Tuesday, 9 July 2013

उनका बार-बार आना

"अरे बेटा, ऐसे ही बोलते है ये! इन्हें कुछ याद नहीं।" कहते हुए अपने दोनों हाथों से साड़ी के पल्लू को उठा सर पर रखती हुई वह बाबा की ओर निहारने लगी। जिनकी मोटी-मोटी आंखें और सिकुड़ती हुई सी सफेद भौंहे बिल्कुल स्थिर सी बस सामने ही उस हरी सी दीवार को देखे जा रही थी जिस पर पड़े ढेरों निशान और मटमैला सा रंग शायद उन्हें अपने और उनके सफ़र का अहसास करवा रहा था । फूले हुए होंठों के ऊपर से गुजरती सफेद मूंछे अपने अंदरुनी गुस्से को और तेजी से बयां कर रही थी जिसके साथ दिखाई पड़ता वो फूला हुआ चेहरा जो न जाने उनके गुस्से का कारण था या फिर अपनी खुद की उस तन्हाई का जिसे मैं पूरी तरह से तन्हा तो नहीं कह सकती क्योंकि उनकी उस तन्हाई में उनकी हमनवां भी शामिल है पर फिर भी इस दरमियां रिश्ते के बीच कुछ खामोशी है जिसे ये लफ़्ज बयां कर रहे थे। कोई मेरे पास नहीं बैठता, "क्यों मैं क्या अब इतना बुरा हो गया हूं जो मेरे ही बच्चों को मेरे पास आने से शर्म आने लगी है?”

"पूछो तो जरा इनसे क्या कमी है मुझमें?” एक ही सांस में बोलते हुए उनका पूरा शरीर  हिल गया और हाथों में थमी लाठी को पैरों के बीच टिकाते हुए वह दोबारा से बोल उठे, "बड़ी मुश्किल से ढूंढ़ा था इन्हें मैंने। मुझे गांव छोड़कर आ गए थे ये। दोपहर का वक्त था। मैं अपने घर के बाहर चारपाई डाले लेटा हुआ था। लेटे-लेटे आंख ऐसी लगी कि एक बजे का सोया हुआ सात बजे सोकर उठा। सीधा इन्हें आवाज़ मारी।"

चारपाई के बगल में सिकुड़कर बैठी हुई अपने हमराही की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, "पर उस पल इनकी भी आवाज़ न आई। यह माहौल देख मैं थोड़ा घबरा गया क्योंकि अक्सर मेरे आवाज़ न मारते ही ये तुरंत ही निकलकर आ जाया करती थी पर उस दिन इनकी आवाज़ आई और न ही मेरे दोनों बड़े बेटे व बहु दिखाई दिए। खड़ा होता हुआ मैं पूरे कमरे में घूम आया पर कहीं पर भी कोई नहीं था। पता है क्यों?”

आंखों को घुमाते हुए मेरी ओर देखकर वो कुछ पल शांत हो गए। शायद इसलिए कि वो मेरे बोलने का इंतज़ार कर रहे थे। उनकी विनम्रमा सी आंखें मुझे ही ताड़ने लगी थी पर मैं तो खामोश सी बैठी हुई कुछ अजीब से ही ख्यालों में जी रही थी लेकिन उनका मेरी ओर ही देखे जाना मुझे अहसास करवा रहा था कि वह अब मुझसे सुनना चाहते है पर बातचीत नहीं सवाल!

‘क्यों’ जिज्ञासा को जगाते हुए मैंने पूछा।

"ये सारे मुझे गांव में अकेला छोड़कर दिल्ली भाग आए थे। दुःख इस बात का नहीं है कि ये क्यों आए, दुःख तो इस बात का है कि इन्होंने मुझे क्यों नहीं बताया।"

"अरे बेटी, इनकी यादस्त चली गई है। भूल गए है ये सब कुछ, हम तो चाली साल से यहां रह रहे है। भला इन्हें छोड़कर कहां जायेंगे। सब बीमारी का असर है, ये!” पीछे से बुड़बुड़ाती हुई अम्मा, उनकी हर एक बात के आगे अपनी ज़बान खोल बैठती। आंखों को मिचती हुई घुटनों पर हाथ टिकाए वो हर बार उनकी बीमारी का इज़हार किए जा रही थी। जैसे ही मेरा सवाल उन तक पहुंचता वैसे ही वो मेरे बतौर उन्हें समझाने लगती- "पूछ रही है कब आए थे, तुम यहां?”

उन्हें बोलने के लिए लगातार निहारे जा रही थी। चश्मे के अंदर से झांकती छोटी-छोटी आंखों को कभी मेरी ओर मटका कर अपनी ताकत का अहसास करवाती, तो कभी हाथों का चलता इशारा उन्हें अपने हमसफ़र को उनकी यादों में ढकेलने पर मजबूर कर देता।

"अभी बताया तो था 50 साल की उम्र में आया था मैं यहां! वो भी अपने इस परिवार की खोज में। धोखा दिया था इन्होंने मुझे, वो तो ईष्वर की कृपा है जो मैं यहां चला आया। प्रेम है मुझे अपने इस परिवार से, पर अब किसी को मेरी परवाह नहीं। कोई नहीं बैठता मेरे पास!”

हर पल उठता उनका ये सवाल मुझे खामोशी में डूबोता जा रहा था। मेरे खुद के लिए ये समझना मुश्किल था कि मैं उन्हें क्या जवाब दूं जहां ये पेचीदा सवाल मेरी चुप्पी बन गया था। वहीं बाबा की कुर्सी के साथ टेक लगाए बैठी अम्मा आंखों को झुकाती हुई सर पर हाथ टिकाए उनके बोलने के साथ खुद खामोशी में डूबने लगी थी।

उनका बोलना शायद अम्मा के लिए बेहद आरामदायक था क्योंकि अक्सर अपने इन हमसफ़र की खामोशी उन्हें बेहर परेशान करती है। वो नहीं चाहती कि बाबा खामोश, बिल्कुल चुप रहे। हमारे बीच पनपती खामोशी से पहले ही वह उसे तोड़ चुकी थी।

"बेटी किताब भी लिखी है इन्होंने। पूछो इनसे।" अचानक से मुझे छूते उनके इस सवाल ने मेरी जिज्ञासा को बढ़ा दिया।

"किताब... कौन सी?” आश्चर्य के साथ कहते हुए मैं बाबा की ओर निहारने लगी। मेरी ललक को देख शायद वो ही नहीं अंदर किचन में काम कर रही हेमा दीदी भी उत्तेजना से भर चुकी थी। दरअसल हेमा कोई और नहीं उनकी सबसे बड़ी पोती है, जो अपने काम को छोड़ मुस्कुराती हुई अंदर से बाहर निकली और मेरे हाथ में एक लाल रंग की किताब थमाते हुए बोली, "ये हमारे दादा की है।"

"अच्छा" कहते हुए मैंने बड़ी हैरानी के साथ उस क्रीम कलर की किताब की ओर देखा जिसमें ऊपर नीले रंग से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था ‘कुषवाहा वंश परिचय’ और बीच में बना राम-लक्ष्मण व घोड़े का चित्र जिसे देखकर तो लग रहा था कि जरूर इसमें रामायण की गाथा होगी। ये सोचते हुए पलकें झपकी तो और गहरे अक्षरों में लिखा हुआ पाया ‘राधे श्याम कुषवाहा’ यानी उनका नाम। यह सब पढ़कर मैं बड़ी हैरानी के साथ उस किताब को ही देखे जा रही थी जिसे लिखने वाला मेरे सामने ही है। ये सोचकर मेरे लिए अपने कानों पर विश्वास करना थोड़ा ही नहीं काफी मुश्किल था!

आरती

Wednesday, 19 December 2012

दक्षिणपुरी में एक महफिल


अनुभवी लोगों के संवाद के बाद में ये पहला दिन था।

यादें, सपने, आसपास, माहौल, फैसले, कारण, कामयाबी, सफ़र, शादी, परिवार, स्कूल, बचपन, जवानी, काम, पैसा, किराया, फिल्म, नाटक, टीवी, पर्दा, दिनचर्या, दिलचस्पी, हिदायतें, रविये, कल्पनाएं, लड़ाईयां, झगड़े, घटनायें, किताबें, डर, चेतावनियां, चोरियां, छतें, रातें, सरकारी लाइनें, काल्पनिक दीवारें, अपने मन मुताबिक बर्तन, अपनी पसंद के जूते और बेकर चीज़ों से औजार बनाना जो शायद उनके खेलने के काम में आये लेकिन लोगों से बातचीत करने के बाद में सभी एक बार फिर से किताब के अनेकों किरदारों के बारे में बोल रही थी।

वे किरदार जो कभी वे खुद ही थी। जीवन के अनेकों पल जो कहीं छिटक गये थे उन्हे पकड़कर लाना इतना आसान नहीं होता लेकिन याद रखने से ज्यादा मिठा सफ़र याद करने का होता है। जो यहां पर था।

दक्षिणपुरी की सारी दादियां जो अपने अनुभवों के किस्सों को इस तरह से सुनाती आई हैं कि वे उनके बारे में नहीं है वे तो वो किरदार हैं जो कहीं थे ही नहीं। फिल्म देखना, छुपना, निजी फैसले लेना सब किसी और पर डालकर सुनाना जीवन के याद करने के सफ़र को और मिठा बना देता है।

आज उसी सफ़र पर उतरने का दिन था।  

पिंकी 

तनहा सी लाइब्रेरी

कुछ कहने की कोशिश में उस दिन आधा वक्त गुज़ार दिया था लेकिन पता था कि सवाल निहत्थे ही लौट जाएंगे, इसलिए खामोश रही। पुरानी फटी जिल्द वाली किताबों के ढेर में से उठाकर एक उन्होंने मुझे भी दे दी, फिर रजिस्टर के पन्ने पर मेरा नाम लिखा और कहा, ‘दो हफ्ते बाद लौटा देना।’ उसके बाद वो उचकी हुई पलकें वापस चश्मे की तरफ़ झुक गई और सुस्त अलमारियों में रखी उन गुमसुम सी किताबों पर मेरी नज़र घूम गई, जो शीशे के उस पास से झाँकती हुई ऐसी लग रही थी मानो कार के बंद शीशों में कैद एक चेहरा, जो अपनी आवाज़ होते हुए भी बाहर वाले को सुनाई नहीं देता। अलमारी से नज़र फिसली तो हाथ में किताब को लिए मैं उस कमरे से बाहर चली आई जिसे स्कूल की लाइब्रेरी कहते हैं। बाहर चौखट में लगी जूतों की कतार में से अपने जूते पहचानने लगी। जूते पहनने के लिए झुकी तो वो मरियल सी किताब हाथ से छूटकर नीचे गिर गई। बस तभी उसके चेहरे पर नज़र पड़ी थी। किताब का नाम था ‘अंतरिक्श की सैर।’ काले बैकग्राउंड वाले उसके गत्ते पर पृथ्वी, चाँद और न जाने कितने ही उपग्रह बने हुए थे। उस वक्त आकाशगंगा में जाने का मन नहीं था। बस फिर क्या था क्लास में जाते ही उसे बस्ते की जेब के हवाले कर दिया।

दो हफ्ते तक मानो वो किताब उस जेब में एक नए अंतरिक्श की सैर करती रही और ठीक दो हफ्ते बाद अपने ठिकाने पर पहुँच गई यानी मैडम के पास, उनकी उसी अलमारी में। वो दिन था जब मैंने लाइब्रेरी का एक नया मतलब जाना था। एक ऐसी लाइब्रेरी जहां न तो पाठक अपने लिए किताबें चुनता है, न ही किताबें अपने पाठक चुनती हैं, लेकिन फिर भी कोई है जो इस लेन-देन को लाइब्रेरी की इस पहचान को कायम रखता है। वो याद, वो सवाल आज मन में फिर से ताज़ा हो गए थे क्योंकि संगीता मैडम हिंदी की कविताएँ ढूंढ़ने के लिए काफी बेताब थीं।

‘‘चलो लाइब्रेरी चलकर देखते हैं, शायद कुछ मिल जाए।’’ एक लम्बी गुफ्तगूं के बाद अपनी कुर्सी से उठते हुए उन्होंने कहा और कमरे से बाहर निकली। उनकी थकी हुई आँखों में शायद ही कोई दिलचस्पी थी लेकिन कदमों की तेज़ी देखकर लग रहा था कि वह ठान चुकी हैं, आज तो वहीं से कुछ खोज निकालेंगी। स्कूल के उस अंधेर गलियारे में, मैं उनके पीछे-पीछे चल दी थी। वो अपनी कश्मकश में खोई ज़बान पर कुछ कवियों के नाम दोहराती जा रही थीं। तभी पीछे मुड़कर बोली, ‘‘इस बार कॉम्पीटिशन में तुझे ही फर्स्ट आना है, ठीक है।’’ पता नहीं ये सवाल था या फरमान। पर मैं कहीं ओर थी इसलिए ‘हाँ’ में गर्दन हिला दी। ख्याल ज़ेहन में लगातार अपनी दौड़ लगा रहे थे। लाइब्रेरी को लेकर सालों पहले ही अपनी सोच में एक खाका बुन चुकी थी मैं, लेकिन फिर भी लग रहा था कि शीशे की अलमारियों से झाँकती वो किताबें आज तो खुद को रोक नहीं पाएंगी। आखिर प्रेमचंद, अज्ञेय और यशपाल कब तक अपनी रचनाओं को बोलने से रोकेंगे, हम तो बाहर से ही देख-देखकर हैरान हुए जाते थे।

अरे देख कितनी मोटी है, वो चुटकुलो वाली। उसमें जीवनी है, वो कविताओं से भरी। यूं तो मैडम रोज कहतीं कि किताबें तुम्हारी दोस्त हैं, उनमें ज्ञान का अथाह सागर है लेकिन लाइब्रेरी की किताबों के करीब जाते ही न जाने कहाँ से अनुशासन और सीमाएँ बीच में आ जाती हैं। छोड़ने, बिगाड़ने, उठाने-धरने और पलटने वाले हाथों से परे हमेशा एक तन्हाई में जीती है। वक्त-बेवक्त उनके करीब जाना उन्हें छेड़ना-उठाना वर्जित है, ऐसा स्कूल कहता है लेकिन आज शायद ये पाबंदी टूट जाए। आज तो उन्हें छेड़े बिना काम बनेगा ही नहीं। सोच अचानक थम गई जब आगे चलती हुई मैडम ने कहा, ‘‘बेटा तुम यहीं रूको, मैं लाइब्रेरी की चाबी लेकर आती हूँ!’’ अपना थैला व रजिस्टर मुझे थमा दिया। दरवाज़े पर एक बड़ा सा ताला था जिसे खोल अंदर जाने के लिए दिल बेकरार था। खिड़की से आती हवा के झोंके फर्श की बारीक धूल को उड़ा रहे थे और अंधेर भरी गैलरी में आती थोड़ी बहुत रोशनी के साथ धूल के वो कण खिड़की से आर-पार जा रहे थे मानो उनसे भी ये सन्नाटा बर्दाशत न हो रहा हो। तभी चाबी के गुच्छे में से लाइब्रेरी की चाबी ढूंढ़ते हुए मैडम आ गई और ध्यान से देखने पर एक गोल सिरे वाली छोटी चाबी निकालकर ताले में घुमाने लगी। ताला खट से खुल कर एक तरफ़ झुक गया। मैडम ने दरवाजा खोला और कहा, ‘‘आ जा ढूंढ़ते हैं।’’ दरवाज़ा खुलते ही एक सीलन भरी सोंधी सी खुशबू चारों तरफ़ फैल गई। ठीक वैसी जैसी रद्दी के ढेर में पड़े अखबारों से आती है। अलमारी के शीशों पर जमीं धूल की परत ने मानो खुद को हटाने का इशारा किया और कुर्ते की बाजू, कोहनी तक चढ़ाकर मैडम ने हथेली बचाते हुए उंगलियों की किनारी से दरवाजा खोल दिया। इस आवाज़ से जैसे अंदर कतार में लगी किताबें काँप उठी और थोड़ा सा हिलकर फिर एक-दूसरे पर झुक गई। मैडम ने उन्हें उलट-पुलट कर देखा और रखना शुरू कर दिया। मैं दूर खड़ी इस नज़ारें को देखती रही। दिल चाह रहा था काश मैडम मुझे भी इस काम में लगा लें। अपने चारों तरफ़ की इस दुनिया में न जाने क्यों आज सभी चीज़ें ताज़ातरीन लग रहीं थी।

अचानक मैडम पलटी और बोली, ‘‘अरे तू, ऐसे क्यों खड़ी है। चल मेरी मदद करवा! देख उन अलमारियों में कौन सी किताबें हैं। किसी में कविताएं मिले तो अलग रख लेना।’’ सुनकर मेरे स्थिर कदम अपनी जगह से हिले और मैं सामने अलमारी की तरफ़ दौड़ पड़ी। मेरे बेताबी मेरे मचलते हाथ साफ बयां कर रहे थे। मैंने तेजी से किताबें उठाना और देखना शुरू कर दिया। कुछ मोटी, कुछ पतली, कुछ छोटी, कुछ बड़ी हर तरह की किताबें एक साथ एक भीड़ में कंधे से कंधा मिलाए खड़ी थी। तभी एक मोटी, सफेद किताब पर नज़र पड़ी, नाम था - राश्ट्रीय गीत। अंदर बहुत सारी ओज रस और वीर रस वाली कविताएँ थीं, उन्हें उठाकर साइड में रख दिया। पीछे मैडम भी अपनी धुन में मस्त थी। चुन्नी को कुर्सी पर रख वो सारी अलमारियों के दरवाजे खोलते हुए बोली, ‘‘उफ... ये वीरा मैडम ने क्या कर रखा है! कितनी धूल है।’’ उनकी आवाज़ खरखराने लगी और फिर आँखें मलते हुए पीछे हट वो जोर-जोर से खाँसने लगीं। उसके बाद कुछ पलों के लिए लाइब्रेरी फिर से खामोश हो गई। सब कुछ अपनी रफ्तार से चल रहा था। लाइब्रेरी के साथ किताबों का इतना बड़ा खजाना है आज पहली बार महसूस हो रहा था वरना लाइब्रेरी का पीरियड बस जूते उतारने और उन्हें पहनकर वापस क्लास में आ जाने का समय लगता था। जो शायद क्लास की गिरफ्त से निकलने का एक अच्छा मौक़ा हुआ करता था। सोचते-सोचते हाथ अचानक रुक गए, जब दहलीज़ पर किसी के आने की आहट महसूस हुई। अचानक कोई पीछे से चिल्लाया, ‘ये क्या हो रहा है! कितने बोला अलमारी खोलने को!’’ सुनकर दिल धक सा रह गया। देखा तो पीछे लाइब्रेरी की मैडम वीरा बजाज खड़ी थी। उनकी चढ़ी हुई भौंहे, चेहरे पर गुस्सा था। मैं समझ नहीं पाई की क्या कहूं। सामने खड़ी संगीता मैडम की तरफ़ देखने लगी। वीरा मैडम मुझसे पलटकर संगीता मैडम की तरफ़ घूमी। मैडक के चेहरे पर फीकी सी मुस्कान थी। वीरा मैडम ने उन्हें देखा और कहा, ‘‘ये क्या संगीता, बच्चों को क्यों किताबें छेड़ने देती हो। इनका क्या भरोसा, कुछ गायब हो गया तो जवाब हमें देना पड़ता है। इन अल्फ़ाज़ों को सुनकर मेरी आवाज़ जैसे गायब हो गई, नज़रें फर्श के कालीन पर झुक गई और लगा जैसे अपना कहकर आज स्कूल ने फिर से ज़लील कर दिया है।

मैं अपने आपमें खोई कमरे से बाहर चली आई और क्लास की तरफ़ बढ़ने लगी। सवालों का वो कारवां फिर से अपने सफ़र पर चल पड़ा जो अपने जवाब आज तक नहीं ढूंढ़ पाया था। तभी पीछे से आती कांता मैडम की आवाज़ ने मेरे कदमों को रोक दिया। वो मुस्कुराती हुई मेरे करीब आई और पर्स में से नीली चाबी निकाल मेरे हाथ में थमाते हुए ‘‘लो बेटा मेरा सामान ऊपर स्टाफ रूम में मेरे लॉकर में रख आओ।’’ कहते हुए आगे बढ़ गई। मैं एक अजीब सी दुनिया में खोई वहीं खड़ी उन्हें देखती रही।

टीना

Thursday, 10 November 2011

आ भी जा....आ भी जा....ए सुबह आ भी जा.....

मैंने धीमें से तिरपाल उठाई, घना अंधेरा देखकर मैं डर गई। ऐसा लगा कि जैसे इस घने अंधेरे में कोई घूम रहा हो। हांलाकि तिरपाल यूहीं की युहीं झुकी हुई थी जैसे मैं रोज़ उसे देखती थी। बम्बुओं से बंधी हुई। रेलिंग से जकड़ी हुई। और किनारों से खुली।

वो अंधेरा कुछ ऐसा था कि मैं सकपका सी गई। मैंने मिचमिचाती आँखों से चारों ओर नज़रे दौड़ाई पर हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा कोहरे की तरह चमक रहा था। मेरे और अंधेरे के बीच कोई भी तीसरा दिखाई नही पड़ रहा था। घर परिवार से लेकर महौल्ले तक के सभी लोग घोड़े बेच कर सो रहे थे। हर तरफ मटकती मेरी निगाहें अंधेरे भरे इस मंज़र को निहार रही थी। जिस में पल-पल किसी के आने की आहट मुझे महसूस हो रही थी। कभी छम्म-छम्म तो कभी खन्न-खन्न या कभी किसी के पीछे से आने का भय। ये तरह-तरह के मन में उठते डर मुझे अंधविश्वास की दुनिया में ढकेलते जा रहे थे। तकिए पर सिर लगाए लेटी मैं परिवार के बीच होते हुए भी आज बहुत अकेली थी।

पूरा पार्क अंधेरे की लपटों में इस तरह सिमटा हुआ था कि गली में जलते बल्ब की रौशनी भी उसके आगे फीकी पड़ चुकी थी। हर तरफ बुरी तरह से सन्नाटा छाया हुआ था। यहाँ तक की रोज़ाना पार्क में मंडराने वाले कुत्ते भी न जाने आज कौन सी दिहाड़ी पर गए हुए थे। बस पूरी गली से लेकर पूरे पार्क तक कोई दिखाई पड़ रहा था तो सिर्फ मेरा परिवार। वो भी पार्क के कोने में अपना आसरा बनाए लकड़ी की बिछी चार टेबलों पर फैला हुआ एक तरह से डैड बॉडी ही था।

जैसे ही पेड़ का कोई पत्ता भी हिलता तभी मै धक सी रह जाती ऐसा लगता कि मानो कोई दबे कदमों से मेरे पास आता जा रहा है ऐसा अहसास होने पर मेरी गर्दन नज़रो के साथ-साथ दाएँ-बाएँ उपर-नीचे हर दिशा में घूम जाती। समझ नही आ रहा था कि मै इस तन्हाई भरी रात को कैसे गुजारुं?

आँखों में नींद नही आ रही थी पता नही इस अंधेरी रात में कौन-कौन से किस्से मेरी आँखों के सामने उभर आए थे। वो भी इतने डरावने की जिनके बारे में सोचते हुए भी शरीर में झुरझुरी सी उठने लगी थी। ऐसा लग रहा था कि कहीं वो मेरे सामने ही न आ जाए? एक से बढ़कर एक, जिन्हें पहले कभी क्लास में दोस्तो के बीच बैठ कर एक गोल दायरा बनाकर हम सभी बड़े मज़े से ठहाका
लगा कर सुना करते थे। पर अब वही मेरा जीना हराम कर रहे थे। इधर-उधर अपने ध्यान को भटकाते हुए मैं उन्हें भूलाना चाहा रही थी पर तब भी वो बारम्बार किसी फ्रेम की तरह मेरी आँखों के आगे आते जा रहे थे।

दिल में उभरने वाला हर एक अहसास दिल को दहला-देने वाला था जी तो कर रहा था कि पापा को ही झंझोड़ दूँ, पर क्या कहूँगीं? ये सोचकर मैं शांत हो जाती।

परिवार के हर शख्स को मैं बड़ी उम्मीद के साथ देख रही थी कि कहीं कोई जाग जाए। पर सबके खर्राटे ही कानों से टकरा रहे थे। जो डर को और बड़ा देने वाले थे यहाँ तक की किसी का साथ मिल जाने का लालच लिए नज़रें सिर्फ परिवार पर ही नही बल्कि सामने की उस सड़क पर भी टिकी थीं जहाँ से मैं किसी आते-जाते राहगीर को ही अपना हौंसला बना सकूँ। पर आज कोई राहगीर भी तो नही गुज़र रहा था। रात से ज्यादा अब सुबह अच्छी लगने लगी थी। जिसका मुझे अब बेसब्री से इंतज़ार था।

आरती
 

Monday, 7 November 2011

बचपन की कल्पनाओं का शहर



कल्पनाएँ हवाओं मे झूलती हैं, तैरती है, दुनिया के समंदर मे गोते लगाती है, सच और झूठ के बीच मे झूमती हैं।
कल्पनाएँ जो उम्र के बंधनों से होती हैं।

ये शहर किसने बनाया है से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इन मासूम कल्पनाओं में ये शहर कहां से आया है?

यशोदा

Thursday, 3 November 2011

सुर्खियों में बटा लीलू


हाल ही में पेपरों के चलते हम सभी दोस्त एक साथ स्कूल जाते थे। पेन्ट की जेब में पैन रख और एक गत्ता पेन्ट की लुप्पी में टांग हम सभी दोस्त टशन से निकलते। क्लास में भी एक साथ बैठते। पूरी क्लास में मैं, अतुल, लीलू और विक्की सबसे शरारती हैं। जब चाहा किसी के पास बैठ उस पर कई तरह की छाप मारते और उन्हें किलसा देते। हमें अगर कहीं चॉक पड़ी मिलती तो हम सभी ब्लैक बॉर्ड, दिवारों पर अपना-अपना नाम लिख देते।


एक बार हम सभी दोस्त काफी देर से पहुंचे। अफरा-तफरी में कहीं और नज़रें घुमाए बिना पेपर की सीट पर निगाहें गड़ाये बैठे रहे। पैन चलता रहा और नज़रें किसी और की सीट पर टिकी रही। पी एन गुप्ता के आने का इंतज़ार अब खत्म हो रहा था वे हमारे समाजिक के सर हैं। अब किसी को फिक्र नही थी उनके आने की क्योंकि पास होने तक के नम्बरों तक का पेपर ज्यादातर सभी साथी कर चुके थे।

हम सभी यारो की टोली बन बैठे सभी को चिड़ाने का जरिया। आज तक की मशहूर फिल्म गदर जिसके डायलॉग मन को भावुक कर देते है मगर हम कहाँ ऐसे दर्शक हैं, जो किसी फिल्म को फिल्म की तरह देखें? उस फिल्म के डायलॉगों को अपनी हॅंसी-ठिठोली में शामिल कर सबको हंसने का मस्त मौका दे रहे थे। उस फिल्म के किरदारों को अपने बाकि दोस्तों को बना उन्हें हंसाने के लिए उन डायलॉगों को अपनी अदा से सबके सामने अभिनय कर रहे थे। क्या पता ये मस्ती हमें दोस्तो कि यादों में हमेशा के लिये कैद कर दे?

देर तक हम यूहीं मज़ाकिया दौर में हंसतें खिलखिलाते रहे उसी समय नज़रे दिवार पर जा भिड़ी और देखा कि बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था 'आई लव ज्योति' सभी ने उसे देखा और पढ़ा और आगे बढ़ गए। पर मेरा दोस्त लीलू तो जैसे चौंक ही गया। उसे ऐसा देख सभी उसकी मज़ाक उड़ाने लगे। वह कसमें खाने लगा। "माँ कसम मैनें नहीं लिखा" उसके चेहरे से पसीने छूट रहे थे। बस चन्द सैकेन्ड बचे थे वो रोने ही वाला था। कहीं सर न देख लें। यही सोच मैं उठा और कागज़ से उस नाम को पोंछने लगा। हम सभी ने उसे विश्वास दिलाया कि कोई भी सर को नहीं बताएगा। वो थोड़ा शांत तो हुआ मगर उसे हमारे ऊपर भरोसा नही था। हम अपना एक पीरियड छोड़ उसे लेकर बाहर आए और स्कूल के बाहर बनी दिवार पर बैठ कर उस बात को छोड़ उससे पेपरो के बारे में बात करने लगे। कल कौन सा पेपर है? कल तो जल्दी ही आना है इन्हीं बातों के चलते अतुल ने लीलू के कंधे पर हाथ रख कर कहा, 

"भाई कब मिलवाएगा? कहाँ रहती है?”

ये बात सुनकर तो लीलू का गुस्सा मानो इतना भड़क चुका था कि अतुल की तो हवाईया गुल हो गईं। इसी बहस बाजी के दौरान अतुल और लीलू की लड़ाई हो गई। हम सभी इस लड़ाई को हंसी-मज़ाक में ले रहे थे। अगले दिन जब लीलू स्कूल पहुंचा तो क्लास में घुसते ही चौंक गया। चारों तरफ उसकी नज़रें घूम रही थीं।

दिवारों, दरवाज़ों, ब्लैक बॉर्ड पर 'आई लव ज्योति' लिखा था। ये देख तो लीलू की आँखों में खून उतर आया। वह हर जगह अतुल को तलाशने लगा। सभी उस नाम की परछांई को प्यार का नाम देने लगे।

आज सभी टीचरों के डांटने फटकारने का विषय लीलू था। बाकी साथियों के बतियाने का विषय भी यही था। कोई समझ नही पा रहा था कि ये हो क्या रहा है? आज स्कूल कि चर्चा लीलू के साथ शुरू हुई और खत्म भी शायद इसी पर होने वाली थी। हल्ला स्कूल की दिवारों से गुंजता हुआ बाहर की दुनिया तक जा रहा था। 'आई लव ज्योति-आई लव ज्योति'
जिस नाम को सुनने का दुख लीलू को था उस रूह को देखने कि चाहत सभी को थी। आखिर ये ज्योति कौन है?

इन्हीं सवालों का जवाब पाने के लिए लीलू को ढूढा गया। क्लासों में, स्कूल की छतो पर, यहाँ तक की बाथरूम में भी, मगर लीलू नहीं मिला। सबकी तलाश पाँचवे पीरिडय तक आते-आते खत्म होने लगी थी उसके बाद सभी ने अपना रूख अपनी-अपनी क्लासों की तरफ कर लिया। टीचरों के होते हुए भी सभी लीलू को याद कर उसका मज़ाक उड़ा रहे थे। सभी का समय उसी की चर्चा करते हुए हंसी-ठिठोली मे बित रहा था।

लीलू की खबर किसी को नहीं थी। उसका बैग भी क्लास मे उसकी सीट पर पड़ा हुआ था। मैनें बैग उठाकर अपने कन्धे पर टांगा और चल दिया लीलू के घर की तरफ।

अगले दिन जब मैं स्कूल पहुंचा तो देखा गोल दायरा बनाए खड़ी लड़को की भीड़, मेरे कदम तो ठहर नही पाए मैं फटाक से उस भीड़ में शामील हुआ।

ये देखते ही चौक गया की अतुल और लीलू की धूआंधार लड़ाई हो रही थी। सभी उस लड़ाई का लुफ्त उठा रहे थे। चारों तरफ उड़ती मिटटी बस यही गुहार लगा रहीं थी-

"कौन है वो?"
"कहाँ रहती है?"
"हमें नही मिलवाएगा क्या?”

अनिकेत

Monday, 3 October 2011

आओ, पूरी खाली है



कन्डेक्टर, "मेडम आगे खिसको।"

मेडम, “अरे भइया आगे कहां खिसकूँ।"

कन्डेक्टर, “अरे आगे पूरी खाली पड़ी है।"

अंदर से कई आवाजें, “अरे भइया कहां खाली पड़ी है। तूझे बड़ा दिख रहा है।"

कन्डेक्टर बाहर आवाज़ लगाते हुए, “मूलचंद...मूलचंद, पुष्पाभवन, शेखसराय, चिरागदिल्ली, अर्चना.... बैठो, बैठो, खाली है.... खाली है।"

अंदर से, “अब क्या सिर पर बिठायेगा भइया, भर तो गई।"

कन्डेक्टर, “अरी अम्मा खाली ले जाऊं क्या गाड़ी।"

अम्मा, “भइया क्यों यहां धूप मे परेशान कर रहे हो। एक तो इतनी गर्मी पड़ रही है। इस बार तो बारिश भी नहीं हुई।

एक आवाज़, “हां पिछली बार तो इतनी हुई थी के जल्दी सर्दी आ गई थी। इस बार तो बिलकुल भी नहीं पड़ी। राम जी भी खाम्खा मे दुख देते हैं।"

कन्डेक्टर सवारी अंदर करते हुए, “ओ भइया पैर अंदर करले, कोने से पकड़ों, चल भइया अंदर को खिसक जा।"

पहले से खड़ी सवारी, “अरे भइया इसमे कहां जगह है, अब बता कहां जायेगा।"

कन्डेक्टर, “चल भइया, यहीं खड़ा हो गया तू तो। अंदर को चल।"

अभी चड़ी सवारी, “यार, कहां को चलूं, नीचे पैर रखने की जगह नहीं है।"

अंदर वाले, “अरे यार, तू उसकी क्यों सुन रहा है। इनका तो रोज का काम है ये करने का, जब तूझे दिखे जगह तब अंदर घूस। नहीं तो यहीं खड़ा रहे।"

एक औरत, “ओ भइया मुंह पीछे को करके खड़ा हो।"

आदमी, “कहां मुंह घर पर रख आऊं।"

औरत, “अरे भइया अक्कड़ क्यों बोल रहा है।"

आदमी, “आप बात ही ऐसी कर रही है। अब बताओं मैं मुंह कहां पर करूँ। यहां पर सांस लेने की जगह नहीं है।"

औरत, “तो भइया रात की चड़ी हम पर उतारेगा क्या?”

आदमी, “तुम ही तो मिलों हो जो तुम पर उताऊंगा।"

औरत, “ज्यादा मत बोल।"

आदमी, "क्या कर लोगी आप?”

अंदर से बाकी, “अरे भइया छोड़ यार, क्यों गर्मी मे गरम हो रहे हो"

आदमी, “अरे तो यार देखों, किस तरह बात कर रही है ये।"

औरत, “किस तरह बात कर रही हूँ।"

बाहर कन्डेक्टर, “भीगे होंठ तेरे, प्यासा दिल मेरा। आओं - मूलचंद मूलचंद – चल उस्ताद।

यशोदा