Monday, 22 July 2013

मेरे घर की रेलिंग

रे, रे, रे, लि, लि, लि, ग, ग, ग,  रेलिंग...
सब मुझको कहते हैं रेलिंग

जब भी कोई गली में जादू दिखाने आता
भाग के हम जाते
रेलिंग से देखते वो सब जादू

रे, रे, रे, लि, लि, लि, लि, ग, ग, ग, रेलिंग
सब मुझको कहते हैं रेलिंग

का, का, का, हि, हि, हि,
कहीं तरह का मिलता, जैसे मरजी ले लो
लम्बे, सीधे, उल्टे
म, म, म मिलता हूं

दि, दि, दि, वा, वा, वा, लि, लि, लि,
दीवाली को मुझ पर सब पेंट करते हैं,
घर से ज़्यादा मुझको लड़ियों से सजाते हैं

रे, रे, लि, लि, लि, ग, ग, ग - रेलिंग
सब मुझको कहते हैं रेलिंग


लता, तानिया

Monday, 15 July 2013

दादी का बक्सा

दोपहर का समय था। मेरी दादी यहाँ-वहाँ बिखरे अपने कपड़ों को लेकर बहुत परेशान हो रही थी। वह कई दिनों से सोच रही थी कि वो एक बक्सा खरीदेंगी लेकिन कभी वो दिन या मौक़ा नहीं आ रहा था। कभी वो ही अपनी छोटी सी पोटली में बंधे पैसों को गिनकर चुप हो जाती क्योंकि वो कम लगते तो कम ज़्यादा होने पर उनमें उन्हें और जोड़ने का मन होने लगता पर उनके लिए बक्सा कभी जैसे नहीं आने वाला था।

मगर आज वह अपने पुराने कपड़ों को काफी देर से देखे जा रही थी! कभी हाथों को बड़े प्यार से ऊपर घुमाती तो कभी आँखें। जैसे एक-एक कपड़ा उनके लिए एक-एक दास्तान बना हो। थोड़ी देर उसे निहारने के बाद वो उठी और इस काम को करने की ठान ली शायद इसका दूसरा कारण ये भी रहा कि आज वो अपनी नौकरी से रिटायर भी हो रही थी। बड़े दिनों बाद उन्हें घर में रहकर अपनी चीज़ें सँवारने का मौक़ा भी मिला था। उन्होंने जोरों से कहा मैं एक बक्सा खरीदूँगी मगर कौन सा लेना है? कैसा होगा, कहाँ से लेंगे, कितने का होगा, क्यों ले, क्या रखना है, कहाँ रखना है, बेकार है, अच्छी कम्पनी का, न जाने अनेक तरह की बातों में दिन कब गुजर गया पता ही नहीं चला लेकिन शाम होते ही दादी को फिर अपने बक्से की याद सताने लगी। बस फिर क्या था दादी ने मम्मी से कहा, ‘सुन शकुन्तला तुझे मेरे साथ चलना है।’ मम्मी दादी की बात पर हमेशा सतर्क व चैकन्ना हो जाती हैं। वो तुरंत ही बोलीं, ‘हाँ, चलिए!’ और वो ही क्या घर, गली, रिश्तेदार सभी हिल पड़ते है उनकी आवाज़ पर।

मैं और मेरे घर की घड़ियां

वैसे तो मेरा नाम सिमरन है और 13 साल की हूँ पर ज़ेहन में पनपते वो ख्याल जिन्हें चाहते हुए भी मैं कभी छुटकारा नहीं पा सकती अक्सर मैं खुद से ही इतनी बहस में लगी रहती हूं कि कई बार मुझे दादी भी डांट देती है कि तू किस दुनिया में खोई है पर पता नहीं कब मैं इस आदत से छुटकारा पाऊंगी। घर में दादी हो या छोटा भाई (पवन) या पापा जिनके साथ मेरा बहुत करीबी रिश्ता है।

पवन, जो चौथी क्लास में पढ़ता है। कहने को तो मुझसे छोटा है पर लड़ने में मुझसे भी तेज़ है। कई बार मैं कुछ खेलने के लिए सामान उठाती हूं तो वो उसी वक्त उस सामान को लेने के लिए उठेगा। अगर मैं नहीं दूंगी तो मुझे दादी से डांट खिलवाएगा। गुस्से में कई बार मैं उसे चांटा भी मार देती हूं। जब लड़ने के बाद हम दोनों अलग हो जाते है तो मुझे अफसोस भी होता है कि मैंने क्यों उसे मारा आखिर मेरा एक ही तो छोटा भाई है जिसे मैं अपनी हर बात बताती हूं। अपने स्कूल के किस्सों को लेकर कोई भी बात हो हम मजे से बैठकर करते है लेकिन हम दोनों का लड़ने का केवल एक बहाना है क्योंकि लड़ने के तुरंत बाद वो फिर से कुछ न कुछ शैतानी करने लगता है और मैं तेजी से उसकी उन हरकतों पर हंसने लगती हूं।

उसका सपना है कि वो बड़ा होकर खूब पैसे कमाएं। खेलने में वो बहुत ही तेज़ है। कई बार अगर हम दोनों गली में रेस लगाते है तो वो मुझे भी हरा देता है। हम दोनों रात को दादी के साथ सोने के लिए खूब झगड़ा भी करते है फिर भी वही दादी के पास सोता है। कभी-कभार अगर वो भूल जाता है तो मैं जल्दी से जाकर दादी के पास सो जाती हूँ।

दादी जो हम दोनों को रात में सोते वक्त कहानी सुनाती है मुझे उनकी एक कहानी बहुत अच्छी लगती है। अक्सर जब भी मैं नाराज़ हो जाती हूँ या कई बार गुस्से से खाना खाने से मना कर देती हूँ तो मुझे दादी प्यार से सहलाते हुए हाथ में एक रुपया थमाते हए कहती है, ‘सुन... एक था राजा, एक थी रानी। एक बार राजा शिकार के लिए जा रहा था रानी उससे पूछती है, तुम कहां जा रहे हो? राजा बोलता है अभी आ रहा हूं। रानी पूछती रह जाती है और राजा चला जाता है। इस बीच दादी एक सवाल पूछती है, ‘कहां गया राजा?’ मैं अपने आंसूओं को पोंछते हुए कहती हूं, दादी जंगल गया शिकार करने! सुनकर झुर्रियों से भरे उनके चेहरे पर धीमी सी मुस्कुराहट जो मेरे उन आंसूओं की धारा को रोकती आ जाती है। दादी जो एक मम्मी की तरह हमें प्यार करती है दादी के हाथ के बने कड़ी-चावल और गाजर का हलवा मैं बड़े शौक से खाती हूँ। कई बार जब दादी की तबीयत खराब हो जाती है तब मैं खाना पकाती हूं लेकिन हमेशा दादी ही पकाती है। साठ साल की उम्र में भी दादी खूब फुर्तीली है। सुबह जब स्कूल जाती हूं तो दादी ही मुझे प्यार से उठाते हुए कहती है, ‘उठ जा सिमरन!’ फिर मुझे नाश्ता कराकर स्कूल भेजती है। वैसे तो घर में सभी मुझे कहते है लेकिन स्कूल व दोस्तों में मुझे जानवी कहकर पुकारते है। मैं पांचवीं क्लास में पढ़ती हूँ। मेरा सपना है कि मैं बड़ी होकर टीचर बनूं। वैसे तो हर किसी के सपने होते है कुछ न कुछ बनने के लेकिन पता नहीं उनके वो सपने पूरे भी होते है या नहीं। पर मैं अपने इस सपने को पूरा करने के लिए अभी से ही जुगत में लगी हूं। पापा, घड़ी का काम करते है। पुरानी घड़ियों को नया बना देते हैं। टूटी, फूटी, बेकार ये शब्द उनके लिये कुछ भी नहीं है। इसलिये हमारे घर में घड़ियों की कोई कमी नहीं है। साथ ही साथ उनमे से कुछ बोलती घड़ियां तो हर एक घंटे के बाद में जुगलबंदी करती है। जैसे बताती हो की मेरी आवाज़ में तुझसे ज्यादा दम है। मुझे उन्हे सुनना अच्छा लगता है। पापा सुबह जाते है और रात को आते है। वैसे तो पापा हमारी हर बात मानते है लेकिन जब उन्हें गुस्सा आता है तो सभी शांति से बैठ जाते है। मम्मी जिनकी तो आज तक न मैंने शक्ल देखी है, न कभी मां का प्यार पाया है। कई बार जब औरों की मम्मी को देखती हूं तो आंखों में आंसू तो आ जाते है लेकिन देखकर मन खुश भी हो जाता है।  सोचती हूं काश मां होती और वो भी मुझे इतना ही प्यार करती। मां की कमी पहले ज्यादा खलती थी पर अब नहीं। दादी और पापा ने मां से भी बढ़ कर प्यार दिया है। शायद अगर वो भी होती तो भी दादी और पापा से बढ़कर प्यार न दे पाती। मां मुझे छोड़कर चली गई। कई बार सोच-सोच कर दम घुटता है कि वो हम दोनों भाई-बहन को छोड़कर कैसे चली गई। महीने में बुआ चक्कर लगाती रहती है। जब कभी मां की बहुत याद आती है तो बुआ से फोन पर बात कर लेते है। वैसे दादी मेरे और पवन की आंखों में आंसू आने ही नहीं देती। पापा हमारी हर ख्वाहिश को पूरा करते है।

मैं और मेरी घड़ियां अब बातें करते हैं। वो म्यूज़िक बचाती हैं और मैं उनपर अपना गाना गुनगुनाती हूँ। मैंने घड़ियों के ऊपर एक कविता भी लिखी है। पर अपने दोस्तों के अलावा कभी पापा को नहीं सुनाई। पर एक दिन सुनाऊगीं जरूर

सिमरन

स्कूल में कुछ ऐसी जगहें भी

हर जगह स्कूल रूटीन में अपनी एक पहचान लिए हुए है। ये साइंस लेब है, ये लाइब्रेरी, ये ड्राइंगरुम और ये मैदान। इससे आगे कुछ नहीं पर इन जगहों की सीमा से बाहर भी कुछ ठिकाने है जो हमारी बेचैनियों को बाँटने का अड्डा बनते हैं। जहां हम एक-दूसरे से बतियाते, खेलते और वक्त बिताते हैं।

जब क्लास की नीरस खाली दीवारें बोर कर देती तो हम इन जगहों की तरफ़ बढ़ चलते। गैलरी के पास बड़े-बड़े गोल छेदों वाली वो दीवार मुझे भी कुछ ऐसे ही बुलाती है। गर्मियों में उन छेदों से ठंडी हवा के झोंके अंदर आते है और सर्दियों में धूप उस दीवार से छनकर फर्श पर एक खूबसूरत डिजाइन में फैल जाती है। हम ठिठुरते हुए उस धूप में गुट बनाकर बैठ जाते है। फर्श की धूल को फूँक मार कर उड़ाते और एक घेरा बना लेते। कभी-कभी लूडो बीच में रखकर एक-दूसरे से शर्त लगाते "चल देखते है कौन जीतेगा?”

आधी छुट्टी का पूरा समय और कई बार तो खाली पीरियड भी वही गुजरता। पेपरों के वहाँ अपनी किताबें लिए कुछ बच्चे बैठकर पढ़ते दिखाई देते तो कुछ बातें करते हुए अपना काम पूरा कर लेते। जगह पर जाए बिना तो अब मन ही नहीं लगता। जब कभी हाउसवाली लड़कियाँ वहां ड्यूटी देती है और हम अपनी क्लासों में कैद हो जाते है। बस तब ही वो जगह सूनी नज़र आती है वरना तो चढ़ने उतरने वाली और दीवार के झरोखे से बाहर का नज़ारा देखने वालों का तांता वहाँ लगा ही रहता है।

मुझे आज भी याद है एक रोज़ हम सब वहीं बैठे थे हमारे बीच 16 पर्ची का खेल चल रहा था। खेलते-खेलते हमें काफी देर हो गई थी। आधी छुट्टी कब बंद हो गई पता ही नहीं चला। हमारे पास बातों की एक बड़ी सी पोटली थी जिसमें से हम कुछ न कुछ बांटते भी जा रहे थे कि अचानक रेखा मैडम ने दूर खड़े होकर जोर से सीटी बजाई। हम सब जैसे अपनी जगह पर खड़े-खड़े हिल गए। पीछे मुड़कर देखा तो उनके हाथ में एक मोटा सा डंडा था जिसे लिए वो हमारी तरफ़ ही बढ़ रही थीं। फिर तो हमने भी जो रफ़्तार पकड़ी की एक-दूसरे को भी भूल गए और धक्का-मुक्की करते हुए वहाँ से फ़रार हो लिए। बाद में क्लास में जाकर हम खूब हँसे।

अब हम जब भी उस जगह बैठते थे बड़े होशियार रहते थे। हमेशा ये खबर रखते थे कि कहीं मैडम तो नहीं आ रही पर कुछ भी हो हमने वहाँ जाना नहीं छोड़ा जिस तरह स्कूल के बाकी ठिकानों पर एक रौनक लगी रहती उसी तरह हम अपनी इस जगह को भी जिंदा रखते। आधी छुट्टी के समय बच्चों की भीड़ से घिर जाने वाला वो कोना भी कुछ ऐसी ही रंगत लिए रहता है। जहाँ बैठने के लिए टाइलों वाला एक बढिया सा सीढ़ीदार चबूतरा और शहतूत का बड़ा सा पेड़ है।

यहाँ सभी अक्सर घनी और ठंडी छाया तलाशते हुए पहुंचते है। पहले जब यहाँ मठरी की दुकान हुआ करती थी तब तो बात ही कुछ ओर थी। ग्रिल के उस पार हथेलियाँ ताने चिल्लाते हुए, ‘आँटी मेरी चार मठरी, आँटी पहले मुझे छः दे दो, नहीं मेरी तीन, अरे भाई सात पकड़ा दे इधर’ ढेरों वो जमघट तब तक वहां बना रहता जब तब कि दुकान पर मठरी खत्म न हो जाती। उसके बाद अपनी सहेलियों के गुट में या किसी खास जोड़ीदार के साथ बच्चे उसी चबूतरे पर बैठ जाते। कोई बातें करता, कोई गाने गाता तो कोई खेल में लग जाता।

आधी छुट्टी बंद होने के बाद भी कुछ लड़कियाँ क्लास में न जाकर दीवार की आड़ में छुपकर वहीं बैठी रहती क्योंकि वहाँ किसी टीचर का आना-जाना कम ही होता है इसलिए एक बेखौफ़ निडर ठिकाने के रुप में वो जगह ज़्यादातर साथियों की पसंदीदा है लेकिन इस पसंद को वे सिर्फ़ क्लास से बाहर की जगहों पर ही कायम नहीं रखते, क्लास के भीतर भी कई ऐसे कोने है जहाँ बातचीत की महफिल सजती है। इस महफिल में और भी क्लासों के साथी आकर जुड़ जाते है। यहाँ खिड़कियाँ सिर्फ़ रोशनदान का काम नहीं करती सिर्फ कमरों की हवादार नहीं बनती बल्कि एक नई और खुली दुनिया को ताकने का ज़रिया बनती है। इन खिड़कियों से जैसे बाहर के नज़ारे स्कूल में उतर आते है या स्कूल में बैठी एक नज़र दूर किसी सफ़र पर निकल पड़ती है तभी तो सुबह क्लास में झगड़े का विषय यही होता है कि खिड़की के साथ वाले डेस्क पर कौन बैठेगा!

गदरु अक्सर अपनी सहेलियों से इसी विषय पर बहस करती नज़र आती है। सुबह एक बेंच खिसकाकर वह खिड़की के पास लगाती है और शान से वहाँ बैठ जाती है। उस खिड़की से स्कूल के पीछे की गली नज़र आती है। उस गली से गुजरने वाले फेरीवालों व लोगों को गदरू दिनभर देखती रहती है। वहाँ की आवाज़ों को ध्यान से सुनती रहती है। उसे लगता है माना वह अपनी ही गली में बैठी है। ऐसे में स्कूल उसके लिए जरा ज़्यादा मजेदार बन जाता है जहाँ वो खुद को बँधा हुआ महसूस नहीं करती।

अलीशा

Tuesday, 9 July 2013

उनका बार-बार आना

"अरे बेटा, ऐसे ही बोलते है ये! इन्हें कुछ याद नहीं।" कहते हुए अपने दोनों हाथों से साड़ी के पल्लू को उठा सर पर रखती हुई वह बाबा की ओर निहारने लगी। जिनकी मोटी-मोटी आंखें और सिकुड़ती हुई सी सफेद भौंहे बिल्कुल स्थिर सी बस सामने ही उस हरी सी दीवार को देखे जा रही थी जिस पर पड़े ढेरों निशान और मटमैला सा रंग शायद उन्हें अपने और उनके सफ़र का अहसास करवा रहा था । फूले हुए होंठों के ऊपर से गुजरती सफेद मूंछे अपने अंदरुनी गुस्से को और तेजी से बयां कर रही थी जिसके साथ दिखाई पड़ता वो फूला हुआ चेहरा जो न जाने उनके गुस्से का कारण था या फिर अपनी खुद की उस तन्हाई का जिसे मैं पूरी तरह से तन्हा तो नहीं कह सकती क्योंकि उनकी उस तन्हाई में उनकी हमनवां भी शामिल है पर फिर भी इस दरमियां रिश्ते के बीच कुछ खामोशी है जिसे ये लफ़्ज बयां कर रहे थे। कोई मेरे पास नहीं बैठता, "क्यों मैं क्या अब इतना बुरा हो गया हूं जो मेरे ही बच्चों को मेरे पास आने से शर्म आने लगी है?”

"पूछो तो जरा इनसे क्या कमी है मुझमें?” एक ही सांस में बोलते हुए उनका पूरा शरीर  हिल गया और हाथों में थमी लाठी को पैरों के बीच टिकाते हुए वह दोबारा से बोल उठे, "बड़ी मुश्किल से ढूंढ़ा था इन्हें मैंने। मुझे गांव छोड़कर आ गए थे ये। दोपहर का वक्त था। मैं अपने घर के बाहर चारपाई डाले लेटा हुआ था। लेटे-लेटे आंख ऐसी लगी कि एक बजे का सोया हुआ सात बजे सोकर उठा। सीधा इन्हें आवाज़ मारी।"

चारपाई के बगल में सिकुड़कर बैठी हुई अपने हमराही की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा, "पर उस पल इनकी भी आवाज़ न आई। यह माहौल देख मैं थोड़ा घबरा गया क्योंकि अक्सर मेरे आवाज़ न मारते ही ये तुरंत ही निकलकर आ जाया करती थी पर उस दिन इनकी आवाज़ आई और न ही मेरे दोनों बड़े बेटे व बहु दिखाई दिए। खड़ा होता हुआ मैं पूरे कमरे में घूम आया पर कहीं पर भी कोई नहीं था। पता है क्यों?”

आंखों को घुमाते हुए मेरी ओर देखकर वो कुछ पल शांत हो गए। शायद इसलिए कि वो मेरे बोलने का इंतज़ार कर रहे थे। उनकी विनम्रमा सी आंखें मुझे ही ताड़ने लगी थी पर मैं तो खामोश सी बैठी हुई कुछ अजीब से ही ख्यालों में जी रही थी लेकिन उनका मेरी ओर ही देखे जाना मुझे अहसास करवा रहा था कि वह अब मुझसे सुनना चाहते है पर बातचीत नहीं सवाल!

‘क्यों’ जिज्ञासा को जगाते हुए मैंने पूछा।

"ये सारे मुझे गांव में अकेला छोड़कर दिल्ली भाग आए थे। दुःख इस बात का नहीं है कि ये क्यों आए, दुःख तो इस बात का है कि इन्होंने मुझे क्यों नहीं बताया।"

"अरे बेटी, इनकी यादस्त चली गई है। भूल गए है ये सब कुछ, हम तो चाली साल से यहां रह रहे है। भला इन्हें छोड़कर कहां जायेंगे। सब बीमारी का असर है, ये!” पीछे से बुड़बुड़ाती हुई अम्मा, उनकी हर एक बात के आगे अपनी ज़बान खोल बैठती। आंखों को मिचती हुई घुटनों पर हाथ टिकाए वो हर बार उनकी बीमारी का इज़हार किए जा रही थी। जैसे ही मेरा सवाल उन तक पहुंचता वैसे ही वो मेरे बतौर उन्हें समझाने लगती- "पूछ रही है कब आए थे, तुम यहां?”

उन्हें बोलने के लिए लगातार निहारे जा रही थी। चश्मे के अंदर से झांकती छोटी-छोटी आंखों को कभी मेरी ओर मटका कर अपनी ताकत का अहसास करवाती, तो कभी हाथों का चलता इशारा उन्हें अपने हमसफ़र को उनकी यादों में ढकेलने पर मजबूर कर देता।

"अभी बताया तो था 50 साल की उम्र में आया था मैं यहां! वो भी अपने इस परिवार की खोज में। धोखा दिया था इन्होंने मुझे, वो तो ईष्वर की कृपा है जो मैं यहां चला आया। प्रेम है मुझे अपने इस परिवार से, पर अब किसी को मेरी परवाह नहीं। कोई नहीं बैठता मेरे पास!”

हर पल उठता उनका ये सवाल मुझे खामोशी में डूबोता जा रहा था। मेरे खुद के लिए ये समझना मुश्किल था कि मैं उन्हें क्या जवाब दूं जहां ये पेचीदा सवाल मेरी चुप्पी बन गया था। वहीं बाबा की कुर्सी के साथ टेक लगाए बैठी अम्मा आंखों को झुकाती हुई सर पर हाथ टिकाए उनके बोलने के साथ खुद खामोशी में डूबने लगी थी।

उनका बोलना शायद अम्मा के लिए बेहद आरामदायक था क्योंकि अक्सर अपने इन हमसफ़र की खामोशी उन्हें बेहर परेशान करती है। वो नहीं चाहती कि बाबा खामोश, बिल्कुल चुप रहे। हमारे बीच पनपती खामोशी से पहले ही वह उसे तोड़ चुकी थी।

"बेटी किताब भी लिखी है इन्होंने। पूछो इनसे।" अचानक से मुझे छूते उनके इस सवाल ने मेरी जिज्ञासा को बढ़ा दिया।

"किताब... कौन सी?” आश्चर्य के साथ कहते हुए मैं बाबा की ओर निहारने लगी। मेरी ललक को देख शायद वो ही नहीं अंदर किचन में काम कर रही हेमा दीदी भी उत्तेजना से भर चुकी थी। दरअसल हेमा कोई और नहीं उनकी सबसे बड़ी पोती है, जो अपने काम को छोड़ मुस्कुराती हुई अंदर से बाहर निकली और मेरे हाथ में एक लाल रंग की किताब थमाते हुए बोली, "ये हमारे दादा की है।"

"अच्छा" कहते हुए मैंने बड़ी हैरानी के साथ उस क्रीम कलर की किताब की ओर देखा जिसमें ऊपर नीले रंग से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा हुआ था ‘कुषवाहा वंश परिचय’ और बीच में बना राम-लक्ष्मण व घोड़े का चित्र जिसे देखकर तो लग रहा था कि जरूर इसमें रामायण की गाथा होगी। ये सोचते हुए पलकें झपकी तो और गहरे अक्षरों में लिखा हुआ पाया ‘राधे श्याम कुषवाहा’ यानी उनका नाम। यह सब पढ़कर मैं बड़ी हैरानी के साथ उस किताब को ही देखे जा रही थी जिसे लिखने वाला मेरे सामने ही है। ये सोचकर मेरे लिए अपने कानों पर विश्वास करना थोड़ा ही नहीं काफी मुश्किल था!

आरती

Wednesday, 19 December 2012

दक्षिणपुरी में एक महफिल


अनुभवी लोगों के संवाद के बाद में ये पहला दिन था।

यादें, सपने, आसपास, माहौल, फैसले, कारण, कामयाबी, सफ़र, शादी, परिवार, स्कूल, बचपन, जवानी, काम, पैसा, किराया, फिल्म, नाटक, टीवी, पर्दा, दिनचर्या, दिलचस्पी, हिदायतें, रविये, कल्पनाएं, लड़ाईयां, झगड़े, घटनायें, किताबें, डर, चेतावनियां, चोरियां, छतें, रातें, सरकारी लाइनें, काल्पनिक दीवारें, अपने मन मुताबिक बर्तन, अपनी पसंद के जूते और बेकर चीज़ों से औजार बनाना जो शायद उनके खेलने के काम में आये लेकिन लोगों से बातचीत करने के बाद में सभी एक बार फिर से किताब के अनेकों किरदारों के बारे में बोल रही थी।

वे किरदार जो कभी वे खुद ही थी। जीवन के अनेकों पल जो कहीं छिटक गये थे उन्हे पकड़कर लाना इतना आसान नहीं होता लेकिन याद रखने से ज्यादा मिठा सफ़र याद करने का होता है। जो यहां पर था।

दक्षिणपुरी की सारी दादियां जो अपने अनुभवों के किस्सों को इस तरह से सुनाती आई हैं कि वे उनके बारे में नहीं है वे तो वो किरदार हैं जो कहीं थे ही नहीं। फिल्म देखना, छुपना, निजी फैसले लेना सब किसी और पर डालकर सुनाना जीवन के याद करने के सफ़र को और मिठा बना देता है।

आज उसी सफ़र पर उतरने का दिन था।  

पिंकी 

तनहा सी लाइब्रेरी

कुछ कहने की कोशिश में उस दिन आधा वक्त गुज़ार दिया था लेकिन पता था कि सवाल निहत्थे ही लौट जाएंगे, इसलिए खामोश रही। पुरानी फटी जिल्द वाली किताबों के ढेर में से उठाकर एक उन्होंने मुझे भी दे दी, फिर रजिस्टर के पन्ने पर मेरा नाम लिखा और कहा, ‘दो हफ्ते बाद लौटा देना।’ उसके बाद वो उचकी हुई पलकें वापस चश्मे की तरफ़ झुक गई और सुस्त अलमारियों में रखी उन गुमसुम सी किताबों पर मेरी नज़र घूम गई, जो शीशे के उस पास से झाँकती हुई ऐसी लग रही थी मानो कार के बंद शीशों में कैद एक चेहरा, जो अपनी आवाज़ होते हुए भी बाहर वाले को सुनाई नहीं देता। अलमारी से नज़र फिसली तो हाथ में किताब को लिए मैं उस कमरे से बाहर चली आई जिसे स्कूल की लाइब्रेरी कहते हैं। बाहर चौखट में लगी जूतों की कतार में से अपने जूते पहचानने लगी। जूते पहनने के लिए झुकी तो वो मरियल सी किताब हाथ से छूटकर नीचे गिर गई। बस तभी उसके चेहरे पर नज़र पड़ी थी। किताब का नाम था ‘अंतरिक्श की सैर।’ काले बैकग्राउंड वाले उसके गत्ते पर पृथ्वी, चाँद और न जाने कितने ही उपग्रह बने हुए थे। उस वक्त आकाशगंगा में जाने का मन नहीं था। बस फिर क्या था क्लास में जाते ही उसे बस्ते की जेब के हवाले कर दिया।

दो हफ्ते तक मानो वो किताब उस जेब में एक नए अंतरिक्श की सैर करती रही और ठीक दो हफ्ते बाद अपने ठिकाने पर पहुँच गई यानी मैडम के पास, उनकी उसी अलमारी में। वो दिन था जब मैंने लाइब्रेरी का एक नया मतलब जाना था। एक ऐसी लाइब्रेरी जहां न तो पाठक अपने लिए किताबें चुनता है, न ही किताबें अपने पाठक चुनती हैं, लेकिन फिर भी कोई है जो इस लेन-देन को लाइब्रेरी की इस पहचान को कायम रखता है। वो याद, वो सवाल आज मन में फिर से ताज़ा हो गए थे क्योंकि संगीता मैडम हिंदी की कविताएँ ढूंढ़ने के लिए काफी बेताब थीं।

‘‘चलो लाइब्रेरी चलकर देखते हैं, शायद कुछ मिल जाए।’’ एक लम्बी गुफ्तगूं के बाद अपनी कुर्सी से उठते हुए उन्होंने कहा और कमरे से बाहर निकली। उनकी थकी हुई आँखों में शायद ही कोई दिलचस्पी थी लेकिन कदमों की तेज़ी देखकर लग रहा था कि वह ठान चुकी हैं, आज तो वहीं से कुछ खोज निकालेंगी। स्कूल के उस अंधेर गलियारे में, मैं उनके पीछे-पीछे चल दी थी। वो अपनी कश्मकश में खोई ज़बान पर कुछ कवियों के नाम दोहराती जा रही थीं। तभी पीछे मुड़कर बोली, ‘‘इस बार कॉम्पीटिशन में तुझे ही फर्स्ट आना है, ठीक है।’’ पता नहीं ये सवाल था या फरमान। पर मैं कहीं ओर थी इसलिए ‘हाँ’ में गर्दन हिला दी। ख्याल ज़ेहन में लगातार अपनी दौड़ लगा रहे थे। लाइब्रेरी को लेकर सालों पहले ही अपनी सोच में एक खाका बुन चुकी थी मैं, लेकिन फिर भी लग रहा था कि शीशे की अलमारियों से झाँकती वो किताबें आज तो खुद को रोक नहीं पाएंगी। आखिर प्रेमचंद, अज्ञेय और यशपाल कब तक अपनी रचनाओं को बोलने से रोकेंगे, हम तो बाहर से ही देख-देखकर हैरान हुए जाते थे।

अरे देख कितनी मोटी है, वो चुटकुलो वाली। उसमें जीवनी है, वो कविताओं से भरी। यूं तो मैडम रोज कहतीं कि किताबें तुम्हारी दोस्त हैं, उनमें ज्ञान का अथाह सागर है लेकिन लाइब्रेरी की किताबों के करीब जाते ही न जाने कहाँ से अनुशासन और सीमाएँ बीच में आ जाती हैं। छोड़ने, बिगाड़ने, उठाने-धरने और पलटने वाले हाथों से परे हमेशा एक तन्हाई में जीती है। वक्त-बेवक्त उनके करीब जाना उन्हें छेड़ना-उठाना वर्जित है, ऐसा स्कूल कहता है लेकिन आज शायद ये पाबंदी टूट जाए। आज तो उन्हें छेड़े बिना काम बनेगा ही नहीं। सोच अचानक थम गई जब आगे चलती हुई मैडम ने कहा, ‘‘बेटा तुम यहीं रूको, मैं लाइब्रेरी की चाबी लेकर आती हूँ!’’ अपना थैला व रजिस्टर मुझे थमा दिया। दरवाज़े पर एक बड़ा सा ताला था जिसे खोल अंदर जाने के लिए दिल बेकरार था। खिड़की से आती हवा के झोंके फर्श की बारीक धूल को उड़ा रहे थे और अंधेर भरी गैलरी में आती थोड़ी बहुत रोशनी के साथ धूल के वो कण खिड़की से आर-पार जा रहे थे मानो उनसे भी ये सन्नाटा बर्दाशत न हो रहा हो। तभी चाबी के गुच्छे में से लाइब्रेरी की चाबी ढूंढ़ते हुए मैडम आ गई और ध्यान से देखने पर एक गोल सिरे वाली छोटी चाबी निकालकर ताले में घुमाने लगी। ताला खट से खुल कर एक तरफ़ झुक गया। मैडम ने दरवाजा खोला और कहा, ‘‘आ जा ढूंढ़ते हैं।’’ दरवाज़ा खुलते ही एक सीलन भरी सोंधी सी खुशबू चारों तरफ़ फैल गई। ठीक वैसी जैसी रद्दी के ढेर में पड़े अखबारों से आती है। अलमारी के शीशों पर जमीं धूल की परत ने मानो खुद को हटाने का इशारा किया और कुर्ते की बाजू, कोहनी तक चढ़ाकर मैडम ने हथेली बचाते हुए उंगलियों की किनारी से दरवाजा खोल दिया। इस आवाज़ से जैसे अंदर कतार में लगी किताबें काँप उठी और थोड़ा सा हिलकर फिर एक-दूसरे पर झुक गई। मैडम ने उन्हें उलट-पुलट कर देखा और रखना शुरू कर दिया। मैं दूर खड़ी इस नज़ारें को देखती रही। दिल चाह रहा था काश मैडम मुझे भी इस काम में लगा लें। अपने चारों तरफ़ की इस दुनिया में न जाने क्यों आज सभी चीज़ें ताज़ातरीन लग रहीं थी।

अचानक मैडम पलटी और बोली, ‘‘अरे तू, ऐसे क्यों खड़ी है। चल मेरी मदद करवा! देख उन अलमारियों में कौन सी किताबें हैं। किसी में कविताएं मिले तो अलग रख लेना।’’ सुनकर मेरे स्थिर कदम अपनी जगह से हिले और मैं सामने अलमारी की तरफ़ दौड़ पड़ी। मेरे बेताबी मेरे मचलते हाथ साफ बयां कर रहे थे। मैंने तेजी से किताबें उठाना और देखना शुरू कर दिया। कुछ मोटी, कुछ पतली, कुछ छोटी, कुछ बड़ी हर तरह की किताबें एक साथ एक भीड़ में कंधे से कंधा मिलाए खड़ी थी। तभी एक मोटी, सफेद किताब पर नज़र पड़ी, नाम था - राश्ट्रीय गीत। अंदर बहुत सारी ओज रस और वीर रस वाली कविताएँ थीं, उन्हें उठाकर साइड में रख दिया। पीछे मैडम भी अपनी धुन में मस्त थी। चुन्नी को कुर्सी पर रख वो सारी अलमारियों के दरवाजे खोलते हुए बोली, ‘‘उफ... ये वीरा मैडम ने क्या कर रखा है! कितनी धूल है।’’ उनकी आवाज़ खरखराने लगी और फिर आँखें मलते हुए पीछे हट वो जोर-जोर से खाँसने लगीं। उसके बाद कुछ पलों के लिए लाइब्रेरी फिर से खामोश हो गई। सब कुछ अपनी रफ्तार से चल रहा था। लाइब्रेरी के साथ किताबों का इतना बड़ा खजाना है आज पहली बार महसूस हो रहा था वरना लाइब्रेरी का पीरियड बस जूते उतारने और उन्हें पहनकर वापस क्लास में आ जाने का समय लगता था। जो शायद क्लास की गिरफ्त से निकलने का एक अच्छा मौक़ा हुआ करता था। सोचते-सोचते हाथ अचानक रुक गए, जब दहलीज़ पर किसी के आने की आहट महसूस हुई। अचानक कोई पीछे से चिल्लाया, ‘ये क्या हो रहा है! कितने बोला अलमारी खोलने को!’’ सुनकर दिल धक सा रह गया। देखा तो पीछे लाइब्रेरी की मैडम वीरा बजाज खड़ी थी। उनकी चढ़ी हुई भौंहे, चेहरे पर गुस्सा था। मैं समझ नहीं पाई की क्या कहूं। सामने खड़ी संगीता मैडम की तरफ़ देखने लगी। वीरा मैडम मुझसे पलटकर संगीता मैडम की तरफ़ घूमी। मैडक के चेहरे पर फीकी सी मुस्कान थी। वीरा मैडम ने उन्हें देखा और कहा, ‘‘ये क्या संगीता, बच्चों को क्यों किताबें छेड़ने देती हो। इनका क्या भरोसा, कुछ गायब हो गया तो जवाब हमें देना पड़ता है। इन अल्फ़ाज़ों को सुनकर मेरी आवाज़ जैसे गायब हो गई, नज़रें फर्श के कालीन पर झुक गई और लगा जैसे अपना कहकर आज स्कूल ने फिर से ज़लील कर दिया है।

मैं अपने आपमें खोई कमरे से बाहर चली आई और क्लास की तरफ़ बढ़ने लगी। सवालों का वो कारवां फिर से अपने सफ़र पर चल पड़ा जो अपने जवाब आज तक नहीं ढूंढ़ पाया था। तभी पीछे से आती कांता मैडम की आवाज़ ने मेरे कदमों को रोक दिया। वो मुस्कुराती हुई मेरे करीब आई और पर्स में से नीली चाबी निकाल मेरे हाथ में थमाते हुए ‘‘लो बेटा मेरा सामान ऊपर स्टाफ रूम में मेरे लॉकर में रख आओ।’’ कहते हुए आगे बढ़ गई। मैं एक अजीब सी दुनिया में खोई वहीं खड़ी उन्हें देखती रही।

टीना