Thursday, 10 November 2011

आ भी जा....आ भी जा....ए सुबह आ भी जा.....

मैंने धीमें से तिरपाल उठाई, घना अंधेरा देखकर मैं डर गई। ऐसा लगा कि जैसे इस घने अंधेरे में कोई घूम रहा हो। हांलाकि तिरपाल यूहीं की युहीं झुकी हुई थी जैसे मैं रोज़ उसे देखती थी। बम्बुओं से बंधी हुई। रेलिंग से जकड़ी हुई। और किनारों से खुली।

वो अंधेरा कुछ ऐसा था कि मैं सकपका सी गई। मैंने मिचमिचाती आँखों से चारों ओर नज़रे दौड़ाई पर हर तरफ अंधेरा ही अंधेरा कोहरे की तरह चमक रहा था। मेरे और अंधेरे के बीच कोई भी तीसरा दिखाई नही पड़ रहा था। घर परिवार से लेकर महौल्ले तक के सभी लोग घोड़े बेच कर सो रहे थे। हर तरफ मटकती मेरी निगाहें अंधेरे भरे इस मंज़र को निहार रही थी। जिस में पल-पल किसी के आने की आहट मुझे महसूस हो रही थी। कभी छम्म-छम्म तो कभी खन्न-खन्न या कभी किसी के पीछे से आने का भय। ये तरह-तरह के मन में उठते डर मुझे अंधविश्वास की दुनिया में ढकेलते जा रहे थे। तकिए पर सिर लगाए लेटी मैं परिवार के बीच होते हुए भी आज बहुत अकेली थी।

पूरा पार्क अंधेरे की लपटों में इस तरह सिमटा हुआ था कि गली में जलते बल्ब की रौशनी भी उसके आगे फीकी पड़ चुकी थी। हर तरफ बुरी तरह से सन्नाटा छाया हुआ था। यहाँ तक की रोज़ाना पार्क में मंडराने वाले कुत्ते भी न जाने आज कौन सी दिहाड़ी पर गए हुए थे। बस पूरी गली से लेकर पूरे पार्क तक कोई दिखाई पड़ रहा था तो सिर्फ मेरा परिवार। वो भी पार्क के कोने में अपना आसरा बनाए लकड़ी की बिछी चार टेबलों पर फैला हुआ एक तरह से डैड बॉडी ही था।

जैसे ही पेड़ का कोई पत्ता भी हिलता तभी मै धक सी रह जाती ऐसा लगता कि मानो कोई दबे कदमों से मेरे पास आता जा रहा है ऐसा अहसास होने पर मेरी गर्दन नज़रो के साथ-साथ दाएँ-बाएँ उपर-नीचे हर दिशा में घूम जाती। समझ नही आ रहा था कि मै इस तन्हाई भरी रात को कैसे गुजारुं?

आँखों में नींद नही आ रही थी पता नही इस अंधेरी रात में कौन-कौन से किस्से मेरी आँखों के सामने उभर आए थे। वो भी इतने डरावने की जिनके बारे में सोचते हुए भी शरीर में झुरझुरी सी उठने लगी थी। ऐसा लग रहा था कि कहीं वो मेरे सामने ही न आ जाए? एक से बढ़कर एक, जिन्हें पहले कभी क्लास में दोस्तो के बीच बैठ कर एक गोल दायरा बनाकर हम सभी बड़े मज़े से ठहाका
लगा कर सुना करते थे। पर अब वही मेरा जीना हराम कर रहे थे। इधर-उधर अपने ध्यान को भटकाते हुए मैं उन्हें भूलाना चाहा रही थी पर तब भी वो बारम्बार किसी फ्रेम की तरह मेरी आँखों के आगे आते जा रहे थे।

दिल में उभरने वाला हर एक अहसास दिल को दहला-देने वाला था जी तो कर रहा था कि पापा को ही झंझोड़ दूँ, पर क्या कहूँगीं? ये सोचकर मैं शांत हो जाती।

परिवार के हर शख्स को मैं बड़ी उम्मीद के साथ देख रही थी कि कहीं कोई जाग जाए। पर सबके खर्राटे ही कानों से टकरा रहे थे। जो डर को और बड़ा देने वाले थे यहाँ तक की किसी का साथ मिल जाने का लालच लिए नज़रें सिर्फ परिवार पर ही नही बल्कि सामने की उस सड़क पर भी टिकी थीं जहाँ से मैं किसी आते-जाते राहगीर को ही अपना हौंसला बना सकूँ। पर आज कोई राहगीर भी तो नही गुज़र रहा था। रात से ज्यादा अब सुबह अच्छी लगने लगी थी। जिसका मुझे अब बेसब्री से इंतज़ार था।

आरती
 

Monday, 7 November 2011

बचपन की कल्पनाओं का शहर



कल्पनाएँ हवाओं मे झूलती हैं, तैरती है, दुनिया के समंदर मे गोते लगाती है, सच और झूठ के बीच मे झूमती हैं।
कल्पनाएँ जो उम्र के बंधनों से होती हैं।

ये शहर किसने बनाया है से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इन मासूम कल्पनाओं में ये शहर कहां से आया है?

यशोदा

Thursday, 3 November 2011

सुर्खियों में बटा लीलू


हाल ही में पेपरों के चलते हम सभी दोस्त एक साथ स्कूल जाते थे। पेन्ट की जेब में पैन रख और एक गत्ता पेन्ट की लुप्पी में टांग हम सभी दोस्त टशन से निकलते। क्लास में भी एक साथ बैठते। पूरी क्लास में मैं, अतुल, लीलू और विक्की सबसे शरारती हैं। जब चाहा किसी के पास बैठ उस पर कई तरह की छाप मारते और उन्हें किलसा देते। हमें अगर कहीं चॉक पड़ी मिलती तो हम सभी ब्लैक बॉर्ड, दिवारों पर अपना-अपना नाम लिख देते।


एक बार हम सभी दोस्त काफी देर से पहुंचे। अफरा-तफरी में कहीं और नज़रें घुमाए बिना पेपर की सीट पर निगाहें गड़ाये बैठे रहे। पैन चलता रहा और नज़रें किसी और की सीट पर टिकी रही। पी एन गुप्ता के आने का इंतज़ार अब खत्म हो रहा था वे हमारे समाजिक के सर हैं। अब किसी को फिक्र नही थी उनके आने की क्योंकि पास होने तक के नम्बरों तक का पेपर ज्यादातर सभी साथी कर चुके थे।

हम सभी यारो की टोली बन बैठे सभी को चिड़ाने का जरिया। आज तक की मशहूर फिल्म गदर जिसके डायलॉग मन को भावुक कर देते है मगर हम कहाँ ऐसे दर्शक हैं, जो किसी फिल्म को फिल्म की तरह देखें? उस फिल्म के डायलॉगों को अपनी हॅंसी-ठिठोली में शामिल कर सबको हंसने का मस्त मौका दे रहे थे। उस फिल्म के किरदारों को अपने बाकि दोस्तों को बना उन्हें हंसाने के लिए उन डायलॉगों को अपनी अदा से सबके सामने अभिनय कर रहे थे। क्या पता ये मस्ती हमें दोस्तो कि यादों में हमेशा के लिये कैद कर दे?

देर तक हम यूहीं मज़ाकिया दौर में हंसतें खिलखिलाते रहे उसी समय नज़रे दिवार पर जा भिड़ी और देखा कि बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था 'आई लव ज्योति' सभी ने उसे देखा और पढ़ा और आगे बढ़ गए। पर मेरा दोस्त लीलू तो जैसे चौंक ही गया। उसे ऐसा देख सभी उसकी मज़ाक उड़ाने लगे। वह कसमें खाने लगा। "माँ कसम मैनें नहीं लिखा" उसके चेहरे से पसीने छूट रहे थे। बस चन्द सैकेन्ड बचे थे वो रोने ही वाला था। कहीं सर न देख लें। यही सोच मैं उठा और कागज़ से उस नाम को पोंछने लगा। हम सभी ने उसे विश्वास दिलाया कि कोई भी सर को नहीं बताएगा। वो थोड़ा शांत तो हुआ मगर उसे हमारे ऊपर भरोसा नही था। हम अपना एक पीरियड छोड़ उसे लेकर बाहर आए और स्कूल के बाहर बनी दिवार पर बैठ कर उस बात को छोड़ उससे पेपरो के बारे में बात करने लगे। कल कौन सा पेपर है? कल तो जल्दी ही आना है इन्हीं बातों के चलते अतुल ने लीलू के कंधे पर हाथ रख कर कहा, 

"भाई कब मिलवाएगा? कहाँ रहती है?”

ये बात सुनकर तो लीलू का गुस्सा मानो इतना भड़क चुका था कि अतुल की तो हवाईया गुल हो गईं। इसी बहस बाजी के दौरान अतुल और लीलू की लड़ाई हो गई। हम सभी इस लड़ाई को हंसी-मज़ाक में ले रहे थे। अगले दिन जब लीलू स्कूल पहुंचा तो क्लास में घुसते ही चौंक गया। चारों तरफ उसकी नज़रें घूम रही थीं।

दिवारों, दरवाज़ों, ब्लैक बॉर्ड पर 'आई लव ज्योति' लिखा था। ये देख तो लीलू की आँखों में खून उतर आया। वह हर जगह अतुल को तलाशने लगा। सभी उस नाम की परछांई को प्यार का नाम देने लगे।

आज सभी टीचरों के डांटने फटकारने का विषय लीलू था। बाकी साथियों के बतियाने का विषय भी यही था। कोई समझ नही पा रहा था कि ये हो क्या रहा है? आज स्कूल कि चर्चा लीलू के साथ शुरू हुई और खत्म भी शायद इसी पर होने वाली थी। हल्ला स्कूल की दिवारों से गुंजता हुआ बाहर की दुनिया तक जा रहा था। 'आई लव ज्योति-आई लव ज्योति'
जिस नाम को सुनने का दुख लीलू को था उस रूह को देखने कि चाहत सभी को थी। आखिर ये ज्योति कौन है?

इन्हीं सवालों का जवाब पाने के लिए लीलू को ढूढा गया। क्लासों में, स्कूल की छतो पर, यहाँ तक की बाथरूम में भी, मगर लीलू नहीं मिला। सबकी तलाश पाँचवे पीरिडय तक आते-आते खत्म होने लगी थी उसके बाद सभी ने अपना रूख अपनी-अपनी क्लासों की तरफ कर लिया। टीचरों के होते हुए भी सभी लीलू को याद कर उसका मज़ाक उड़ा रहे थे। सभी का समय उसी की चर्चा करते हुए हंसी-ठिठोली मे बित रहा था।

लीलू की खबर किसी को नहीं थी। उसका बैग भी क्लास मे उसकी सीट पर पड़ा हुआ था। मैनें बैग उठाकर अपने कन्धे पर टांगा और चल दिया लीलू के घर की तरफ।

अगले दिन जब मैं स्कूल पहुंचा तो देखा गोल दायरा बनाए खड़ी लड़को की भीड़, मेरे कदम तो ठहर नही पाए मैं फटाक से उस भीड़ में शामील हुआ।

ये देखते ही चौक गया की अतुल और लीलू की धूआंधार लड़ाई हो रही थी। सभी उस लड़ाई का लुफ्त उठा रहे थे। चारों तरफ उड़ती मिटटी बस यही गुहार लगा रहीं थी-

"कौन है वो?"
"कहाँ रहती है?"
"हमें नही मिलवाएगा क्या?”

अनिकेत

Monday, 3 October 2011

आओ, पूरी खाली है



कन्डेक्टर, "मेडम आगे खिसको।"

मेडम, “अरे भइया आगे कहां खिसकूँ।"

कन्डेक्टर, “अरे आगे पूरी खाली पड़ी है।"

अंदर से कई आवाजें, “अरे भइया कहां खाली पड़ी है। तूझे बड़ा दिख रहा है।"

कन्डेक्टर बाहर आवाज़ लगाते हुए, “मूलचंद...मूलचंद, पुष्पाभवन, शेखसराय, चिरागदिल्ली, अर्चना.... बैठो, बैठो, खाली है.... खाली है।"

अंदर से, “अब क्या सिर पर बिठायेगा भइया, भर तो गई।"

कन्डेक्टर, “अरी अम्मा खाली ले जाऊं क्या गाड़ी।"

अम्मा, “भइया क्यों यहां धूप मे परेशान कर रहे हो। एक तो इतनी गर्मी पड़ रही है। इस बार तो बारिश भी नहीं हुई।

एक आवाज़, “हां पिछली बार तो इतनी हुई थी के जल्दी सर्दी आ गई थी। इस बार तो बिलकुल भी नहीं पड़ी। राम जी भी खाम्खा मे दुख देते हैं।"

कन्डेक्टर सवारी अंदर करते हुए, “ओ भइया पैर अंदर करले, कोने से पकड़ों, चल भइया अंदर को खिसक जा।"

पहले से खड़ी सवारी, “अरे भइया इसमे कहां जगह है, अब बता कहां जायेगा।"

कन्डेक्टर, “चल भइया, यहीं खड़ा हो गया तू तो। अंदर को चल।"

अभी चड़ी सवारी, “यार, कहां को चलूं, नीचे पैर रखने की जगह नहीं है।"

अंदर वाले, “अरे यार, तू उसकी क्यों सुन रहा है। इनका तो रोज का काम है ये करने का, जब तूझे दिखे जगह तब अंदर घूस। नहीं तो यहीं खड़ा रहे।"

एक औरत, “ओ भइया मुंह पीछे को करके खड़ा हो।"

आदमी, “कहां मुंह घर पर रख आऊं।"

औरत, “अरे भइया अक्कड़ क्यों बोल रहा है।"

आदमी, “आप बात ही ऐसी कर रही है। अब बताओं मैं मुंह कहां पर करूँ। यहां पर सांस लेने की जगह नहीं है।"

औरत, “तो भइया रात की चड़ी हम पर उतारेगा क्या?”

आदमी, “तुम ही तो मिलों हो जो तुम पर उताऊंगा।"

औरत, “ज्यादा मत बोल।"

आदमी, "क्या कर लोगी आप?”

अंदर से बाकी, “अरे भइया छोड़ यार, क्यों गर्मी मे गरम हो रहे हो"

आदमी, “अरे तो यार देखों, किस तरह बात कर रही है ये।"

औरत, “किस तरह बात कर रही हूँ।"

बाहर कन्डेक्टर, “भीगे होंठ तेरे, प्यासा दिल मेरा। आओं - मूलचंद मूलचंद – चल उस्ताद।

यशोदा

Monday, 19 September 2011

एक छवि

 
सिर पर एक लंबी बादामी रंग कि टोपी, जिस्म पर एक बलैक कट स्लीव कि जैकेट
और जैकेट के नीचे ग्रे कलर का धारीदार कुर्ता। सफेद पजामा जो गर्द जम-जम कर मटमैला सा होने लगा है।

एक हाथ मे डंडा और उकडू बैठने कि अपनी ही अदा जो पूरे माहौल में जान ले आती है। माथै कि फूलती नस,और हाथों कि सिकुड़ती चमड़ी से उभरती नसें जिसमें उन्होनें मजबूती से पकड़ा हुआ है। एक धारदार नज़र जो रुई के फाहों पर जमी हुई है। हाथ अपनी ही लय में उठता है और डंडा रुई दूनने कि प्रक्रिया मे रच-बस जाता है।

इस दुनाई मे गर्माई कि अपनी ही पकड़ है, जो बारीक-बारीक फाहों को एक-दूसरे से चिपकाती और समतल बनाती जाती है। और एक नर्म बिछौने कि शक्ल मे तब्दील करती है। जिसमें सभी अपने जिस्म को सैफ रखना चाहते हैं उस मौसम मे जब जिस्म का रौंआ-रौंआ ठण्डी लहर कि वजह से कांटो कि तरह खड़ा होकर पूरे जिस्म मे चुभने लगता है ठीक एक पहाड़ी चूहे कि तरह।

हर किसी के बिछौने मे खुद के वजूद कि गंध बसती है। जिसमे कभी तो भिन्नी-भिन्नी चमेली कि खुशबु महकती है, कभी छोटे बच्चे कि दूध कि गंध जो दूसरी परछांई का भी अहसास कराती है, कभी कच्ची हल्दी और उबटन कि तेज़ महक जिससे सदियों पुरानी रिवायतें जुड़ी हैं कि बूटने लगे शरीर को अपने पास चाकू या माचिस रखना चाहिये ताकि अलाएँ-बलाएँ दूर रहें। जितनी गंध उतने बिस्तर जितने बिस्तर उतने शरीर। पर एक बात है इंसान चाहे कहीं भी घूम आये पर रात में वो अपना कोना अपना बिस्तर ही तलाशता है।

जब जब मेरी नज़र उन पर जाती है तो लगता है जैसे हर रुई पर पड़ती दूसरी मार अपने आप मे एक तेज़ी ले आई हो। वो बहुत संतुष्टी से अपने हुनर मे मसरुफ़ हैं। उनके पास ही बैठे उनके जोड़ीदार लिहाफ़ मे धागे डालने कि कारीगरी मे लगे हुए हैं जो कि इनकी सैम कोपी लगते हैं। वही कपड़े और वही हुनर को निखारने कि लगन। आस पास कि आवाज़ो का उन पर कोई असर दिखाई नही पड़ता पर जब कोई अपनी चप्पल या जूते को घसिटता हुआ उनके पास से गुज़रता है तो बड़े मियाँ एक नज़र भर उनको देखते हैं और फिर अपने आप मे मशगूल हो जाते हैं।

उनके डार्क ब्राउन रगं के जूतो के पास दो चाय के गिलास रखे हैं। जिसमे चाय कि एक बूँद किनारो तक आते आते पूरी तरह से सूख चुकि है। जिसे देखने पर लगता है कि इन्हें चाय पीये काफी समय गुज़र चुका है। उनके होठ भी ठण्ठी और सूखी हवा कि वजह से पपड़ाने लगे हैं। धूप उनके आधे चेहरे से पड़कर पूरे लिहाफ़ पर फैल रही है.......

यशोदा

Sunday, 28 August 2011

वो एक दिन, फिर से मिला मुझे


मैंने पूछा, "पूरी दुनिया में हर कोई सब कुछ भूल रहा है, दुनिया को अगर ऐसे देखे तो?”

छत्तर भाई ने कहा, “मैं मेले मे काम करता था, 10 दिन का ये काम मेरे लिये इस तरह का होता की, मैं पूरे शहर से, इलाके से और अपने आसपास से मिल भी लेता और उनसे दूर भी रहता। ये 10 दिन मेरे लिये दिन के जैसे नहीं होते थे। ये लगता था की मेरे लिये सारा समय उल्टा चल रहा है।

कई लोग किसी को ढूंढते हुये आते तो उन्हे मैं मिल जाता और कुछ जो अपनो से खो जाते तो मैं मिल जाता। मेरा तो सबको मिल जाना तय ही रहता था। कभी मेरी ड्यूटी मेले के भीतर लगती थी तो कभी गेट पर, गेट पर मुझे मेरी ड्यूटी पसंद नहीं थी, वहाँ पर जबरदस्ती रिश्तेदारी निभानी होती थी। लम्बी लाइन से बचने के लिये लोग मुझे खोजते हुये आते और सही बताऊं तो कभी - कभी मैं उनसे छूपने के लिये अपने मुहँ पर कपड़ा लपेट लेता। मेरे लिये उस लाइन मे कोई भी तो पराया नहीं था। मुझे तो ये भी नहीं मालुम था की इस लम्बी लाइन मे लगे लोग मेरे इलाके के है या उससे बाहर के। मेला का हर दिन मेरे लिये ऐसा लगता था कि मेरा काम 10 से 12 दिनों का नहीं है बल्कि बहुत लम्बे समय से चल रहा है। 10 दिन पूरा महीना लगने लगते। रात मे बस बिजली की रोश्नियों मे लोग मुझे जरूर तलाशते थे वो भी जो मुझे जानते थे और वो भी जो मुझे जानना चाहते थे। और मैं मेले में खड़ा यही सोचता था की, मैं तो यहाँ पर खुले मे खड़ा हूँ और फिर मुझे लोग ढूंढ रहे हैं। कभी - कभी होता है ना, हम बस स्टेंड पर खड़े जिस गाडी का इंतजारे करते है वही नहीं मिलती। उसके अलावा सब कुछ मिलता है। वैसे ही यहाँ मेले की जिन्दगी है, जिसे ढूंढों वही नहीं मिलता बाकी सब मिलते हैं और जिससे खो जाना चाहो वही सबसे पहले मिलता है। मैं गेट से अन्दर की तरफ हमेशा खिसक आता था। क्योंकि मेले के अन्दर रेहडी वालो, खोका मार्किट वालो से मेरी दोस्ती थी, वहाँ पर खड़ा होकर मैं पूरे मेले के मजे लूट लिया करता था। एक बार की बात बताता हूँ मेरी ड्यूटी मेले की बीच जगह पर लगी, जहाँ पर जमीन पर बैठकर लोग दुकान लगाया करते थे। ये वे लोग थे जो मेले मे दुकान लगाने का कुछ नहीं देते थे। वहाँ पर एक नाम गोदने वाला बन्दा था। उसके यहाँ पर बहुत भीड़ लगी थी, सभी नाम गुदवा रहे थे कोई किसी का नाम तो कोई किसी का, कोई भगवान का तो कोई अपने पति। वहीं पर भीड़ थी सबसे ज्यादा। एक लड़का सबसे पीछे आया और जल्दी से अपना काम करवाना चाहता था। मगर कुछ शरमा रहा था। इतने मे उसने अपनी कमीज उतारी और सीने पर नाम गुदवाने लगा। उसकी पूरी कमर पर नाम गुदे हुये थे। ये गजनी फिल्म तो अब आई है। यहाँ मेले मे कई ऐसे लड़के देख चुका हूँ जो अपने शरीर पर नामो का रेला लेकर चलते हैं। 10 दिन तक चलने वाला मेला, ऐसे लोगों से मिलवा देता था। मगर 10 दिन बीत जाने के बाद मे लगता की ये फिर नहीं मिलेगे। मैं भी सोचता था की अपने हाथों पर कुछ गुदवा लूँ, कम से कम पहली बार लगे मेले का साल ही। पर जब सब लोग भूल जाते हैं तभी तो मिलने का मज़ा था है। हमारी ड्यूटी मेला लगने के बाद और मेला उतरने से पहले ही खत्म हो जाती थी। तो वो उतरता हुआ मैं कभी नहीं देख पाया। सही बताऊँ तो इस विराट के मैदान मे मैं जब मेला नहीं लगता तब जाता हूँ तो मुझे सच मे ये नहीं पता रहता कि कौनसी दुकान कहाँ पर लगी थी और मैं कहाँ खड़ा होता था।"


मैंने पूछा, "खुद को कब आपने खोया हुआ पाया?”

छत्तर भाई ने कहा, “आज कल मेरी ड्यूटी बीआरटी लाइन पर है, यहाँ पर मुझे कोई नहीं पहचानता, वो जो मेरे साथ काम करते हैं वो भी और जो सड़क से निकल रहा है वो भी। यहाँ पर तो आप आटोमेटिक खोये हुये हो और सही मायने मे ये बहुत अच्छा है, खोये हुये रहना, एक अलग से जीने को भी कहता है। जिसमें शर्म, किसी के पहचान लेने का डर नहीं होता, बैठो - उठों और खाओ पियो। वैसे कोई जानने वाला भी क्या रोक लेगा तुम्हे कुछ करने से। मगर किसी के कुछ पूछ लेने का जवाब नहीं देना चाहते तो क्या हो? मैं ट्रफिक के बीचों बीच होता हूँ, शुरू शुरू मे बहुत डर लगता था। ऐसा लगता था की जैसे अगर कोई ध्यान न देकर चल रहा होगा तो वो पहले मार ही देगा चाहे हल्की सी ही क्यों न लगे। मगर कुछ दिनों के बाद में सब कुछ अपने आप सख़्त होता गया। मैं खुद भी सख़्त हो गया। मैं इसी सड़क पर कई समय से काम कर रहा हूँ, जगह बदल जाती है, कभी सड़क के सीधे जाने वाले रोड़ पर होता हूँ तो कभी यू टर्न पर, कभी उल्टे हाथ की तरफ जाने वाले रोड़ पर होता हूँ तो कभी सीधे हाथ की तरफ, एक ही ये रोड़ हर साइड पर खड़े होने के बाद मे अलग लगता है। गाडियां सारी एक जैसी है जो पूरे सड़क पर भाग रही है, लेकिन कहीं पर कुछ कम जाती है तो कहीं पर कुछ ज्यादा। कोई लाइट छोटी कर रखी है तो कोई बड़ी। मैं जो चाहता हूँ वो हमेशा होगा ये तो मेरी भूल है पर मैं चाहता हूँ की सड़क के बीच मे रहूँ मगर फिर भी खोया हुआ रहूँ।मैं जब सड़क पर होता हूँ तो खोया रहता हूँ और जब मैं घर आता हूँ तब लगता है कि मैं उस छत्तर को खो आया जो सड़क पर खड़ा था। अच्छा नहीं लगता वहाँ से वापस आना। घर में आपको सभी प्यार बहुत करते हैं मगर उनका प्यार अपनी तरफ खींचता है, पकड़े रखता है। मैं विराट के मैदान मे पला बड़ा हूँ, वहीं पर मैं सब कुछ सीखा, कुश्ती, क्रिक्रेट और काम भी, गाड़ी चलाना भी पर आज तक उसको पहचान नहीं पाया हूँ, जब मुझे कोई नौकरी मिलती है वो विराट के मैदान से ही जुड़ी होती है और मैं फिर से उसमें एक अजांन आदमी तरह खड़ा हो जाता हूँ। ऐसा मेरे साथ मेरे घर मे कभी महसूस नहीं हुआ। घर काफी बार बदला, हर साल बदलता है लेकिन फिर भी लगता है कि मेरा है, मैं इसे जानता हूँ। परिवार वाले कभी - कभी खोये हुये लगते हैं लेकिन घर कभी नहीं लगता।


मैनें पूछा, “अपने को खो देना क्या है?”

छत्तर भाई ने कहा, “दुनिया बनाना है, ये मैं नहीं कहता मेरी बीवी कहती है - तब मुझे पता चलता है। वो बहुत किताब पढ़ती है, जब घर लौटता हूँ तो वो किताब पढ़ रही होती और जब वो घर मे नहीं होती तो किताब जमीन पर इस तरह रखी होगी की देखते ही लग जायेगा की अभी किताब पढ़कर गई है कहीं। उसको मैंने पूछा था ये कि तुझे लगता है कि तू किताब पढ़कर इन घरेलू झमेलो से दूर हो जाती है? तब उसने कहा था की मैं किताब इन झमेलो से दूर होने के लिये नहीं पढ़ती हूँ मैं तो ऐसा माहौल चाहती हूँ अपने पास में जो मुझे अपने मे लगाये रखे, इसलिये ये मैं खुद से बना लेती हूँ। किसी चीज़ से लगाव रखना बाकी चीज़ों से काटता नहीं है वो तो एक और चीज़ एड कर देता है। वो अपनी इस बनाई हुई दुनिया में लीन रहती है, जो सिर्फ उसके अकेले के लिये नहीं है, उसकी बहन भी इसमे शामिल हो जाती है। जब वो नई नई आई तो उसको देखने के लिये सब आये, वो कमरे मे बैठी हुई थी, अपने समान को दिखा रही थी, पहले तो सब उसे देखते और उसकी खूबसूरती की सब तारीफ करते। पूरे कमरे मे काफी औरते थी। पहले उसे देखती फिर समानों पर निगाह डालती, उसके समान को खोलकर सभी देख रही थी। फिर उसका छोटा बैग खोला तो उसमे कुछ किताबे थी, उसकी डायरियाँ की तो सभी चौंक गई, कहने लगी किताबे भी लाई है। बस यही बात सबकी जुबान पर चिपक गई,  क्या - क्या समान लाई है बहू हुआ तो सबसे पहले तो किताबों का जिक्र होता। सब कहते, बहुत समान लाई है बहू और पता है किताबे भी लाई है। पढ़ती होगी, टीचर होगी, पढ़ाती होगी न जाने क्या क्या बोलते गई। लेकिन उसने ऐसा समा बना दिया यहाँ कि सब उसमें घूस गये। फिर तो हमारे घर के बाकी सभी किताबों को देखने लगे। मैं भी देख रहा था।"

मैंने पूछा, “आप अपनी इस दुनिया में, एक और दुनिया बनाना चाहें तो वो किस तरह की होगी?

छत्तर भाई ने कहा, “मैं सर्वे के लिये पानीपत गया हुआ था। वहाँ पर हमें रात का सर्वे करना था गाड़ियों का, हमारा ठिकाना सड़क के किनारे पर किया गया था। वही पर टेंट लगाकर हमें रखा गया था। बहुत कड़ाके की सर्दी थी, हम सभी जागे रहते थे। ऐसा लगता था की हम फोजी जिन्दगी जी रहे हैं, पूरे इलाके को दूर से देखना मगर बहुत गहरे ढंग ( शार्प तरीके ) से देखना। कोई पूरी सड़क पर घूमता था, तो कोई पुलीस वाले की केप पहनकर रात मे सफर करने वालो के लिये कुछ और बन जाता था, कोई पास की जगह में घूमकर कुछ मांग लाता था तो कोई दुकान वालो को रात मे दुकान लगाने का न्यौता दे आता था। पूरी रात मे लगता था की सुबह हो ही ना, रात में हवा, सड़क और वहाँ का सन्नाटा कभी परेशान नहीं करता था वे तो जगाता था, सोने ही नहीं देता था, लगता था की सो गये तो बहुत कुछ गंवा देगें। हर रात दो लोगों की ड्यूटी लगती थी जागने की मगर सब जागते थे। जहाँ पर ये नहीं मालूम था कि दिल्ली मे क्या हो रहा होगा, कौन किससे लड़ रहा होगा, कौन घर से भाग गया होगा, एक महीना बस, लगता था सभी को एक और महीना मिल जाये। और लौटने के बाद मे लगता था की एक और महीना मिल जाये बस, मैं मेले में भी ऐसे ही दुआ मांगा करता था कि बस, 10 दिन और मिल जाये। ये होना चाहिये, भले ही दिन मिल जाये मगर वहाँ पर किसी बात का डर ना हो। सिर्फ लड़का पार्टी के ही या आदमियों के लिये नहीं उसमें सभी होने चाहिये, हाँ, मेरी बीवी भी। मैं तो अक्सर सोचता था की एक ग्रुप ऐसा बन जाना चाहिये जो हर तीन महीने के बाद में एक महीना बाहर जाये और किसी जगह पर रहकर आये। ऐसे ही सड़क पर अपना डेरा डाले और आसपास की जगहों से सब कुछ लाये मगर वापस आ जाये।"


मैंने पूछा, “अपनी बनाई हुई दुनिया मे कब लगता है कि मैं अकेला नहीं हूँ बल्कि अनगिनत रूप हैं मेरे?”

छत्तर भाई ने कहा, “मैंने बहुत नौकरियां बदली है, कहलो की जगहें भी बदली हैं। हर जगह पर नया काम और नई पहचान मिल ही जाती है। वहाँ पर सभी किसी वक़्त मे एक समान हो जाते हैं। सब कुछ चाहते हैं, पर किसी को पता नहीं होता की क्या? सब कहते हैं "अबे घर ही तो जाना है रूकजा आराम से चला जाइयों, जल्दी क्या है?” इसी बात मे सब आसानी से रूक जाते हैं। लगता है जैसे कोई भी घर नहीं जाना चाहता। उसी जगह पर बहुत देर तक बैठे रहते हैं कुछ भी बातें करते हैं, कोई कहीं की बताता है, कोई कहीं जाने की बस सभी लगे रहते हैं। मैं भी उन्ही के बीच मे बैठ जाता हूँ। कुछ नहीं करता, ना बोलता, बस सुनता रहता हूँ, कभी लगता है कि मैं यहाँ पर आसानी से बोल सकता हूँ और कभी लगता है कि ये लोग अपने बारे मे कहाँ बोलते हैं जो मैं अपने बारे मे बोलूं। या मैं क्या बोलू की उलझन मे रहता हूं। वो लोग मुझे देखते रहते हैं, कभी उकसाते हैं तो कभी नहीं। कभी हाथ पकड़कर खींच ही लेते हैं। मुझे लगता है कि मैं उनके बीच का ही एक हिस्सा हूँ। हमारी बातें एक समान सुनाई देती हैं, कोई दर्द या दुखी होने को बोलना यहाँ पर उसका मजाक बनवाने के जैसा है। बड़ी - बड़ी बातें करते हैं सब। कोई किसी की मदद शायद नहीं कर पाये लेकिन बातें करने मे उसका खुश कर देते हैं। ये सब बातें मुझे दुखी कर देती हैं क्योंकि मैं इनमे घूलाना नहीं चाहता, क्योंकि भइया हमारा काम तो डेलीवेज़ पर काम करने का है। कभी यहाँ तो कभी वहाँ पर, ऐसे मौके मिलना आसान नहीं होता। बीआरटी को, उसमे काम करने वालों को लोग गाली देते हैं, कोई नहीं लेकिन कभी रात मे देखना, मस्त हो जाता है पूरा रोड़। लगता है जैसे साला सच्ची का फोरनकंट्री है। अपनी ही जगह को भूल जाओंगे। लोग निकलते हैं इसे देखने के लिये, तब लगता है कि मैं अकेला दिवाना नहीं हूँ। बहुत लोग हैं।"

लख्मी

Wednesday, 24 August 2011

छुपने से खोने तक




सड़क के किनारे लगी वे दुकानें को किसी को भी अपनी ओर खींच सकती है, बुला सकती हैं, रिझा सकती है और लालसा से भर सकती है। 

हर रोज दोपहर १२ बजे से यहां एक हुजूम लगता है। जो भी आता है वो इसी कोने का हो जाता है। कभी घंटों के हिसाब से यहां पर आवाजें गूंजती है तो कभी खामोशी भी इसकी एक आवाज बन जाती है। मगर इसका सांस लेना बड़ता जाता है। ये जगह असल मे छुपने के लिये बनी है या यूं कहे की गुम हो जाने के लिये इस जगह को बनाया जाता है। 

कोई किसी से छुप रहा है तो कोई यहां पर आकर किसी लुफ्त मे खो जाना चाहता है। ये उस मुसाफिर पर निर्भर करता है कि वे छुपने आया है खोने

यशोदा