुत लोग हैं।"

लख्मी

Monday, 8 August 2011

कहां रहते हैं और कहां जायेगें

दरवाजों की भीड़ लगी थी, सभी लोग उन दरवाजों को देख रहे थे। कोई उनके पीछे से कुछ सुना रहा था। सभी दरवाजे खुले थे। ये किस के है?, कहां से है?, कब से हैं और यहां पर कैसे आये? को कोई नहीं जानना चाहता था। हर दरवाजे पर अनगिनत नाम लिखे थे। सभी उन नामों मे अपने नामों को ढूंढ रहे थे। अब खुरचना चालू हुआ। दरवाजे के पीछे से वो सुनाई देने वाली आवाज़ भर्राने लगी। दरवाजें लुढ़कने लगे। जैसे व्याथा मे पुकार रहे हैं। धीरे धीरे बन्द होने लगे। वो सुनाई देने वाली आवाज़ भी गायब होने लगी। खुर्चना अब भी चालू था।


खुली बोरी, खुली अलमारी, खुला टीवी, खुला दरवाजा, बंद बक्सा, खुला बिस्तर सब कुछ सड़क के एक किनारे पर लदा पड़ा है। एक आदमी उनको भर रहा है। देखने वाली नज़रें उनमे कुछ तलाश रही है। जो खुले है वो सबके है और जो बंद है उनके किसी के होने की चाह बसी है। 


कई तस्वीरें दीवारें पर चिपकी हैं। कोई आदमी नहीं है और न ही कोई औरत। हर रात कोई इन तस्वीरों की भीड़ में कोई न कोई तस्वीर शामिल कर जाता है। कोई भी पुरानी तस्वीर नहीं है सब नई है जैसे कोई है जो सबके साथ है। मगर किसके साथ कब है ये पता नहीं।


वो दिवार के पीछे से कुछ बोल रहा था। उसके बोल मुझ तक नहीं आ रहे थे। मगर उसके कांपते लब्ज़ों के लहलहाहट मुझतक आ चुकी थी। ये कोई जीवन की दास्तान नहीं थी और ना ही कोई दर्द था। सब उसकी ओर कान लगाये थे। वो काफी दिन के बाद लौटा है। हर किसी के पास उसको देने और सुनाने के लिये एक नई दास्तान है।

वो सुनाते हुए अपने साथ लाये बक्शे को खोले जा रहा है। निगाहों को उसके इस खेल ने अपने वश मे कर लिया है। वो कहां से आया है, कहां जायेगा को लोग बिना जाने उसके अभी की बनाई दुनिया मे घूम रहे हैं। जैसे कोई नाव बहते समंदर की तेज लहरों पर गोते खा रही हो और वापसी आने की बजाये और अन्दर जाने के लिये जोर पकड़ रही हो।

यशोदा