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Tuesday, 5 February 2019

मंझली खो गई


रात के बारह-साढ़े बारह का समय था। आसपास के सभी लोग सो चुके थे। हमारा परिवार भी सो चुका था पर मम्मी-पापा चाची की बीमारी की बातें कर रहे थे। आज उनकी तबीयत बहुत खराब थी और घर में चाचा जी भी नहीं थे। मम्मी उन्हें उनके कमरे में सुलाकर आई थी। उनके दोनों बच्चे छत पर बड़ी ताई जी के साथ सो रहे थे तभी ताई ने दीपू, उनकी बड़ी बेटी को जगाया और नीचे पानी लेने भेज दिया। दीपू जैसे ही कमरे में घुसी तो देखा मम्मी लंबी-लंबी सांसें ले रही थी। वो भागकर मम्मी के पास पहुँची और उनका हाथ पकड़ते हुए बोली, क्या हुआ मम्मी। उसकी मम्मी थी कि लगातार हाँफे जा रही थी। दीपू ने फिर से उनका हाथ पकड़कर हिलाया तो उन्होंने उसका हाथ पकड़कर पंखे की तरफ़ इशारा किया। दीपू मम्मी का हाथ छोड़कर पंखे का बटन दबाने भागी। जब वह मम्मी के पास जाकर खड़ी हुई तो देखा कि उनका चेहरा पसीने से त था औ सांसे तेज़ रफ़्तार में चल ही थी। दीपू को कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह घबराकर रसोई से ठंडे पानी की बोतल लाकर मम्मी को पानी पिलाने लगी पर उन्होंने पानी पीने से मना कर दिया। दीपू की घबराहट बढ़ती ही जा रही थी। मम्मी की सांसों की रफ़्तार कम होने लगी। दीपू ने मम्मी को छूकर देखा तो उनके हाथ-पैर ठंडे पड़े थे। दीपू ने मम्मी के हाथ-पैर मसलने शुरू कर दिए। वो इतनी घबरा गई थी कि बड़ी ताई को कमरे से ही ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ें लगानी शुरू कर दी थी। मम्मी ने उसका हाथ कसकर पकड़ रखा था। दीपू की आवाज़ किसी ने नहीं सुनी।

काफ़ी देर बाद दीपू ने मम्मी के हाथ से अपना हाथ छुड़ाया और ज़ीने से ऊपर भागी और जाकर ताई का दरवाज़ा खटखटाते हुए आवाज़ लगाने लगी, ताई... ओ ताई। ताऊ और ताई दोनों गहरी नींद में थे। दीपू की आवाज़ सुनकर नीचे से मौसी आईं और उन्होंने आवाज़ लगाकर पूछा क्या हुआ दीपू? दीपू रोती हुई ज़ीने से नीचे की तरफ़ भागती हुई आई और बोली, मौसी मम्मी...। मौसी ने नीचे से ही पूछा क्या हुआ मम्मी को। ये कहते हुए वो ज़ीने से ऊपर की तरफ़ भागी और दीपू की मम्मी के पास जाकर खड़ी हो गईं। दीपू भी मौसी का हाथ पकड़कर बोली, मम्मी को पता नहीं क्या हुआ है। मौसी ने देखा तो उसकी मम्मी अभी भी लंबी-लंबी सांसें ले रही थी पर हाथ-पैर ठंडे पड़े थे। आँखें भी ठंडी हो गई थी। मौसी ने ताऊ-ताई को आवाज़ लगाते हुए कहा, जीजी नीचे आओ मंझली जीजी को पता नहीं क्या हुआ। हाथ-पैर ठंडे पड़े हैं, लंबी-लंबी सांसे ले रही है। मम्मी की आवाज़ सुनकर ताऊ-ताई और उनके सभी बच्चे कमरे में आकर खड़े हुए। ताऊ ने मंझली ताई की हालत देखी तो कहने लगे इन्हें अस्पताल ले चलते हैं। इनकी तबीयत बहुत खराब लग रही है।

अभी ये बात चल ही रही थी कि दीपू तेज-तेज रोने लगी। मौसी ने दीपू को अपने सीचने से लगाकर कहा, कुछ नहीं हुआ है अभी ठीक हो जाएगी। इस बीच बड़े ताऊ ने चाचा को फ़ोन करके बताया कि उनकी पत्नी की तबीयत खराब हो गई। चाचा ने कहा मैं तो सुबह ही पहुँच जाऊँगा तब तक आप उन्हें अस्पताल दिखा लो। चाची ने बड़ी ताई जी को कहा, जीजी आप इनके साथ चले जाओ, मैं इन्हें संभाल लूँगी।

ताऊ ज़ीने से उतर कर ऑटो लेने चले गए। घर में सब बच्चे उन्हें देख-देखकर रो रहे थे। मौसी थी कि सबको चुप करा रही थी। ताई मंझली ताई के कपड़े ठीक कर रही थ। धीरे-धीरे मंझली ताई की सांसें लगी। ताई के चेहरे पर घबराहट दिखाई देने लगी। ताई और चाची आपस में धीरे-धीरे बातें कर रही थी अचानक मंझली ताई ने तेज़ की हिचकी ली और आँखें खोली, उनके सांसें रूक गई। बड़ी ताई मंझली ताई के हाथ-पैर तेज़ी से मलने लगी पर हाथ-पैर तो ठंडे हो चुके थे। सांसें भी रूक चुकी थी। ये देखकर मौसी और बड़ी ताई की आँखों से आँसू बहने लगे पर वे बच्चों से यही कह रही थी कि मंझली ताई ठीक है। मौसी और बड़ी ताई ने बच्चों को नीचे के कमरे में भेज दिया। सब बच्चे चुपचाप नीचे चले गए। रात के करीब तीन बज चुके थे। ताऊ जी को भी कोई ऑटो नहीं मिला था। वो भी थकहार कर वापस घर आ गए थे। वो जैसे ही ज़ीने से ऊपर चढ़े बड़ी मौसी जी और ताई ने उन्हें बताया कि मंझली ताई खत्म हो चुकी हैं। ये सुनकर ताऊ जी घबरा गए। उन्होंने ताई और मौसी से कहा जब तक प्रेमपाल गाँव से दिल्ली न पहुँच जाए तब तक किसी को भी मत बताना। जब प्रेमपाल आयेगा तभी हम सबको बतायेंगे। ये कहते हुए वो कमरे में चले गए।

मंझली ताई को पलंग से उठाकर जमीन पर लिटा दिया। हल्दी से उनके चारों तरफ़ लाइन खींच दी। बच्चों को भी ये कहकर सुला दिया कि मम्मी को अस्पताल लेकर गए है, ठीक होकर आ जाएगी।

दीपिका

Thursday, 3 October 2013

हमारे पहली बार के मशहूर पराठें

मेरी  दोनों बड़ी बहनों की शादी हो गई थी। मम्मी नानी कें घर चली गई थी, यानी हम पर निगरानी रखने वाला कोई और हमारी फरमाइशें पूरी करने वाले लोगों में से उस दिन कोई घर पर नहीं था । उस वक्त मैं लगभग चार या पाच साल की थी। सुबह तो खेल कूद मैं कब गुजर गई पता भी नहीं चला लेकिन दोपहर होते होते हमने रसोई का एक एक बर्तन टटोलना शुरू कर दिया। अब पेट में चूहे कूद रहे थे। मुझसे 2 साल बड़ा मेरा भाई कार्तिक भी बार-बार फ्रिज़ से कुछ खाने के लिए  ढूँढ रहा था। लेकिन फ्रिज में भी कुछ नहीं था। बस एक टिफिन में आटा गूंदा हुआ रखा था। हम परेशान हो गए। इतने में हम दोनों से बड़ा भाई अनिकेत भी बाहर से घूम कर आ गया उसे भी भूख लगी थी तभी उदास कार्तिक कुर्सी पर से उछलकर खड़ा हो गया और अनिकेत के कंधे पर हाथ रखकर बोला, "सुन गदरू और अनिकेत भाई मुझे एक मस्त आईडिया आया है। क्यों ना हम पराठे बनाए वैसे भी आटा तो गूदा है ही और मैंने एक बार कन्चन बहन को पराठे बनाते हुए देख था।"
 
कार्तिक के आईडिये ने आनिकेत और मेरे अन्दर जोश जगा दिया और फिर?
 
भूख तो क्या-क्या करने पर मजबूर नहीं कर देती। मैंने झट से फ्रिज खोल कर आटा बाहर निकाला। अनिकेत ने गैस पर तवा चढाया और कार्तिक ने लपक कर कुलर बन्द कर दिया। अब हम तीनों ने फटाफट अपनी जिम्मेदारी बांट ली। अनिकेत लोई बनाएगा। मैं पराठा बैलूगी। और कार्तिक घी लगाकर उसे सेकेगा।
 
योजना के मुताबिक हम तीनों ने कमर कस ली। अनिकेत ने अपने स्टाईल में लोई शुरू कर दि और मैं उस लोई को पूरी मेहनत के साथ बेलने लगी। वह कभी लम्बी हो जाती तो कभी चोकोर पर कम्बख्त गोल नहीं  होती। हमने बहुत कोशिश की और आखिरकार मैं कुछ हद तक गोल पराठा बेल पाई। अब बारी कार्तिक की थी। उसने पहले से ही तवे पर घी डाल दिया था और जब तक पराठा उसके पास पहुंचा तब तक घी काफी गरम हो चुका था। कार्तिक बड़े ही सलिखे से हथेलियों पर को नचाता हुआ खड़स हुआ और पूरी ताकत से पराठे को खोलते हुए तवे पर दे मारा और कूद कर पंलग पर चढ गया। पराठा जैसे ही तवे पर गिरा छुन सी आवाज के साथ सारा घी मेरे घुटनों पर और अनिकेत के हाथों पर आया। हम दोनों तेजी से चीखकर पीछे के तरफ खिसक गए। पूरे कमरे में तेल की घसक और घूआ फैल गया। थोडी देर के लिए तो लगा। सब एक सपना है पर फिर मेरी सिसकियां सुनाई दी और अनिकेत का चेहरा पीला पड़ गया। मानो उसे कुछ नहीं सुझा रहा था। जले पर पानी डालने वाली कहावत थोड़ी-थोड़ी याद आई तो वह जनाब उठा आधी बालटी भर कर पानी मुझपर उढेल दिया। मैं कपड़ों समेत पूरी गिली हो गई। इससे पहले कुछ समझ पाती। उसने मुझे प्यार से सहलाना शुरू कर दिया और बोला, "कुछ नहीं हुआ चुप हो जा। सब ठीक हो जाएगा।" कहकर उसने मुझे तैयार करना शुरू का दिया शायद उसे डर था कि मम्मी मेरी चोट देखेगी तो उसे बहुत डांट पड़ेगी इसलिए जब तक शाम के साढे चार भी बज गये थे और मम्मी का घर आना हुआ। उसने मुझे बिलकुल साफ और सुन्दर बनाकर चुपचाप बैठा दिया। मम्मी ने सबसे पहले मुझे देखा और फिर बाद में पूरे घर को। उन्हे पूरा घर साफ दिखा। वो हमें मुस्कुराता देख थोड़ा रूकी और फिर शक़ के कारण किचन में गई। वहां पर तो सारा उन्हे एक ही नज़र में मालुम पड़ने ही वाला था। तभी हमने सबसे पहले अपनी भूख की कहानी मम्मी को सुनाई और फिर बाद में सारे घर वाले यह पुरी कहानी सुनकर खुब हॅसे और हमारे पराठों की चर्चा सभी पर छाई रही।
 
रितिका