Friday, 5 February 2016

आम लड़की

हेमा हम सबकी तरह एक आम लड़की थी, परंतु उसने बचपन से दुख ही देखे थे। सुख का अनुभव भी नहीं था। हेमा बचपन में ही अपने पिता से किसी कारणवश दूर हो गई। वो अपनी मम्मी के साथ नाना के घर रहती थी। उसके दो छोटे भाई थे- एक का नाम भोला था और दूसरे का शिक्का। उसका नाम तो अरुण था पर प्यार से सब उसे शिक्का कहते थे। हेमा की मम्मी स्कूल में खाना बनाती थी। खाना बनाने के साथ-साथ वह घर का तथा जानवरों का पूरा काम करती थी। हेमा ने अपनी मम्मी को कभी आराम करते नहीं देखा था। हेमा की मामी जी मानसिक रूप से कमज़ोर थी। इसलिए सारा काम हेमा की मां को करना पड़ता था। हेमा ने जब से होश संभाला वो अपनी मां के साथ घर के तथा खेतों के काम में हाथ बंटाने लगी। जब हेमा 7 साल की हुई तो उसके नाना ने उसका दाखिला गांव के स्कूल में करवा दिया। स्कूल हेमा के घर से नजदीक में था इसलिए हेमा का ध्यान स्कूल में कम घर में ज़्यादा रहता था।

उसे पढ़ाई के नाम से ही चिढ़ थी। जब भी उसे मौक़ा मिलता घर भागने की कोशिश करती रहती। उसके स्कूल का काम कभी पूरा नहीं होता था। जब भी टीचर पूछती कि हेमा गृहकार्य क्यों नहीं किया तो उसका एक ही जवाब रहता कि कपड़े धो रही थी, बत्र्तन धो रही थी। जानवरों के लिए चारा लेने खेत पर गई थी आदि। अनगिनत बहाने उसके पास तैनात रहते थे। कुछ समय तक ऐसा चलता रहा फिर एक दिन टीचर ने हेमा के नाना को बुलाया और उनसे पूछा कि आप हेमा से काम क्यों करवाते हैं, अभी उसके खेलने-कूदने की उम्र है न कि चैका-चूल्हा संभालने की।टीचर के मुंह से ऐसे वचन सुनकर उनका चेहरा सफेद पड़ गया मानो उन्हें कुछ पता ही न हो। जब उन्होंने घर जाकर नानी की पूछा तो पता चला कि नानी हेमा से जान-बूझकर काम करवाती हैं। नाना ने उन्हें बहुत डांटा तथा हेमा को प्यार से समझाया कि स्कूल जाना अच्छी बात होती है, पढ़ने से व्यक्ति का जीवन अच्छा बनता है। हेमा ने मासूमियत के साथ कहा, ‘नाना जी, मम्मी को अकेले काम कन्नो परैगो। जब मम्मी घर को, पौहेन को और स्कूल में खाना बनानो सब काम उन्हीं पै आ जाएगो, मम्मी तो वैसेऊ बहुत चिंता करती है।नाना के बहुत समझाने पर हेमा स्कूल जाने लगी।

एक दिन हेमा स्कूल नहीं आई। टीचर के पूछने पर एक लड़की ने बताया कि वो अपने पापा के घर गई है। उसके पापा उसे बुलाने आए थे इसलिए वो चली गई परंतु विमला बुआ, भोला और सिक्का यहीं हैं, वो नहीं गए। हेम आठ महीने पापा के पास रही। जब वहां से लौटी तो एकदम गोल-मोल, क्यूट सी बहुत सुंदर लग रही थी। रोज़, एक से एक नए कपड़े पहनती थी। मैं, शीतू तथा कक्षा के और बच्चे हेमा से बहुत कम बोलते थे पर दो दिन बाद जब वो स्कूल आई तो हम सबसे बहुत अच्छे से बोली। पहले बोलना तो दूर हम सबकी तरफ़ देखती भी नहीं थी क्योंकि उसकी नानी का कहना था कि वो ब्राह्मण है और हम अन्य जाति के। हम सबको इस बात का बेहद आश्चर्य था कि पहली बार हेमा ने अपनी नानी की कोई बात नहीं मानी थी। हेमा जबसे अपने पापा के पास रहकर आई थी, वो बेहद समझदार हो गई थी। मैंने सुना था कि उसके पापा खुले विचारों के व्यक्ति थे। वे जात-पात पर विश्वास नहीं करते थे। हेमा की पढ़ने में रूचि देख हमारी कक्षाध्यापक श्रीमान अजय भी चकित व हैरान थे कि जिस हेमा को पढ़ाई के नाम से चिढ़ थी उसे आज पढ़ने में इतनी रूचि देख मास्टर जी भी बहुत खुश थे क्योंकि एक तरह से उनकी मेहनत रंग लाई थी।

कुछ समय बाद वार्षिक परीक्षा थी। परीक्षा परिणाम सुनकर हम सब हैरान थे कि हेमा ने कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। हेमा बहुत खुश थी पर उसकी ये खुशी ज़्यादा देर तक न रही क्योंकि उसकी नानी घर का काम न होने की वजह से आगबबूला हो रही थी। स्कूल से जब हेमा घर की दहलीज़ पर कदम रखा ही था कि नानी ने डंडे से उसे बहुत मारा। हेमा ने रो-रोकर घर का सारा काम किया। जब हेमा खेत पर चारा लेने जा रही थी तो मेरी दादी ने बुलाया उसके घाव देखे। कुल 18 जगह हाथ-पैरों पर उसके नील पड़े थे। दादी ने उसे हल्दी वाला दूध दिया। हेमा ने पहले तो मना किया पर दादी के कहने पर बाद में दूध पी लिया। कुछ देर उसने घर पर आराम किया। मेरे चाचा तो बैलगाड़ी पर चारा काट कर लाते थे। चाचा एक बार में इतनी चारी काट कर लाते थे कि जानवर तीन छाक खाए। उस दिन भी चाचा चारी लाए, दादी के कहने पर चाचा ने एक गठरी चरी हेमा को दे दी। हेमा घर गई तो नानी ने खरी-खोटी सुनाई, गालियां दी और सांझ को खाना तक नहीं दिया, बेचारी भूखी ही सो गई। दूसरे दिन स्कूल था। सरकारी स्कूल था इसलिए हम सबको वहीं से खाना मिलता था। हेमा से आधी छुट्टी तक का इंतज़ार नहीं हो रहा था पर जैसे-तैसे उसने अपनी भूख पर काबू किया। आधी छुट्टी हुई तो सभी बच्चे हाॅल में पहुंच गए। उस दिन खाने में दाल-रोटी बनी थी। जब हम हाॅल में पहुंचे तो देखा कि कम से कम तीन सौ बच्चे खाने की लाइन में लगे थे। पूरे हाल में शोर गूंज रहा था। पहले मुझे दो, मुझे दो का शोर गूंज रहा था। शोर सुनकर अजय मास्टर जी हाॅल में पहुंचे। मास्टर जी के पहुंचते ही सभी बच्चे शांत हो गए। मास्टर जी मुझसे बोले, ‘जाओ जाकर खाना बनाने में ताई जी की मदद करो!उस वक़्त मैं ज़्यादा बढ़ी नहीं थी, सात-आठ साल की रही होंगी पर कहते है न कि जितनी छोटी उतनी खोटी वही हिसाब मेरा भी था। पूरे स्कूल में मेरा रौब था। उस वक़्त स्कूल का प्रत्येक बच्चा मेरी बात मानता था इसलिए नहीं कि मैं पढ़ने में अच्छी थी या कोई मुझसे डरता था बल्कि इसलिए क्योंकि सब मेरे दादा जी की बहुत इज्ज़त करते थे और मेरे दादा जी मुझे परेशान या उदास नहीं देख सकते हैं। वो बस मुझे खुश देखना चाहते थे। ये बात गांव के सभी लोग जानते थे इसलिए मुझसे कभी कोई कुछ भी नहीं कहता था इसलिए मास्टर जी ने मदद करने वाली बात मुझसे कही। मास्टर जी की बात अभी पूरी भी नहीं हो पाई थी कि मैं जल्दी से जाकर खाना बंटवाने लगी। मैंने एक थाली में खाना परोसा और हेमा के पास पहुंचा दिया। उसी दिन से मेरी और हेमा की दोस्ती की शुरूआत हुई। उस दिन के बाद हेमा अपनी अच्छी-बुरी यादें, सुख-दुख सब मेरे साथ बांटने लगी। हेमा की मां का तबादला भी हमारे स्कूल में हो गया। अब वो हमारे स्कूल में खाना बनाती थी। हेमा और मैं, कभी-कभी उसकी मां की मदद कर दिया करते थे। हेमा मुझसे दो-तीन साल बड़ी थी इसलिए उसे खाना बनाना आता था, मुझे खाना बनाना नहीं आता था।

मैं, शीतू और हेमा हम तीनों पक्की सहेली बन गई। हम तीनों जब तक स्कूल में रहते, साथ खाते-पीते, साथ खेलते। देर-देर तक बातें करते। हेमा की नानी को ये तो पता था कि मैं उसकी सहेली हूं पर ये नहीं पता था कि शीतू भी उसकी सहेली है। जब हेमा मेरे साथ नहीं होती थी तभी मैं शीते से बात करती थी पर जब ये बात हेमा की मां को पता चली तो उन्होंने हमारी दोस्ती को प्रोत्साहित किया। अब तो हमें किसी बात का डर ही नहीं था। हम तीनों बहुत मस्ती करते थे। हम तीनों ने साथ में बहुत से खेल खेले जैसे गिट्टे, कबड्डी, खो-खो, रस्सा टापना, गिल्ली-डंडा इत्यादि अनेकों खेल खेलें पर हमने कभी लड़कियों की तरह गुड्डे-गुडिया से नहीं खेला, ज्यादातर लड़कों वाले खेल खेलते थे। कड़ी टक्कर देते थे हम लड़को को। एक बार ये बात हेमा की नानी को पता चल गई कि हम तीनों मंदिर के पास गिट्टे खेल रहे हैं। वह गुस्से में भागती हुई आईं, वहीं हम सबके सामने हेमा को शीशम की डंडी से पीटने लगी। उस वक़्त हम कुल ढाई सौ बच्चे होंगे। एक बच्चा भागकर हेमा की मां और मास्टर जी को बुलाने गया। उन्हें आने में पता नहीं कितनी देर लगती, हम अपनी सहेली को इतनी देर पिटते देख नहीं सकते थे। मैंने रिंकू और लालू से कहा तुम दोनों जाकर डोकरी से कैसेऊ करके डंडा छीन लाओ फिर तो हम देख ही लेंगे। वो दोनों लंबे-लंबे थे इसलिए उन्होंने डोकरी के हाथ से डंडा छीन लिया, फिर क्या डोकरी तिलमिला गई। वो दोनों ठहरे छोटे डोकरी के हाथों आने से रहे। उन्हें जा बात समझते देर न लगी कि जा सब मेरी करतूत है तब तक मास्टर जी और हेमा की मां आ गई। हेमा सिसक रही थी। उसकी मां ने उसे जैसे-तैसे चुप करवाया। मास्टर जी ने हेमा की नानी को बहुत समझाते हुए कहा अगर बच्चे साथ रहेंगे तो खेलेंगे-कूदेंगे तो फिर येउनकी उम्र है खेलने-कूदने की पर नानी कुछ समझना नहीं चाहती थी। वो वहां से घर के लिए चल दी और हम सब स्कूल में वापस चले गए। नानी ने जाकर मेरे घर, शीतू, लालू, रिंकू के घर जाकर शिकायत लगा दी। मेरा सारा गुस्सा मेरी दादी पर निकाल दिया। मेरी दादी को उन्होंने खूब खरी-खोटी सुनाई। जब हम सब अपने-अपने घर पहुंचे तो मेरी मम्मी ने पहली बार मुझ पर हाथ उठाया था। तीन-चार थप्पड़ मार दिए और बहुत डांटा और कहा कोई ज़रूरत ना हेमा के साथ रहने की। अब मैंने सुन लिया ना कि तू हेमा के साथ रहती है तो देख लियो तेरी खैर नहीं। मैं थोड़ी देर तक रोती रही। घर से बाहर खेलने नहीं गई। रात को दूध पीकर ही सो गई। खाना भी नहीं खाया। दोपहर को स्कूल से आने के बाद जो खाना खाया सो उसके बाद मार खानी पड़ी। एक गिलास दूध से क्या होता है पर गुस्से में खाना नहीं खाया। सुबह उठकर नहाने के लिए नल पर गई मम्मी ने नल चला दिया और मैंने जल्दी से नहाया, नहाने के बाद चाय पी, नाश्ता किया। फिर तैयार होने के बाद स्कूल गई तो पता चला कि हम पांचों ही कल पिटे थे और लालू, रिंकू, हेमा को उनकी मम्मी ने खाना दिया नहीं। मैंने और शीतू ने खाया नहीं, उस दिन स्कूल में आलू-पूरी बनी थी। मास्टर जी से हमने कह दिया कि सबसे पहले खाना हम पांचों को दिलवाना क्योंकि हमारी पिटाई आपकी वजह से हुई है। मास्टर जी हंसकर बोले, मेरी वजह से कैसे! मैंने कहा कि मास्टर जी अगर आप जल्दी आ जाते तो ये सब नहीं होता। अच्छा जी, हम सब एक साथ बोल पड़े। मास्टर जी बोले, मैंने कहा था न कि अम्मा जी की छड़ी छीन लो मास्टर जी ने हंसते हुए कहा कि अच्छा ये बताओ कि तुम्हारी पिटाई कैसे हुई। लालू बोला, उस खुसड़ बुढि़या ने जाकर हमारे घरों में चुगली कर दी तो पिटना तो था ही। मास्टर जी ने हम पांचों की खाना दिलवाया और अपने सामने बिठाकर खिलाया। ऐसे ही धीरे-धीरे पांच साल बीत गए हेमा की जि़ंदगी में कोई सुधार नहीं आया। मैं दिल्ली चली आई। हेमा वहीं पढ़ती रही। शीतू अपनी दीदी के घर उझयानी पढ़ने चली गई। हम तीनों अलग-अलग हो गए। ग्रीष्मावकाश में हम तीनों गांव में मिलते थे। आठवीं की परीक्षा के बाद हेमा के नाना ने उसका स्कूल छुड़ा दिया। शीतू भी गांव वापस आ गई क्योंकि गांव में भी अब इंटर काॅलेज बन गया था। शीतू ने उसी स्कूल में दाखिला ले लिया इस बार मैंने और शीतू ने नौंवी की परीक्षा में सफलता प्राप्त की। ग्रीष्मावकाश शुरू हुए मैं जब गांव पहुंची तो पता चला कि हेमा की शादी हो गई। ये सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा क्योंकि अभी हेमा सिर्फ़ सोलह साल की थी। मैं अब कुछ कर भी नहीं सकती थी दूसरे दिन मैं और शीतू मास्टर जी से मिलने स्कूल गए। मैंने मास्टर जी से पूछा कि आपने हेमा की शादी क्यों नहीं रोकी! आपको पता था कि यह ब्याह कानून के खिलाफ़ है। मास्टर जी ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि बेटा लड़का बहुत अच्छा है, वो हेमा को सदैव खुश रखेगा। मास्टर जी की बात पर भरोसा करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं था। कुछ दिनों बाद मैं वापस दिल्ली आ गई। जब दोबारा गांव जाना हुआ तो पता चला कि हेमा सच में बहुत खुश है अपनी जिं़दगी में। उसने कभी हार नहीं मानी, कभी टूटी नहीं, दुख से घबराई नहीं बल्कि दुख को अपना मित्र बना लिया।

... शीतल

अपनी खाटें, अपने चबूतरे

वे सभी लोग अपनी खाटें बिछा कर अपने चबूतरे पर बैठे थे तभी भोला आ गई और गली के बच्चे भोला के पीछे भागने लगे। भोला आ-आ। भोला बार-बार बच्चों को मारने के लिए भागती है तभी रामवती अम्मा बोली, ‘अरे ये बालको काहे पीछे पड़े हो जाके तंग न करो नाही तो तुमको तो मारीय! तभी भोला अम्मा के पास आके बैठी और कहा, ‘अरी अम्मा तुम ही तो एक जो मारी साइड लो सै।ऐसी बातें सुन पूरी गली हंसी में झूम उठी।

रामवती अम्मा के सामने वाले घर में एक अम्मा बैठी थी। वो उठी और रामवती अम्मा के कंधे पर हाथ रखती हुई बोली, ‘हाए अम्मा मर गई, अब कैसे होगी।तभी कला की दादी बोली, ‘अरे अब सारी जि़ंदगी तो काट डाली अब ई भी कट हि जाएगी।भोला कला की दादी की बातें सुन ताली मारकर हंसने लगी। भोला का चेहरा देख कला भी हंसते-हंसते कूदने लगा। कला भोला के पास गया और बोला, ‘अरी भोला थोड़ा डांस करके दिखा दे।भोला बोली, ‘अरे मरझासू थारी मां ने तने ई लक्क्षण सिखाये अपनी मां नु बोल कि मारेको अच्छी बातें सिखावे।तभी रामवती अम्मा बोली, ‘अरे भोला काहे लगती है तु इस बच्चे के मुंह अब जाने दे।गुस्से से लाल चेहरा लिए उसकी दादी उठी और कला को खचेड़ के कमरे में ले जाकर छोड़ दिया। अम्मा बोली, ‘अरी कला की दादी तुम घड़ी जल्दी गुस्सा हो जाती हो, थोड़ा गुस्सा कम किया करो, हरदम नाक पर गुस्सा धरा शोभा नहीं देता तो तुमरी नाक भी तुमही से गुस्सा हो जाएगी फिर थै को मनाना पड़ेगा।

रामवती अम्मा बोली, ‘अरे तू अपनी बातें अब इतनी भी मत सुना बाको कि तोई पर टूट पड़े।पूरी गली के लोगों की नज़रें उनको ताके जा रही थी। भोला उठी और अम्मा का हाथ पकड़ते हुए बोली, ‘अच्छा अम्मा अब मैं जा रही हूं और एको बात कहे देती हूं मारी बजा से आपको लड़ने की जरूरत न सै।भोला वहां से चलने लगी फिर वो ही बच्चे भोला के पीछे पड़ कर उसको तंग करने लगे। भोला ने पत्थर उठाया और बोली, ‘मैं मार दूंगी आगे आने की कोई ज़रूरत न सै।भोला ये कहकर धमकाने लगी जब बच्चे भागने लगे तभी भोला ने पत्थर झट से नीचे फेंका और फटाक से ग़ायब हो गई। जब बच्चों ने वापिस मुड़कर देखा तो भोला भाग चुकी थी। भोला को अजीब तरह से भागते देख हंसने लगे फिर वहां से लड़के भी भाग गए थे। सभी लड़के रामवती अम्मा के घर के सामने खड़े हो गए। अपनी खाट पर बैठते हुए बोली, ‘अरे नास्पीटो अब यहां खड़े हो गए। भोला को परेशान कर जी नाही भरा तुम्हारा।लड़के रामवती अम्मा की ये बात सुनकर हंसने लगे और धीरे-धीरे वहां से खिसक लिए। तभी मुन्ना भाई बोला, ‘अरे ताई क्यों डांटती हो विचारे कहा जाएंगे!रामवती अम्मा मुन्ना भाई की बात काट कर बोली, ‘अरे ये समय कितनी जल्दी बीत गयो पता ही कोनी चला। अरे ये मुन्ना जा लाईट जला दे सारी गली में अंधेरा ना रहेगा।मुन्ना भाई ने गुस्से में लाईट तो जला दी पर बड़बड़ाने लगे कि अपने घर की लाईट नहीं जलाती की कही बिल ना आ जाए। तभी रामवती अम्मा बोली, ‘ये मुन्ना का बड़बड़ा रहा है?’ मुन्ना भाई बोला, ‘कहां मैं कछु तो नाही बड़बड़ा रहा हूं!ये कह मुन्ना भाई भी अपने घर निकल गए। उस लाइट की रोशनी ने अपने पंख पूरी गली में पसार दिए थे अचानक लाईट चली गई।

मुन्ना भाई बोला, ‘लाईट जलाने का कोई फायदा नहीं हुआ पूरी गली फिर शांत हो गई।गली में मानो कालिक सी छा गई हो। किसी को कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। सभी लोग अपने अपने घर में घुस गए। कोई कहता कि मरी ये लाईट इसको भी अभी जाना था। थोड़ी देर बाद न जा सके। तो कोई कहता मैं तो सोने जा रहा हूं। रामवती अम्मा बड़बड़ाते हुए अपनी खाट पर बैठ गई। गली में सन्नाटा छा गया। कोई गली के बाहर से काले वस्त्र धारण किए मुंह पे भूत का मुकुट लगाए चुपचाप रामवती अम्मा की तरफ़ बड़ रहा था। वो शख़्स रामवती अम्मा की खाट पर बैठ गया। रामवती अम्मा को कुछ नहीं पता था। वो नींद में थी। वो अम्मा के पैरों में गुदगुदी करने लगा। अम्मा की चोटी गुथी हुई थी पर उसने जुड़ा बना दिया तभी रामवती अम्मा की आंख तभी खुल गई। अम्मा उस शख़्स को अपनी खाट पर बैठा देख ज़ोर से चिल्लाई। पूरी गली में अम्मा की आवाज़ गूंज उठी। पूरी गली के लोग बाहर आ गए। रामवती अम्मा की दोस्त बोली, ‘अरे का हुआ रात में भी तने चैन न सै, इतने खन भी कोई भूत देख लिया का!ये सुन वहां खड़े लोग हंसने लगे। रामवती अम्मा बोली, ‘तुम हंसने के लिए खड़े हो, यहां मैं डर के मारे मरी जा रही हूं। जाओ यहां से नालायक कहीं के!इतना सुन सब अपने घर की ओर निकल गए तभी उनकी बहु आई और कहने लगी, ‘क्या हुआ काहे इतना शोर मचा रखा है?’ रामवती अम्मा ने सभी बातें अपनी बहू को बताई। उनकी बहू बोली, ‘आपको आराम की जरूरत है। आप बौखला चुकी हो!आसपास के लोग भी उन दोनों की बातें सुन रह थे। बौखला शब्द सुन सभी लोग हंसने लगे। रामवती अम्मा बोली, ‘अरे मर जाओ जाके, हंसी छूट रही है। अपने घरों में चले जाओ। अगर उठ गई तो छोडूंगी नहीं!वो लोग हंस कर अपने घर चल दिए। जब अम्मा की बहू अंदर चली गई तब वो शख्स फिर से रामवती अम्मा को तंग करने के लिए आ गया। अजीब-अजीब सी आवाज़ें निकाल कर उनको डरा रहा था। रामवती अम्मा जाग रही थी। उन्होंने सोचा अब देखूंगी कौन है वो! अम्मा हिम्मत करके उठी और उसके मुखौटे को ही पकड़ा। अम्मा ने मन में कहा आज तो मुझे देखना है कि इस मुखौटे का राज क्या है! उन्होंने कस कर मुखौटा पकड़ रखा था, तभी मुखौटा निकल गया। अम्मा चिल्लाने लगी फिर से सभी परेशान होकर उनके पास आए। कला की दादी बोली, ‘अरे ये का नौटंकी लगा रखी से, खुद तो सोती न है, हमें भी सोने न देती है। अम्मा बोली - थे अपनी बातें चुप करो, मारी बात सुनो। अगर तुम्हारे पास एक इंसान भूत का मुखौटा लगाकर चुपचाप बैठ जाए तो तुम्हें डर नहीं लगता पर फिर भी मैंने हिम्मत की और उसका मुखौटा हटाया पर मैं उसका चेहरा नहीं देख सकी, मैं चिल्लाने लगी और तुम टपक गए।सभी अम्मा की बात सुनकर हंसने लगी। अम्मा बोली – इस बात का पता लगाकर रहूंगी।


... प्राची

Monday, 24 August 2015

रब, सौरव

हर सुबह के शुरूआत जैसे एक नए अंदाज़ के साथ होती कभी पापा के गुर्राते चेहरे के साथ तो कभी सूरज की चमक के साथ। इसी तरह हर दिन एक नए मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता, कुछ पता ही नहीं चलता। हर रोज़ की तरह आज भी जब कदम चारपाई से उतरकर उस सुनहरी मिट्टी पर टिके तो जैसे पलभर में ही मेरी आँखें खुल गई। मैंने अंगड़ाई ली और चारों तरफ़ आसमान की सफेद चादर को निहारते हुए नज़र सामने सड़क पर घुमाई जहाँ से गुज़रते कई लोग जिन्हें देख अहसास हुआ कि कुछ अभी ठीक से सुबह हुई नहीं है। सड़क के कोने पर फेन, पापे वाले अंकल भी खड़े थे जो रोज़ाना छः बज से पहले ही हमारी गली में आ जाते है। पूरी सड़क पर लोगों की आवाजाही शुरू हो चुकी थी। मैं उठी और अंदर वाले कमरे में जा ही रही थी कि मेरी नज़र जा टिकी पार्क के नुक्कड़ पर, हमारे रिक्शे पर सोते हुए अपने मुँह को उधाये एक छोटे से बच्चे पर जो इतने कोहरे के बीच भी रिक्शे पर एक पतला सा पर्दा ओढ़कर सो रहा था। जिसे इस अंधेरे का कोई भी डर नहीं और न कोई एहसास वो तो जैसे गहरी नींद में पड़ा था जिसे देखते ही मेरे मन में कई सवाल उमड़ने शुरु हो गया . अरे ये कौन है? यही क्यों लेटा है? कहाँ से आया?

क्या इसे डर नहीं लग रहा, अपने आपसे ढेरों सवालों कर जब मुझे एक पल की राहत मिली, लगा कहीं ये सामने वाली भाभी का बेटा तो नहीं। मैंने खुद से ही मना करते हुए कहा, नहीं-नहीं वो यहाँ क्या करेगा। अपने आपमें डूबी मैं कई सवाल करती और खुद ही उनका जवाब खोज निकालती। तभी अंदर वाले घर से आती कुछ आवाज़ों ने मुझे चैकन्ना कर दिया। बाहर एक लड़का सो रहा है, पता नहीं कौन है? जब ध्यान से सुना तो पता चला कि दीदी भी पापा से उसी लड़के के बारे में बात कर रही थी। पापा चैंकते हुए बोले, ‘कौन? अपने रिक्शे पर। पापा जैसे यकीन ही नहीं कर पा रहे थे तभी मैंने दीदी की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा, ‘दीदी ठीक कह रही है, पापा।सुनते ही पापा ने अपनी जेब से एक छोटा सा टॉर्च निकाला जो एक महीने से पापा की जेब में है। बेशक उसकी कीमत पाँच रुपये की है पर उसकी रोशनी इतनी है कि कितना भी घना अंधेरा हो उसे चीरते हुए रोशनी उभार देता है। उसी टॉर्च को जलाते हुए पापा ने हमें दिया और कहा, ‘जाओ देखकर आओ कौन है?’

हम टॉर्च को थामे अंधेरे के बीच उस नन्ही सी जान को देखने चल दिए। जब टॉर्च जलाकर देखा तो वो सुजल नहीं कोई आठ-नौ साल का लड़का था जो अपनी नन्हीं सी आँखों को बंद करे, नाक को सिकोड़े, होंठों को पिचकाए, गालों को फूला गहरी नींद में सो रहा था। हमने फिर से पापा को उसकी खबर दी। अब तो हमें सभी के उठने का इंतज़ार था। मेरे अंदर तो एक ही खलबली मची हुई थी कि आखिर ये कौन है? कहाँ से आया है? मेरे इन सवालों का जवाब, कहीं भी नहीं मिल पा रहा था। अपने इस जवाब को खोजने के लिए मैंने स्कूल की भी छुट्टी कर ली। धीरे-धीरे सूरज भी अपनी रोेशनी को आसमान के चारों तरफ़ फैला चुका था और आसपास के सब लोग भी उठ चुके थे। यहाँ तक की वो बच्चा भी उठकर अपने बिस्तर पर बैठा, आते-जाते लोगों को तांक रहा था। जो भी आता एक जोरदार आवाज़ के साथ कहता, ‘ये कौन है?’ ये कहते ही सभी की निगाहें उसी पर जा थमती।

कुछ ही देर बाद पलक झपकते ही उसे घेरे लोगों का जमघट लग गया। कुछ अपनी कमर पर हाथ रख कहने लगे, ‘अबे कहाँ का है तू?’ तो कुछ बड़े प्यार से उसका नाम पूछ रहे थे। कुछ आपस में बातें कर रहे थे, ‘अरे शीला देखियो, देखने में तो लगता है यहीं कहीं का है पर बताता भी तो नहीं।सभी के बीच मानो धीरे से फुसफुसाहट चल रही थी पर बच्चा जो लोगों की बातों को न सुनते हुए अपने में खोया नज़र आ रहा था लेकिन लोगों को वहीं फुसफुसाहट जैसे अभी भी बरकरार थी। लोगों के बीच कई किस्से उभर रहे थे, अरी आजकल तो बहुत बच्चे खो रहे है। हम तो अपने बच्चों को अकेला नहीं छोड़ते।

सामने वाली शीला आंटी बोली, ‘चलो खो भी गया तो कम से कम घर का पता तो मालूम होना ही चाहिए इतना बड़ा हो गया, घर का पता भी नहीं मालूम। हमारी पांच साल की कल्लो से ही पूछ लो, घर के पते से लेकर पूरे परिवार का नाम तक बता देती है।

Tuesday, 21 July 2015

मैं अकेली कहाँ

“मिसिज कांता आपकी चाय” गर्म भाप से पसीजा हुआ गिलास ठक से मेज पर रखते हुए एक आवाज सुनाई पड़ी और उसके बाद मिसिज कांता, अपनी चाय और केवल उनके लिए चलता हुआ पंखा तीनो कमरे मे फिर से अकेले रह गए।

टेबल पर रखी कॉपियों की मीनार शशि कांता मैडम की गर्दन से भी उॅची थी। साइड मे यूटी के तीन-चार बंडल भी रखे थे जो बार-बार उनकी तरफ ऐसे लुढ़क आते थे कि लग रहा था कह रहे हो मैडम जल्दी करो, इन कॉपियों के बाद हमारी बारी है, ‘‘उन्हे पेन को थामकर अपनी कलाई चटकाने तक की फुर्सत नही थी, ऐसे मे शायद बेखबर थी कि बेचारा चाय का गिलास कब से उनकी राह देख रहा है, मानो स्टाफ रूम की हर चीज की तरह वह भी सब्र कर रहा था कि शायद यह खामोशी कुछ देर बाद टूट जाएगी। उस टेबल के चारो ओर लगी कुर्सिया कुछ एक-दूसरे की तरफ मुड़ी कुछ टेढ़ी कुछ अपनी बगल वाली के बिल्कुल करीब तो कुछ टेबल के नीचे घुसी हुई, उस मंजर की याद दिला रही थी जो शायद कुछ देर पहले यहाँ रहा होगा, सामने रखे वो खाली गिलास जिनके तलो मे कुछ चाय अब भी बाकी थी, बता रहे थे कि काम और गपशप के माहौल मे उनकी भी खास भागीदारी रही है लेकिन अब ,अब हर चीज मे एक ठहराव था।

वो अधखुला दरवाज़ा, वो टेबल के नीचे रखी मैंडम की स्लीपर, उनके नीले थैले से झाँकती पानी की बोतल और उनके से लटकता वो चाबी का गुच्छा सब कुछ उनकी तरह, उनके साथ ढला हुआ। जब वो अकेली होती हैं तो उसकी दुनिया एक ऐसा ही रुप ले लेती है जहां ना कोई गुंजाईश होती है, न कोई इंतजार, ना किसी का खालीपन और न ही कोई भराव। वो दिन भी कुछ ऐसा ही था कभी पेन को ज़रा थामकर बाँय हाथ की उंगली से माथे की सिलवटें गिनने लगती, तो कभी एक धीमी मुस्कुराहट के साथ अपने आप से कहते, ‘‘बढिया है इस लड़की ने अच्छा किया है‘‘ मानो उनके हाथ मे थमा पेन, पेन पा होकर इंसाफ का तराजू हो, जहां न्याय के रुप मे कभी किसी को वह शाबाश लिख भेजती तो कभी सीधा गंदा काम लिखकर कॉपी ठक से बंद कर देती, क्योंकि छुपाना तो उन्हें आता नहीं और वो हमेशा कहती हैं जब तक अपनी कमी को अपनाओगे नहीं, तो सुधार की गुंजाइश कहाँ से लाओगे। ये सिलसिला बड़ा लम्बा चलता हैं, कॉपियाँ कम होती जाती हैं पर उनकी चेक करने की गहराई में कोई बदलाव नहीं आता, अगर कुछ बदलता है तो उनके बैठने का अंदाज। कभी पाँव पर पाँव चढ़ा टेबल की तरफ झुक जाती, तो कभी दोनो पैर ऊपर कर सहारा लेकर बैठ जाती।

यूं तो हर कोई उन्हें काम के सिलसिले मे ही पुकारता हैं, पर हर पुकार पर उनका चेहरा खिल उठता हैं और वो पलटकर बड़ी तहज़ीब से पूछती हैं, ‘‘हांजी, कहिए क्या काम है?‘‘   

टीना



Wednesday, 8 July 2015

कहानियों से भरी जगह

स्कूल की घंटी बजते ही क्लासों मे हो- हो कर शोर मच जाता और लड़कियां एक के ऊपर एक गिरते पड़ते दरवाजों से घक्के मारते हुए “बालकनी” से धब धब जूतों की आवाज करते हुए ज़ीने से उतर कर पीछे के गेट की तरफ भागती हैं। सब के बीच मे एक होड सी लगी रहती है की कौन सब से आगे जाकर उस मंजिल को छू लेगा।

मैं भी उनका पीछा करती हुई वहाँ पहुच गई। मैंने देखा कि पीछे के गेट के उस तरफ एक महिला जिनकी उम्र 40 से 45 साल की है। तन पर सीधे पल्ले की साडी, सिर ढका हुआ। वह बार - बार सिर के पल्लू को सभालते हुए। सभी की आवाज को सुन, वह चीज उठा कर उस लड़की के हाथ मे पकडा देती जिसने उन्हे पैसे दिये है। वह सभी कि आवाजों को सुन तो रही है पर जो हाथ उनके हाथ मे पैसे थमा देता वह उसी की आवाज को घ्यान से सुनती। यदि समझ नही आती तो वह तेजी से पूछती कि “ये पैसे किसके है? क्या चाहिये?” तभी भीड मे से एक कोई न कोई तेज आवाज आ ही जाती “मेरे है।“ फिर चाहे उन चीज वाली आंटी को किसी का चेहरा दिखे या न दिखे वे आवाज़ को सुनकर उसे चीज जरूर पकड़ा देती। और फिर वह औरो की डिमांड पुरी करने मे लग जाती।

आज भी सभी लडकियां एक दूसरे को घक्का देते अपनी पसन्द की चीज खरीद ने की जुगाड मे लगी हुई है। कुछ लडकियां उस भीड से कुछ दूर खडी अपनी बातों में लगी हुई हैं। तो कुछ को लगता है कि हमारा नम्बर तो आएगा ही नही, चल कहीं और चलते हैं। इस जगह से कुछ ही दूर एक सीढी नूमा चबूतरा बना हुआ हैं। कुछ लडकियां उस चबूतरें पर जाकर बैठ गई हैं और उन्होने अपनी बातों की पोठली खोल ली हैं। जिन्हे अपनी आधी छुट्टी का ये आज़ाद वक्त कैसे बिताना है, वे सभी भली भांति जाती हैं। स्कूल की कुछ ही ऐसी जगहे हैं जहां पर आधी छुट्टी का ये वक्त बिताया जाता हैं। क्लास की परेशान कर देने वाली गर्मी और हर वक्त काम मांगने वाली आवाज़ों से दूर जाकर। ये जगहे जो इस स्कूल की बड़ी क्लास की बड़ी सहेलियों ने चुनी होगी, लेकिन जैसे अब तो हर कोई इसे अपनी समझ कर यहाँ पर कुछ समय के लिए छुप जाता हैं।

आधे घंटे का ये समय अलग अलग क्लास में पढ़ने वाली सहेलियों को एक कर देता हैं। जहां गेट पर पेट भरने के लिए समोसे, चिप्स व मट्ठी खरीदी जा रही है और वहाँ पर अब बाते शुरू है।

Sunday, 7 June 2015

मेरी छत और आवाज़ें

पिछली दोपहर मै छत पर खड़ा होकर आसपास की आवाज़े सुन रहा था। मुझे उस समय बहुत अच्छी-अच्छी आवाज़े सुनाई दे रही थी जैसे- फट्र-फट्र की बहुत तेज आवाज़ थी। जिसे मैं समझ ही नहीं पा रहा था की वो किस चीज की है। एक और आवाज़ जो हवाई जहाज़ की थी। कुछ ऐसी झूं-झूं करके लगातार आ रही थी। इन आवाज़ों को सुनने में इसलिए भी मज़ा आ रहा था की ये मेरी समझ से बाहर थीमुझे आवाज़े सुनने में बहुत मजा आ रहा था। उस वक्त समय ग्यारह  बज रहे थे। कड़ी धूप थी, पत्ते लहरा रहे थे। दूर आसमान में उड़ती चील अपने दोस्तों के साथ खेल रही थी। पार्क में सारे बच्चे लट्टू खेल रहे थे, जिसकी आवाज़ झन-झन करती हुई मेरी छत तक आ रही थी। पार्क के कोने में बहुत सारे कबूतर फड़फड़ा रहे थे। सामने एक और पार्क था बिल्कुल सुनसान। लौहे के लगे झूले हवा से हिल रहे थे। मैं उन्ही को देखने मे इतना मगन था। की इतने में मेरे हाथ पर बार-बार एक चीटी मुझे छूकर गुजर रही थी। उसने मेरा ध्यान अपने मे लगा लिया। मैं उसको हाथ पर चलते हुए देखने लगा वह अपनी ही धून मे मेरे हाथ पर पर कि तरफ चड़े ही जा रही थी मानो उसने ठान रखा हुआ था कि आज वो हिमालय की चढाई पूरी कर लेगी। मैं उसी मे खोया हुआ था कि मेरी आंखे जलने लगी। मैंने आंखे उठा कर देखा सामने बहुत सारी लकड़ियों के ठेरे मे कुछ लडको ने आग लगा दी थी। अभी कुछ देर पहले तो यहाँ कुछ नही था। लकड़ियाँ सामने पड़ी थी ऐसे कि मानो जैसे कोई इनमें अभी आग लगाने वाला है। वहीं पर कुछ राजमिस्त्री भी बड़ी लगन से काम कर रहे थे। मिस्त्री पत्थर काटने की मशीन चला रहे थे। मशीन घड़-घड़ करती हुई चल रही थी जो बहुत शोर कर रही थी। अब समय साड़े बारह बज चुके थे जो कि मेरे स्कूल जाने का समय था इसलिए मैं चलने के लिए तैयार हो गया। मेरी छत से मेरा स्कूल दिखाई देता है। मैंने अपने स्कूल की ओर देख ही रहा था की कोई बहुत तेज आवाज़ आई। लगता था की कोई चिल्ला रहा है। मैं कुछ देर तक समझ ही नहीं पाया की ये है कौन? मैं अपनी गली में झाँकने लगा। पर मुझे कोई दिखा नहीं। मेरा दिमाग इसी तेज आवाज़ में खो गया और मेरे कान यहाँ वहाँ की आवाज़ों में खोने लगे। मैं पूरी तरह से पागल से हो गया। की किसे देखू और किसे सुनू। इसी पागलपन में मैं छत से उतर गया।


नीचे आया तो वही आवाज़ और तेज हो गई। देखा तो सामने वाले घर आ रही है। दवाज़ा बंद था मगर आवाज़ इतनी तेज थी की लोग उस घर की तरफ में मुह करके खड़े थे। समझ तो नहीं आ रहा था की क्या मजरा है लेकिन मालूम तो हो ही जायगा क्योकि गली अब पतली हो गई है। 


रवि