Monday, 18 May 2015

एक और बिस्तर

रोज की तरह आज भी दोपहर के करीब तीन या चार बज रहे होंगे। सभी गली में बातें करने में जुटे हुये थे। औरते अपनी मंडली में खोई हुई थी और बच्चे स्कूल की थकावट को दूर करने के लिए गली में दौड़ लगा रहे थे। पूरी गली में धूप बिखरी थी। कहीं – कहीं पर ही छाया थी, जिसका सहारा लेकर
औरतें अपनी कहानियाँ बुनने में लगी थी।

इतने में गली के कोने से एक अधेड़ उम्र की औरत भागते हुये दाखिल हुई। उस औरत की रंग-बिरंगी चुन्नी सिर से लेकर गले तक पड़ी हुई थी। वे गली के एक बड़े से चबूतरे पर तीन – चार औरतों के बीच जा बैठी और बोली, “क्या तुमने सुना है? पिछली गली से दो बच्चे गायब हो चुके हैं।“

उस औरत को कोई जानता तो नहीं था। लेकिन वो इस तरह से उनके बीच में बैठी थी की जैसे गली में वो सभी औरतों को जानती थी। बात ही कुछ ऐसी थी की उसके लिए किसी के साथ खास रिश्ता बनाने की कोइ जरूरत नहीं पड़ती।

वो फिर से बोली, “अरे वो ही समोसे वाले के पोते। अरे बड़े दुखी है वो। मैं वहीं से आ रही हूँ।“

सभी सुन रही थी। सभी को जैसे उस औरत की इस बात ने अपने में समा लिया था। उन्ही औरतों के बीच में बैठी एक औरत ने चौंकते हुये कहा, “वहीं जिनका कोने वाला मकान है?

“हाँ, हाँ वही।“ वो हाँ में हाँ मिलते हुये बोली।
उनके साथ वाली एक और औरत अपने पल्लू को आगे और खिसकाते हुये बोली, “उनपर क्या बीत रही होगी? उस माँ का क्या हाल हो रहा होगा?”

बातें दो औरतों के बीच में घूम रही थी मगर उसका असर सभी पर छाया हुआ था। की तभी साथ से अंजली हड़बड़ी में उठी और जोरों से चिल्लाने लगी, “नन्नो ओर नन्नो, कहाँ गई मेरी बच्ची?

अंजली को यहाँ पर सभी जानते है। कई बच्चो का अकेली सहारा अंजली, उनका घर बच्चो से भरा रहता है। उनका घर जैसे अंजान बच्चो के लिए किसी खेलने की जगह से कम नहीं है। ऐसा मैदान जहां पर कोई नहीं आकर खेल सकता है।

साथ वाले घर से निकलती चार या पाँच साल की लड़की ने कहा, “मम्मी में तो अंदर थी, टीवी देख रही थी। अंजली उस लड़की को अपनी गोद में बिठाती हुई बोली, “मेरी लाड़ो घर से बाहर मत निकलियों, कोई तुझे उठा कर ले गया तो मैं क्या करूंगी?” और वो बच्ची भोचक्की सी अपनी माँ को देखने लगी। अंजली ने उस लड़की को अपनी गोद में ही बैठा लिया। औरतों के बीच की बातें थोड़ी धीमी सी पड़ गई लेकिन बंद नहीं हुई थी।

दूसरी औरत उस चुप बैठी अंजली से बोली, “तू घबरा क्यों रही है? कुछ नहीं होगा हमारे बच्चो को, देखते है की कोई कैसे ले जाता है इन्हे।“

अंजली कुछ नहीं बोली, यहाँ पर सभी उसकी इस बेचैनी को जानती थी।
सब खामोश हो गई। कुछ ही देर के बाद में धीरे – धीरे सब कुछ सिमटने लगा। औरतें अपने अपने घरों की ओर लौटने लगी। और बीच में रह गई वो बात जिसने अपनी ही गली और उसमे आते नए लोगो को एक नए तरीके से देखने का नज़रिया दे दिया था।    

गली में एक ज़ोरदार आवाज़ हुई, सभी गली के लोग एक दम से बाहर की ओर आए। देखा की एक बच्चा बहुत जोरों से रो रहा है और यहाँ – वहाँ छुपने की कोशिश कर रहा है। सभी उसकी उस बेचैनी को देख रहे थे। कोई भी उस बच्चे की ओर नहीं जा रहा था। वो बच्चा लगातार रोये जा रहा था। इतने में वो एक घर के चबूतरे पर जाकर लेट गया। कुछ देर के लिए वो शांत हो गया। मगर अब आवाज़े दूसरी तरफ बिखर रही थी।

प्रेस वाले अंकल चिल्लाये, “अरे किसका बच्चा है ये?”
सब्जी वाले भैया, “पता नहीं लगता है किसी और ही गली का है?”
एक औरत ने कहा, “अरे देख तो लो कहीं बेहोश तो नहीं हो गया।“
दूसरी औरत ने बोला, “बेचारा ये तो गरम भी है।“
गली के दादा जी बोले, “देख क्या रही हो उठा तो इसे, यहाँ ले आओ मेरी खाट पर।“
सभी उसे उठा कर वहाँ पर ले गए।

“लगता है कहीं और है ये यहाँ का तो नहीं लगता।“
“ये कहीं छुट तो नहीं गया?, पिछली रात में यहाँ पर बारात आई थी।“
“लग तो यही रहा है।“
“थोड़ी देर रुक जाओ क्या पता कोई इसे ढूँढता हुआ आ जाए।“
“हाँ, हाँ, ऐसे ही करलो।“

वो बच्चा तो जैसे सो चुका था। सभी उसके जागने का इंतजार कर रहे थे और साथ ही उसके ढूँढने आने वाला का भी। लेकिन काफी देर हो चुकी थी। वो लड़का जब नहीं उठा तो उसके मुह पर पानी का छिड़काव किया गया। लेकिन वो नहीं उठा। सभी में एक हड़बड़ी सी उठने लगी। सभी के सभी उसे नजदीक के डाक्टर के पास में ले जाने के लिए भागे।

“चलो, चलो उठाओ, कहीं लड़के को कुछ हो ना जाए?”
“अरे पता तो करो की ये कहीं आसपास का ही तो नहीं है?”

गली के एक दो लड़को को यहाँ वहाँ भेजा गया। गली में सिर्फ औरते रह गई और आदमी उस लड़के को लेकर डॉक्टर के पास में ले गए। उन औरतों के बीच में घुमसुम बाते होने लगी।
कोई कहती, “बताओ किसी के बच्चे को कोई उठा कर ले जाता है और किसी का बच्चा खो जाता है।“
“सही कह रही हो जीजी। दर्द तो दोनों ही सूरतों में होता है।“
“पता नहीं किस का बच्चा है?”
“मैं तो कहती हूँ की पुलिस में दे दो।“
“अरे नहीं वहाँ पर ये और बेचारा पागल हो जायगा”

कुछ ही देर में आदमियों का जत्था उस बच्चे को लेकर लौटा। साथ वो दोनों लड़के भी जो इसका पता लगाने के लिए आसपास में गए हुये थे। किसी को भी इसका नहीं मालूम था। वो समोसे वाले अंकल भी आए थे की कहीं उनका ही तो पोता नहीं है। पर ये उनका भी नहीं था। बच्चा सो रहा था। रात हो चुकी थी। बच्चा दादा जी की खाट पर ही सोया हुआ था। बातें धीमी हो चुकी थी। फैसला हुआ की बच्चे को ढूँढने वाले जब तक यहाँ नहीं आएगे हम इसे कहीं भेजगे।
“पर इसे रखेगा कौन?”
दादा जी ने कहा, “और कौन रखेगा?” मैं रखूँगा, मेरे पास ही सो जायगा।“
सब्ज़ीवाले अंकल बोले, “अरे बच्चा खायगा, कपड़े सब कुछ चाहिए ही।“

कौन रखेगा, कौन रखेगा, का नारा और परेशानी सभी में देखी जा सकती थी। इतने में अंजली गली के अंदर आती हुई दिखाई दी। सभी की आँखों में जैसे खुशी छलक आई थी। जैसे ही अंजली उनके करीब आई तभी दादा जी ने कहा, “बेटा अपने घर में एक बिस्तर और कर दे। ये देख कौन है?”

अंजली उस बच्चे को देखती रही। छ: या सात साल का बच्चा, नंगा और सोया हुआ। वो कुछ नहीं बोली। जो भी करना था वो बाद में होता रहेगा। सबसे पहले वो उसे अपने घर में ले जाने के लिए खड़ी हुई। गली के बीच में खड़े लोगो से जैसे किसी बहुत ही बड़ी परेशानी खत्म हुई थी। दादा जी जाते हुये बोले, “जब तक इसके घर वाले इसे खोजते हुए नहीं आ जाते तब तक इसे रख ले।“


आज दो साल हो चुके है मगर उसे लेने कोई नहीं आया। कई शादियाँ हुई, हादसे हुये लेकिन अंजली के घर का शोर बढ़ता गया है कम नहीं हुआ।   


नंदनी

Monday, 27 April 2015

इमली खेल

घंटी की आवाज़ और बच्चों के हो-हल्ले के साथ आधी छुट्टी होने का पैग़ाम मिल गया। अपने-अपने डेस्क छोड़ फर्राटे से भागते हुए रोज़ की तरह मैंने और मेरी सहेलियों की टोली ने इमली खेलने का ठिकाना घेर लिया। कुछ साथी खेल को देखने के लिए ख़ाली डेस्कों पर जा बैठे, तो कुछ ने खड़े होने के लिए अपने ठिकाने चुन लिए और खेल शुरू हो गया। मेरी टीम की दूसरी बारी थी पर मुझे अपनी बारी आने का बेहद इंतज़ार था। खेल के बीच कई आवाज़ें भी शामिल हुई। कोई आगाह करते हुए कहता, ”भई कपड़ा लगना आउट नहीं हैं तो कोई मेरी तरह ठीक हैकहकर खेल को आगे बढ़ाता। ये मज़ेदार सफ़र शुरू हो चुका था। कुछ पक्के खिलाडि़यों के पास जीतने का जो था तो कुछ की कमज़ोरी उनके चेहरे पर एक घबराहट बनकर छाई हुई थी। फिर भी वो इस खेल का मज़ा लेना चाहती थीं। उसकी टीम के सदस्यों ने उसे दिलासा देते हुए कहा, ”कोई बात नहीं, हम सब संभाल लेंगे।बारम्बार ये साथी तेजी से भागते हुए आते और हमारे हाथों को पार कर जाते। जब उस टीम की ख़ातिर खिलाड़ी शिल्पा ने रोज़ की तरह आज भी हमारे चार हाथों की ऊँचाई को आसानी से पार कर लिया, तो आसपास खड़े तमाबीनों ने ताली पीटते हुए कहा, ”वाह! शिल्पा तो पक्की खिलाड़ी है।इस वाहवाही भरे दौर के बाद, उस टीम के खिलाड़ी एक बार फिर से छलाँग लगाने को तैयार थे। इस बीच कुछ साथी खिलाडि़यों ने फिसलने या रपटने के डर से जूते उतारकर कोने में रख दिए। फिर दूसरा खिलाड़ी तेजी से भागता हुआ आया। सभी की नज़रें जैसे उसके क़दमों पर टिकी थीं। मुझे लगा कि अभी ये हमारे हाथों को पार कर शायद उस पार खड़ी मिलेगी, पर इमली के नज़दीक पहुँचते ही उसके क़दम थम गए। इस नज़ारे को देख सभी जोर-जोर से हँसने लगे। वह हाँफते हुए बोली, ”मुझे डर लग रहा है, इमली थोड़ी नीचे बनाओ।पर मैं नहीं मानी। मैंने कहा, “हमने इमली बिल्कुल ठीक बनाई है, अब हम इसे नीचा नहीं करेंगे।आखि़रकार मेरी जीत हुई। लेकिन मेरे सब्र का दायरा जैसे टूटता ही जा रहा था। दिल करता कि मैं भी इमली पर से छलाँग लगाऊँ, पर दूसरी टीम के खिलाड़ी आउट होने का नाम ही नहीं ले रहे थे। खैर, मेरा ये इंतज़ार, कब इस मस्ती भरे माहौल का मज़ा लेने लगा, मुझे पता ही नहीं चला। कभी नाला, तो कभी मंदिर बनाने में भी शायद मैं इस खेल का हिस्सा बनती चली जा रही थी। तभी एक नयी खिलाड़ी, यानि रजनी तेजी से भागती हुई आई और हमारे हाथों के उस पार हो गई। उसके पैर का अंगूठा मेरे हाथ की कलाई को छू गया।

उसकी इस छलाँग के तुरन्त बाद मैंने ज़ोर से चिल्लाना शुरू किया, ”रजनी आउट हो गई, रजनी आउट हो गईऔर माहौल शोरगुल से भर गया।

हाँ भई, रजनी का अँगूठा छुआ है।लेकिन रजनी और उसकी टीम के खिलाड़ी ऐसा मानने को तैयार नहीं थे।

वे कहते, ”तुम्हारी टीम की बारी नहीं आई इसलिए तुम हमें चीटिंग से हराना चाहती हो।मुझे गुस्सा आ गया। मैंने कहा, ”ठीक है, मैं खेलूँगी ही नहीं। मेरी टीम भी मेरे साथ थी।पर शिल्पा की टीम को अपनी बारी लेनी थी इसलिए वे मान गए और इस रूठने-मनाने के बाद हम इमली बनाने बैठ गए। अब दूसरी टीम की आखि़री खिलाड़ी यानी शिल्पा ही बची थी। कुछ तमाबीन शिल्पा-शिल्पाचिल्लाकर उसका हौसला बढ़ा रहे थे। उसकी नज़रों में भी एक आत्मविश्वास भरा था। मैं उसको देख रही थी। वह तेजी से भागती हुई आई। जैसे ही उसने छलाँग लगाने के लिए अपना पैर उठाया वह मेरे माथे में आ लगा और मेरा सिर चकरा गया। सभी हँसने लगे। वहाँ खड़े तमाबीनों ने मुझे घेर लिया।

कोई कहता, ”कोई बात नहीं, खेल-खेल में लग जाती हैतो कोई मेरा माथा मसलता। शिल्पा सॉरी, सॉरीकहकर मुझे मना रही थी। दोस्तों की इन बातों से जब मेरा मन बहल गया और याद आया की शिल्पा आउट हो गई है तो मैं सब कुछ भूलकर खेल के मैदान में उतर गई। खेल के इस अंतिम दौर में भी मेरा जो बरक़रार था और मैं ऊँची-ऊँची छलाँग लगाते हुए जीत की तरफ़ बढ़ रही थी। खेल देख रहे लोग जब मुझे वाहवाही देते तो मेरी खुशी का कोई ठिकाना न रहता। तभी घंटी की आवाज़ सुनाई दी और आधी छुट्टी ख़त्म हो गई। मुझे पूरी तरह न खेलने का अफ़सोस तो हुआ पर कल इस खेल में पहली बारी मेरी होगी- ये सोच मुझे एक तसल्ली हो रही थी।



टीना

Friday, 24 April 2015

मैं बना चिब्बियों का खिलाड़ी

गर्मियों का समय था। एक दिन मैं सो रहा था, बिजली जा चुकी थी और पसीना रीर से छूट रहा था। उठकर मुँह हाथ धोया और बाहर पार्क में गया। देखा वहाँ कोई नहीं था। बाहर आया तो सारे साथी चिब्बियाँ ढूँढ़ रहे थे। मैंने पूछा, ”क्या कर रहे हो“? उन्होंने कहा, ”अब चिब्बियों के दिन आ गए है।“ चिब्बियों के दिन मतलब? तो उनमे से एक ने कहा, “गर्मियों में कोल्ड ड्रिंक ज्यादा पीते है लोग, तो उनकी चिब्बियाँ बेकार हो जाती हैं।“

“तो” मैंने पूछा।

वो बोला, “अरे उसी से तो हम खेलेगे।“

कुछ समय तो मेरे समझ में ही नहीं आया की भला चिब्बियों से कोई कैसे खेल सकता है। लेकिन हमारे यहाँ पर कोई भी चीज बेकार नहीं मानी जाती। हर किसी का कोई न कोई खेल हम बना लेते हैं। लेकिन उसके लिए हमारा बच्चा बनना जरूरी होता है। जैसे – सिगरेट की खाली डिब्बियों के ताश बना कर खेलना, इमली की गुठलियों से खेलना, साइकिल का पुराना पड़ा टायर। हर चीज का एक खेल बना कर समय के तेजी से बीतने को हम थोड़ा सा रोक लेते हैं।

तो बस, मैं भी अपने साथियों के साथ चिब्बियाँ ढूँढ़ते-ढूँढ़ते पहाड़ी पहुँच गया। वहाँ हमने चिब्बियाँ ढूँढ़ी, जेबों में भरी और चल दिए पार्क की तरफ़। पार्क में पहुँचते ही झट से चिब्बियाँ ठोंकी, पोल (गड्ढा ) खोदी और उसकी कुछ दूरी पर दो लाइनें खींच दी, चलने-तकने की और शुरू किया खेल। हम चार साथी थे - कुलदीप, सौरभ, रोहित। ये हमने तका ( अपने – अपने नंबर के लिए )  और मैं दूत ( दूसरा नंबर ) बन गया और कुल्दीप मोल ( पहला नंबर ) वैसे हम चार-चार खेल रहे थे। कुल्दीप की तीन आ गई और तीन का डंड होता है। हमने उससे एक भरवाई, अब 17 चिब्बियाँ हो गई। मैंने चली तो मेरी बारह पोल में आ गई चिब्बियाँ तभी वो भी मैंने मारकर जीत ली। पार्क में मैं सबसे अच्छा खेला और सबसे जीता। बाहर से पन्नी लाया और सारी चिब्बियाँ भरी और घर चला गया। वो सारी चिब्बियाँ मैं अपने घरवालों से छिपाकर रखता था। एक दिन मेरी बड़ी बहन ने चिब्बियाँ देख ली और घर के बाहर वाले गटर में फेंक दी। उस दिन मेरा चेहरा गुस्से और मायूसी से भरा हुआ था। इतनी मेहनत से मैंने ये चिब्बियाँ जीती और मेरी बहन ने फेंक दी। अब किसी को खेलता देखता हूँ तो वो दिन याद आ जाते है। आज जब भी वो खेल खेलना चाहता हूँ। लेकिन चिब्बियाँ ढूँढ़ने का मन भी नहीं करता । बच्चे दे देते है उन्हें लगता है कि ये अपना हानी (साथी) बना लेगा इसके पास अभी तक चिब्बियाँ है। इस खेल को छोड़ने का मन नहीं करता।



अनिकेत

Thursday, 23 April 2015

इलास्टिक के खेल

घर की चौखट पर बैठकर, गाल पर हाथ धर, मैं निहारती उन खेलते हुए बच्चों को जो गली में एक अनोखा ही खेल खेलते हुए नज़र आ रहे थे। उन्हें देखकर मेरी निग़ाहें उन्हीं पर टिक गई। दो बच्चे एक इलास्टिक को पैर में फँसाकर खड़े थे और दो जल्दी-जल्दी इलास्टिक को अपने पैरों तले दबाकर यहाँ से वहाँ कूद रहे थे। कभी इलास्टिक को पैर से उठाकर दूसरे छोर ले जाते तो कभी उस पर कूदते। उन्हें इस तरह खेलता देखकर मेरे मन में जिज्ञासा होती उस खेल से रूबरू होने की। थोड़ी देर बाद मैं उनके पास जा खड़ी हुई। जब भी मैं उनसे उस खेल के बारे में पूछने के लिए आगे बढ़ती कोई न कोई चीखता हुआ अपनी बारी लेने लगता और मैं हर बार वहीं खड़ी की खड़ी रह जाती। जब वो खेल को छोड़ सलाह करते तो मैं उनके बीच जाकर पूछती, ”ये कौन सा खेल है? आज तक ये खेल मैंने किसी को खेलते हुए नहीं देखा। क्या तुम मुझे यह खेल खेलना सिखाओगे?“ मेरी बातें सुनकर उनके बीच में से एक लड़की निकलकर आई और कहने लगी, ”हम तुम्हें अपने साथ खिला लेते पर इस वक़्त तो हम घर जा रहे हैं। कल जब हम खेलेंगे तो तुम्हें बुला लेंगे।“ “ठीक है

इतना कह मैं वहाँ से आ गई और अगले दिन का इंतज़ार करने लगी। उस रात मैं इस बात को ज़ेहन में दबाकर सो गई। अगले दिन सुबह उठी। स्कूल गई। वहाँ भी यही सोचती रही कि आज मैं एक नया खेल खेलूँगी। यही ज़द्दोजहद पूरे दिन मेरे ज़ेहन में चलती रही। शाम को जब उन्होंने मुझे खेलने के लिए बुलाया तो मैं चुपचाप उनके बीच जा खड़ी हो गई। सभी अपने हाथों को आगे कर हानी पुगते। हमारे दो समूह बने। हमने टॉस किया। मेरी टीम बाजी देने लगी। मेरे साथी इलास्टिक को पैर में फँसा खड़े हो गए और मुझसे कहा, ”तुम इस सामने वाली सीढ़ी पर बैठकर इस खेल को सीख लो।मैं वहाँ बैठकर उन्हें खेलता हुआ देखने लगी पर मुझे कुछ समझ में आ रहा था। जब मेरी बारी आई तो मेरे दोनों हानी इलास्टिक पर कूदते हुए आगे चले गए लेकिन मेरे पैर तो इलास्टिक पर कूदने के लिए उठ ही नहीं रहे थे। हिम्मत करके मैं अपने पैरों को उठाका इलास्टिक पर कूदी। एक पैर इलास्टिक पर और एक पैर ज़मीन पर टिक गये और मैं आउट हो गई। मैं कई बार इसी तरह आउट होती रही। धीरे-धीरे मुझे खेलना आ गया। आज भी जब मैं इलास्टिक खेलती हूँ और कोई मुझसे उस खेल के बारे में पूछता है तो मेरी निग़ाहों के सामने उस दिन का मंज़र आ जाता है।



नेहा श्रीवास्तव

मैं बना ड्राइवर

चार-पाँच साल की उम्र में अपने हमजोलियों को टायर को छड़ी से पीटते हुए देखा करता था। लेकिन कभी उस जगह से दूर नहीं जा सकता था जहां पर मुझे रोज सुबह से ही बैठा दिया जाता था। मेरे आसपास में सभी होते थे। बडे आदमी, औरतें, लड़कियां, लड़के और बच्चे भी मगर मैं फिर भी जैसे उन सब में अकेला ही रहता था। सुबह से ही मेरे बराबर बच्चो की भीड़ लग जाती थी। वो पूरी दोपहरी खेलते थे।
 
एक दिन मैंने सोचा कि एक बार मैं भी तो चला कर देखूँ कि टायर को कैसे चलाते हैं। उम्र के साथ टायर को छड़ी से पीटते हुए बड़ा हुआ और टायर इधर-उधर घुमाना सीखा। ग़ली के बच्चों के साथ अक्सर टायर घुमाता। एक दिन मैं और मेरे साथी जे ब्लॉक से लेकर अपनी ग़ली का चक्कर मारकर आ रहे थे कि मेरे भाई ने मुझे देख लिया और मेरे टायर को मुझसे काफी दूर एक नाली में फेंक दिया। मेरा मन बहुत उदास हो गया। मेरा भाई मुझे घर लेकर आया और मुझे बहुत मारा। मारते-मारते कहा, दोबारा टायर चलाता दिखा तो हाथ-पैर तोड़ दूँगा।“ और मुझे फिर से उसी दुकान पर लाकर बैठा दिया। मैं जब भी साइकिल के टायर को देखता तो जी करता की बस इन्हे लेकर दूर कहीं भाग जाऊ। मगर नहीं जा सकता था। जब मेरी पिटाई हुई तो उसी समय मैंने सोचा कि अगर फिर मैं साइकिल टायर से खेलूँगा तो मार पड़ेगी और दोस्त मज़ाक उड़ाएँगे।
 
मैं अपनी छत पर गया और देखा कि एक नया टायर और उसके पास छड़ी पड़ी है। टायर उठाया और छत पर घुमाने लगा। लेकिन टायर के लिए छत छोटी थी। वह दीवार पर टकराकर गिर जाता। मैं छुप-छुप कर टायर चलाता और जब जी भर जाता तो उसे फिर से छत पर फेंक देता। 

अगले दिन फिर से उतार कर इस नायाब खेल का मज़ा लेता।


कार्तिक



Wednesday, 22 April 2015

बचपन और उसके खेल

गिट्टे जैसे खेल को सीखने और खेलने की तमन्ना तो मुझे शुरू से हो रही थी। जब गर्मी की छुट्टियों में लोग अपने घरों के सामने बैठ गिट्टे खेलते तो बड़ा मन करता उनके साथ खेलने का। एक दिन अपने इसी शौक को लिए मैं भी ग़ली के बच्चों के साथ चल दी गिट्टियाँ ढूँढ़ने। पाँच गिट्टियाँ लाकर अकेले ही शुरू कर दिया गिट्टियाँ उछालना। फर्श पर बिखेर जैसे ही हाथ में कैद गिट्टी को उछालती सभी इधर-उधर हो जातीं और मैं ज़मीन पर पड़ी गिट्टियों में से एक भी नहीं उठा पाती। धीरे-धीरे कोशिश कर उन्हें उठाना सीखा।

फिर कुछ दिनों बाद सहेलियों के साथ टिके खेलना सीखा। उन्होंने साथ टिके खेलना शुरू कर दिया। हम सभी अपनी एक सहेली के चबूतरे पर जाकर टिके खेलते। हर दिन स्कूल से आकर दोपहरी में भी चबूतरे पर अपना डेरा डाल देते। जब वो चबूतरा टूटा तब हमने दूसरे ठिकाने की तला शुरू की और अपनी एक सहेली की बालकनी में जाकर खेलना शुरू कर दिया। उनकी बालकनी में खेलना मुझे पसंद आने लगा क्योंकि वहाँ न आने-जाने वाले परेषान किया करते थे न ही सिकुड़कर बैठना पड़ता था। एक दिन दोपहरी में बालकनी में बैठकर खेल रहे थे, सोनम की मम्मी अंदर कमरे में सो रही थी। गिट्टियों के बजने की आवाज़ सुन उसकी मम्मी अंदर से उठकर आईं और गुस्से भरी आवाज़ में कहा, जब देखो गिट्टियाँ ही उछालती रहती हो कोई काम नहीं मिलता तुम्हें स्कूल का।, सभी सहेलियाँ डांट सुनकर शांत हो गई लेकिन वो अपनी मम्मी की डाँट को अनसुना कर अपने खेल में मगन रही। तभी उन्होंने सभी टिको को अपने हाथ में दबोचकर पार्क की और फेंक दिया। सभी सहेलियाँ वहाँ से उठकर चल दी और अगले दिन फिर नयी टिको ढूँढ़कर ग़ली के बाहर बनी बंद दुकान के चबूतरे पर खेलने का ठिकाना बना लिया।

हम वहाँ रोज खेला करते थे। जैसे हम सहेलियों के मिलने का कारण वही बन गया था। काश के गुज़रा वक्त एक बार फिर से लौट आता। काश के हमारी जिंदगी में रिवाइंड बटन होता .


गुड्डो